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क्या है सीबीएसई की मॉडरेशन पॉलिसी?
सीबीएसई के 12वीं के नतीजे दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले की वजह से रुक गए हैं.
हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक फैसले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को अपनी मॉडरेशन पॉलिसी को बरक़रार रखने का निर्देश दिया था.
सीबीएसई ने 25 अप्रैल को अपनी मॉडरेशन पॉलिसी ख़त्म कर दी थी जिसके विरोध में कुछ छात्र और उनके अभिभावक कोर्ट चले गए थे.
मामला थोड़ा तकनीकी है और बहुत से अभिभावकों को भी इसे समझने में दिक्क़त आ रही है.
सीधे लफ्ज़ो में कहा जाए तो मॉडरेशन पॉलिसी के तहत छात्रों को कठिन सवालों की सूरत में कुछ पेपर्स में 15 फीसदी तक अतिरिक्त नंबर दिए जा सकते हैं.
क्या है मॉडरेशन पॉलिसी
इसे कुछ इस तरीक़ो से समझा जा सकता है. मान लिया कि सीबीएसई बोर्ड छात्रों की परीक्षा सवालों के तीन सेट के ज़रिए लेता है.
मसलन 80 फीसदी नंबर ला सकने वाले छात्र को वो सवाल मुश्किल लगते हैं तो उसे ज्यादा नंबर दिए जा सकते हैं.
यानी सवालों के कठिन या आसान होने के पैमाने पर किसी छात्र के कुल नंबरों में से निर्धारित प्रतिशत नंबर जोड़ना या घटाना मॉडरेशन है.
जांच की प्रक्रिया में एक ही पैमाना अपनाया जाए, यही इसका मक़सद है.
सीबीएसई सहित भारत के कुछ राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में ग्रेस मार्क्स दिए जाने का प्रावधान है.
लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि ग्रेस मार्क मॉडरेशन पॉलिसी से किस तरह से अलग है.
ग्रेस मार्क में कम नंबर लाने वाले छात्र को ज्यादा नंबर दिए जाते हैं ताकि वो अगली क़तार तक पहुंच सके.
लागू करने का तरीक़ा
सवालों के अलग-अलग सेट के लिए मुश्किलों का अलग पैमाना होता है. कॉपी जांचने वालों के रवैये अलग होते हैं.
इस वजह से एक ही जैसा उत्तर लिखने पर भी छात्रों को अलग-अलग मार्किंग होने की संभावना रहती है.
इसमें यह भी ख्याल रखा जाता है कि एक छात्र निर्धारित समय के भीतर किस हद तक सवालों को हल कर पाता है.
मसलन एक विषय के सवालों के तीन सेट के लिए कठिनाई का स्तर 90%, 80% और 70% है.
बोर्ड इसमें एकरूपता लाने के लिए इसे मॉडरेट करता है. यही मॉडरेशन पॉलिसी है.
छात्रों पर असर
सीबीएसई की मॉडरेशन पॉलिसी के तहत 80 से 85 फीसदी नंबर लाने वाले किसी छात्र का स्कोर बढ़कर 95 फीसदी हो सकता है.
हालांकि 95 फीसदी या उससे ज्यादा नंबर लाने वाले छात्र को कोई अतिरिक्त नंबर नहीं मिलते हैं.
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