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आत्मरक्षा के लिए तैयार होतीं कश्मीरी लड़कियाँ
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
भारत प्रशासित कश्मीर में लड़कियां जज्बे और जोश से लबरेज हो आत्मरक्षा (सेल्फ़ डिफ़ेंस) का हुनर सीख रही हैं.
इनमें से कुछ पहली बार आत्मरक्षा का हुनर सीख रही हैं तो कुछ कई सालों से इसका प्रशिक्षण ले रही हैं.
श्रीनगर के महाराजा बाज़ार की रहने वाली अमीना फ़याज़ बीते कई सालों से ताइक्वांडो की बारीकियां सीख रही हैं.
वे कहती हैं कि कश्मीर में हर दिन ख़राब हालात रहने के बावजूद वह अपने इस शौक़ और मक़सद को पूरा करने के लिए घर से निकलती हैं.
प्रैक्टिस
उन्होंने बताया, "मैं जहां रहती हूँ, वहां हर दिन हालात ख़राब रहते हैं. हर दिन कर्फ्यू लगा रहता है. मैं श्रीनगर के निचले हिस्से में रहती हूँ, वहां हर दिन ही कर्फ्यू रहता है. आज भी जब मैं आई तो घर से फ़ोन आया कि यहाँ फिर से कर्फ्यू लगा दिया गया है."
अमीना आगे बताती हैं, "मेरी जैसी लड़कियों को प्रैक्टिस करने के लिए जाते वक्त इसका ख़्याल रखना पड़ता है. इसके बावजूद मेरी जैसी लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर सीखने चाहिए. ये नहीं कि जिस लड़की के परिवार वाले पढ़े-लिखे हैं, वो ही ये सीखे. हर एक को सीखना चाहिए."
'भरोसा नहीं'
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाली श्रीनगर के छतबल की रहने वाली मंशा ने बैंकॉक में खेले गए मुक़ाबले में सिल्वर का तमगा हासिल किया. मंशा के पिता की बचपन में मौत हो गई थी.
मंशा इन दिनों श्रीनगर के इनडोर स्टेडियम में लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर सिखा रही हैं.
उनका कहना है कि कश्मीर में लड़कियाँ तो आगे आ रही हैं, लेकिन कुछ माँ, बाप अब भी अपने बच्चों को खेलों से दूर रख रहे हैं.
उनका कहना था, "लड़कियां तो अब आहिस्ता-आहिस्ता आगे आ रही हैं, लेकिन बड़ी संख्या में नहीं. कुछ माँ, बाप अब भी अपने बच्चों पर भरोसा नहीं करते हैं. बच्चे पर भरोसा करना चाहिए. खेल-कूद बच्चों के लिए ज़रूरी है. आजकल के ज़माने में तो सेल्फ़ डिफ़ेंस एक लड़की के लिए बहुत अहम है."
मंशा कहती हैं कि इस मुकाम तक पहुंचना कोई आसान काम नहीं था.
वह कहती हैं, "अक्सर मेरे पास पैसे नहीं होते थे. लेकिन मेरे कोच मुज़फ़्फ़र सर ने हमेशा मेरी मदद की और आगे बढ़ने का मौक़ा दिया."
आत्मविश्वास
दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग की रहने वाली मरिया पहली बार आत्मरक्षा का हुनर सीख रही है.
मरिया कहती हैं कि वह हर जगह अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं.
उन्होंने कहा, "हम जब गाड़ी में बैठते हैं, तो लड़के ऐसी गंदी हरकतें करते हैं कि शर्म आती है. ये भी एक वजह थी कि मैं आत्मरक्षा के गुर सीखूँ. अब मुझमें आत्मविश्वास पैदा हो रहा है, जब से मैंने ये सीखना शुरू किया है."
ग़लत फ़ैसला नहीं
ऑटो रिक्शा चलाने वाले की बेटी सकीना 14 सालों से ताइक्वांडो खेलती आ रही हैं. अब तक सकीना ने आठ राष्ट्रीय मुक़ाबलों में हिस्सा लिया है.
सकीना कहती है कि एक ऐसा समय भी आया था जब माँ के सिवा हर किसी ने उनसे मुंह मोड़ लिया था.
उन्होंने कहा, "जब मैंने ताइक्वांडो खेलना शुरू किया तो मेरे सब रिश्तेदारों और मेरे भाइयों ने मुझसे मुंह मोड़ लिया था. बस एक माँ थी जो मेरे साथ थी. लेकिन अब सब कहते हैं कि नहीं मेरा फ़ैसला ग़लत नहीं था."
कश्मीर ताइक्वांडो एसोसिएशन के सेक्रेटरी शुजात शाह कहते हैं कि कश्मीर में हर खेल के लिए लड़कियों के अंदर हुनर मौजूद है.
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