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इंसेफ़ेलाइटिस के सामने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लाचार क्यों?
- Author, कुमार हर्ष
- पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
मंगलवार को जश्न-ए-आज़ादी का जलसा होगा. हमेशा की तरह लहराते-फ़हराते तिरंगे के नीचे खड़े होकर आम-आवाम से मुखातिब बड़े लोग आंकड़ों की जुगलबंदी के साथ बताएँगे कि बीते कुछ बरसों में भारत कितना बदल गया है.
कोई बताएगा की बीते पचीस वर्षों में भारत की जीडीपी में 2216 प्रतिशत की उछाल आई है. कोई प्रति व्यक्ति आय में 1388 फ़ीसदी बढ़ोत्तरी की याद दिलाते हुए समझाएगा की कैसे आर्थिक विकास की दर में 'हिंदू ग्रोथ रेट' के तंज भरे तमगे से नवाजा जाने वाला भारत आज दुनिया की सबसे तेज रफ़्तार अर्थव्यवस्था में बदल चुका है.
जश्न-ए-आज़ादी
हो सकता है कि कोई ये भी बताए कि इस वक्फे में कैसे इंटरनेट, लैपटॉप, मोबाइल, ईमेल, फ़ाइबर ऑप्टिक्स, लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले यानी एलसीडी, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और ऑनलाइन शॉपिंग जैसी वो तमाम चीज़ें हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गई हैं जिनके बारे में 30-40 बरस पहले हम सोच भी नहीं पाते थे.
बातें तो सही हैं. बच्चा लोग ताली बजाओ. देश ताली बजाने भी लगेगा. जश्न-ए-आज़ादी मुकम्मल हो जाएगी. पर देश के एक हिस्से में बड़ी तादाद में मायूस खड़े लोगों की तालियाँ शायद न बजें, सहमति में उनके सर शायद न हिलें. हिलें भी क्यों? उनके यहाँ तो बहुत कुछ नहीं बदला.
मौत का तांडव
चालीस साल पहले भी उनके बच्चे एक दिन तेज़ बुखार से तपने लगते थे और वे कुरते की जेब में बमुश्किल जमा पैसों के साथ मेडिकल कॉलेज भागते थे. कुछ दिन बाद हाथों में अपने कलेजे के टुकड़े की बेजान झूलती देह और खाली जेब के साथ वे लौटते दीखते थे.
जिनके बच्चे बच जाते थे, वे और ज्यादा बदनसीब माने जाते थे क्योंकि उनके नौनिहाल जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो चुके होते थे. चालीस साल से ये सूरत नहीं बदली. मौत का सालाना तांडव जारी है. काल मानो कपड़े टांग कर यहीं ठहर गया हो.
ऑक्सीजन के सिलेंडर
गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के लम्बे-चौड़े गलियारों से लेकर उनमें रोजाना आमदरफ्त करने वाले लोग इसे 'रूटीन' की तरह मानते हुए अपने काम में उसी तरह व्यस्त हैं जैसे पंजाब में चरमपंथी हिंसा के दौर में रोज़ होने वाली मौतों पर लोग निस्पृह भाव से मृतकों की संख्या ये कह कर पूछ लिया करते थे कि 'आज का स्कोर क्या रहा?'
मजे की बात ये कि हर दशक में सरकारों और जिम्मेदारों ने इसकी अलग वजहें और अलग खलनायक बताए हैं. कभी मच्छर, कभी सूअर, कभी विषाणु, कभी गंदा पानी तो कभी ऑक्सीजन के खाली सिलेंडर .
असली खलनायक
मगर किसी ने भी इन छोटे खलनायकों की आड़ लेकर हर बार छिप जाने वाले उस सबसे बड़े विलेन का जिक्र कभी नहीं किया जो ज़िम्मेदारों की निर्लज्ज निष्क्रियता, अमानवीय लापरवाहियों और कातिलाना कमीशनखोरी से मिलकर बनता है .
और इसी गलत शिनाख्त के चलते चौंतीस साल पहले यहाँ आ धमकी तब की 'नवकी बिमरिया' (नया रोग) अब देश के सबसे पुराने नासूर में बदल चुकी है. पिछले हफ्ते 48 घंटों के भीतर हुई ताबड़तोड़ मौतों के बाद इस असली खलनायक का चेहरा नुमाया हुआ तो है पर क्या इस बार असली मुजरिम को सज़ा मिलेगी?
योगी सरकार में...
इस सवाल का दावे से कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया जा सकता. दरअसल ये तय कर पाना कभी मुश्किल नही रहा की मौतों की असल ज़िम्मेदार बीमारी है या सरकारों और स्वास्थ्य तंत्र के ज़िम्मेदारों की आपराधिक हदों को स्पर्श करती उदासीनता और उपेक्षात्मक रवैया.
मुख्यमंत्री बनने से पहले इस जंग के अगुआ योद्धा रहे योगी आदित्यनाथ तब लगातार कहते थे, "पिछले चौदह सालों से हर साल संसद में मैं किसी दीर्घकालिक योजना की मांग करता हूँ, मगर कभी कभार की अल्पकालिक सक्रियता के अलवा कुछ ठोस योजना नहीं बनती."
युद्ध स्तरीय तेज़ी
इस बार उनके चेहरे के तनाव और रुंधी आवाज़ चुगली कर रही थी कि खुद वे भी बखूबी समझ गए हैं कि सरकारें क्यों लाचार दिखने लगती हैं. कैसे खुद उनके यहाँ भुगतान न होने की शिकायत की चिट्ठी सौ दिन से ज़्यादा वक्त तक धूल फांकती रहती है.
बाल रोग विशेषज्ञ और इंसेफ़ेलाइटिस उन्मूलन के लिए अभियान चला रहे डॉक्टर आरएन सिंह साफ़ कहते हैं, "पूर्वांचल के इंसेफ़ेलाइटिस पीड़ितों की उपेक्षा सिर्फ़ इसलिए हो रही है क्योंकि ये ग़रीबों और किसानों के बच्चे हैं. सॉर्स और स्वाइन फ़्लू जैसी संपन्न लोगों को होने वाली बीमारियों पर युद्ध स्तरीय तेज़ी दिखने वाली सरकारें इंसेफ़ेलाइटिस के सवाल पर 30 सालों से चुप हैं."
इंसेफ़ेलाइटिस की रोकथाम
इंसेफ़ेलाइटिस पर अनेक शोध अध्ययन करा चुकी गैर सरकारी संस्था एक्शन फ़ॉर पीस, प्रॉस्पेरिटी एंड लिबर्टी (एपीपीएल) के मुख्य कार्यकारी डॉक्टर संजय श्रीवास्तव ज़ोर देकर कहते हैं कि असली काम 'समन्वय' का है जो अब तक नहीं हो रहा.
उनके मुताबिक, "शासन, प्रशासन, चिकित्सा केंद्रों के साथ साथ पशु चिकित्सा से जुड़ी एजेंसियों को एक साथ समन्वय स्थापित करना होगा क्योंकि इंसेफ़ेलाइटिस की प्रभावी रोकथाम के लिए इंसानों के साथ-साथ जानवरों पर भी निगरानी रखनी जरूरी है जो इस रोग के संवाहक हैं."
इंसेफ़ेलाइटिस मुक्त पूर्वांचल
कुशीनगर के होलिया गाँव में इंसेफ़ेलाइटिस उन्मूलन के लिए शुद्ध जल, मछरदानी, सूअर बाड़ों को आबादी से दूर रखने और साफ़ सफाई पर जोर देने जैसे उपायों के चलते वहां से इस बीमारी का प्रकोप रोक देने का सफल प्रयोग कर चुके डॉक्टर आरएन सिंह भी दृढ़ता पूर्वक कहते हैं कि अगर सही दिशा में कोशिशें हों तो रोकथाम मुश्किल नहीं.
साफ़ है कि मर्ज़ और उसके इलाज- दोनों के बारे में सबको पता है. हम पोलियो मुक्त भारत बना सकते हैं तो इंसेफ़ेलाइटिस मुक्त पूर्वांचल क्यों नहीं बना सकते?
मेडिकल कालेज से वापसी में मन मे एक सवाल कुलबुलाता है. भोपाल गैस त्रासदी मे मारे गए एक बच्चे की अधखुली आँखों वाली एक तस्वीर पिछले कई बरसों से पूरे देश को ऐसे खतरों के खिलाफ एकजुट कर देती है.
मगर पिछले 34 सालों मे अकेले इस एक शहर मे 25 हज़ार से ज़्यादा मासूम मौतों पर इस मुल्क, यहाँ के हुक्मरानों और यहाँ के लोगो की आंखे नम क्यों नहीं होतीं. कमबख़्त छोटे शहरों की मौतें भी दोयम दर्जे मे गिनी जाती हैं शायद!
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