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यहां शौच के लिए देना पड़ता है 'टैक्स'
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
बांदा ज़िले में अतर्रा तहसील में जरूहा चौकी गांव की रहने वाली सैरुन्निशां गोद में छोटे से बच्चे को लिए हैं और घर में शौचालय न होने का दर्द कुछ इस तरह बयां करती हैं, "हमारे गांव में 30-35 घर हैं, किसी के यहां शौचालय नहीं है. किसी के पास एक इंच ज़मीन नहीं है. दूसरों की ज़मीनों पर काम करते हैं और वहीं शौच के लिए जाते हैं. शौच जाने की क़ीमत हम उनके खेतों में या घरों में मज़दूरी करके अदा करते हैं."
ये दर्द सिर्फ़ सैरुन्निशां का ही नहीं था, बल्कि वहां इकट्ठा हुई क़रीब दर्जन भर महिलाओं का था.
मिट्टी के बने मुश्किल से एक कमरे के छोटे-छोटे घरों में शौचालय की गुंज़ाइश तो थी ही नहीं, इतने घरों के लिए आज तक एक भी सामूहिक या सामुदायिक शौचालय भी नहीं बन सका है.
आम समस्या
ये गांव 'अतर्रा ग्रामीण' ग्राम पंचायत के तहत आता है. इसके दूसरी ओर एक और गांव है भुजवनपुरवा. वहां की दलित बस्ती में भी क़रीब तीन दर्जन घर ऐसे हैं जहां शौचालय जैसी किसी जगह की बात करना ही बेमानी है.
मिट्टी से बनी और छप्पर से ढकी इन संरचनाओं को 'घर' कहना इनका और घर दोनों का मज़ाक उड़ाना होगा. शौच के लिए बाहर जाने को मजबूर इन भूमिहीनों का भी दर्द कुछ ऐसा ही था जैसा कि जरूहा चौकी गांव के लोगों का.
इस ग्राम पंचायत में घोड़ापुरवा, कठैलापुरवा, मुरलियापुरवा जैसे कई टोले हैं, जहां ये समस्या बेहद आम है.
उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के कई ज़िलों को सितंबर महीने तक प्रशासन 'शौच मुक्त ज़िला' याना ओडीएफ़ घोषित करने की तैयारी कर रहा है.
बांदा ज़िला भी उनमें से एक है और ऊपर जिन गांवों का उल्लेख हुआ है वो इसी बांदा ज़िले में आते हैं.
इनकार
इन गांवों के बारे में ज़िला प्रशासन से बात करने पर ऐसा लगा कि उनकी नज़र में ये कोई बड़ी समस्या नहीं है.
अतर्रा के एसडीएम अवधेश श्रीवास्तव कहते हैं, "ऐसा नहीं है. कुछ लोगों के पास शौचालय नहीं हैं तो हमने बीडीओ को इसके लिए निर्देशित कर दिया है. शौचालय के लिए मज़दूरी कराने जैसी बात सही नहीं है."
एसडीएम साहब भले ही ऐसा कह रहे हों, लेकिन गांव में शौचालय के एवज़ में मज़दूरी कराने की बात करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं थी. यही नहीं, गांव और वहां रहने वालों की हालत देखकर भी इसे बख़ूबी समझा भी जा सकता है.
गांव के लोगों का कहना है कि मज़दूरी करने को तो वो वैसे ही विवश हैं, ज़मीन न होने के चलते शौच जैसे कामों के एवज़ में उन्हें अतिरिक्त मज़दूरी भी करनी पड़ती है और मज़दूरी की क़ीमत भी बेहद कम मिलती है.
इन दोनों गांवों को अंदर तक बेहद क़रीब से देखने पर पता चला कि शौचालय की समस्या तो सिर्फ़ एक है, बाक़ी समस्याओं के अलावा तो यहां कुछ है ही नहीं.
मांग
ग्रामीणों की सिर्फ़ एक मांग है कि उन्हें रहने के लिए वो जगह मिल जाए जिसके ऊपर 'छत' होती है.
इलाक़े के समाजसेवी राजा भइया कहते हैं, "जबसे इस गांव में शौच के एवज़ में मज़दूरी की चर्चा हुई है, प्रशासन अपनी कमी छिपाने के लिए यहां के लोगों पर चुप रहने का दबाव बना रहा है. ये ग़रीब लोग हैं, डर के मारे अब अपनी समस्या भी किसी को बताने से कतरा रहे हैं."
जहां तक भुजवनपुरवा गांव के लोगों की बात है तो, राजा भइया के मुताबिक़ ये दबाव साफ़ दिख रहा है.
गांव के निवासी भैयालाल कहते हैं, "हमारे खेत नहीं हैं, इसलिए हम लोग निस्तार (शौच) के लिए दूसरों के खेतों में जाते हैं लेकिन खेतों में काम करने के एवज़ में हमें एक दिन में चालीस रुपये मिलते हैं."
राजा भइया के मुताबिक़ चालीस रुपए इन्हें एक दिन की मज़दूरी मिलती है, इसका मतलब साफ़ है कि बाक़ी मज़दूरी ये 'शौच की क़ीमत' के रूप में अदा करते हैं.
हमने ज़मीन के उन मालिकों से भी बात करने की कोशिश की जिनके यहां ये लोग काम करते हैं, लेकिन इस बात को स्वीकार करना तो दूर, उन लोगों ने इस पर बात करना भी स्वीकार नहीं किया.
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