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नज़रिया: फिर भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ शक़ और नफ़रत क्यों?
- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
"मैं अपने बच्चे के स्कूल से बहुत ख़ुश हूँ कि उसने उसे नटखट नंदलाला का चरित्र खेलने दिया." यह ट्वीट मीडिया के लिए एक ख़बर था. उस बच्चे की तस्वीर के साथ जो नन्हा-सा है और जिसने बाँसुरी अपने मुँह में दबा रखी है.
यह ट्वीट क्यों ख़बर है? क्योंकि यह जिस शख़्स की है उसका नाम है नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और तस्वीर उनके बेटे की है. जिस अख़बार की इंच-इंच जगह के लिए मारा-मारी होती है, उसे ये ख़बर इसलिए लगी कि यह उसी नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का बेटा है जिसे उसी के कस्बे में राम लीला में भाग नहीं लेने दिया गया था.
जो बाप से छीन लिया गया, वह उनके बच्चे को मिला, इससे वो ख़ुश हैं. शुक्रगुजार भी.
जन्माष्टमी का दिन है. पिछले सालों के अख़बारों और अब सोशल मीडिया की घूमती तस्वीरें दिमाग में नाच जाती हैं: एक बुर्काधारी औरत मोरपंख लगाए अपने नन्हे को या तो गोद में लिए या या टोपी लगाए कोई व्यक्ति बालगोपाल का भेस धरे अपने बच्चे की उंगली पकड़े हुए.
दीवाली-दशहरा
जन्माष्टमी है इसलिए याद आया, वरना ऐसी तस्वीर भी याद है जिसमें दिए सजाए हुए उनकी पांतों को घेरे दुपट्टा लपेटे किशोरियां कैमरे की ओर देख रही हैं. यह दीवाली का वक़्त हुआ करता है.
जब भी दशहरा आता है, अभी भी हर अख़बार में और वेबसाइट्स पर पाठकों को यह ज़रूर बताया जाता है कि फलाँ फलाँ जगह परंपरा है कि मुसलमान ही रावण का पुतला बनाते हैं और राम का मुकुट भी.
यह भी सूचना दी जाती है कि जिसे पारंपरिक हिंदू लड़कियों के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अवसर कहते हैं, यानी उनका विवाह, उस अवसर पर कम से कम उत्तर भारत में अनिवार्य मानी जाने वाली बनारसी साड़ियां मुसलमान उँगलियों से सँवारी जाती हैं.
अभी राखी का त्योहार गुजरा है और देखा कि मेरा इंतज़ार यों ही न था.परवेज़ अख्तर ने नज़ीर अकबराबादी की नज़्म लगा रखी थी, "नज़ीर आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे; बँधा लो उस से तुम हँस कर अब इस त्योहार की राखी."
नज़ीर अकबराबादी की नज़्म
अब जन्माष्टमी पर भी परवेज़ साहब ने वही नज़्म फिर से पढ़ने को मुहैया कराई है जिसे वे हर साल इस उम्मीद में लगाते रहते हैं कि हमें ज़ुबानी याद हो जाए, "यारो सुनो ! ये दधि के लुटैया का बालपन... और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन... मोहन-सरूप निरत करैया का बालपन... बन-बन के ग्वाल गौएँ चरैया का बालपन... ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन... क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन..."
यह भी नज़ीर अकबराबादी की ही नज़्म है.
अपने इलाहाबाद के करारी गाँव के छोटे कद के मौलवी साहब की याद करते हुए हमारे दोस्त अली जावेद की आँखों में चमक आ जाती है जो राम चरित मानस के राम लक्ष्मण संवाद को साभिनय पढ़ाते हुए उसका मज़ा लेते थे और बच्चों को भी उसे पढ़ने का सही क़ायदा बताते थे.
इससे आगे बढ़ जाएँ तो 15 अगस्त को यह बहुत हल्की सी नज़्म भी साझा की ही जानी होती है, "मुहम्मद है इबादत और मैं वतन पे ईमान रखता हूँ, वतन की शान की ख़ातिर हथेली जान पर रखता हूँ!! क्यों पढ़ते हो मेरी आँखों में नक्शा पाकिस्तान का/मुसलमान हूँ मैं सच्चा, दिल में हिन्दुस्तान रखता हूँ!"
मुसलमानों से नफरत...
और तो और अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने वाले और उस जगह सीनाजोरी से जम जानेवाले राम जन्मभूमि मंदिर वहीं क्यों बनना चाहिए और क्यों जो मुसलमान उसका विरोध करते हैं, उनकी मुसलमानियत में खोट है यह बताकर उन्हें कायल करने के लिए उस इक़बाल तक का जाप करते हैं जिसे दूसरे मौकों पर वे पाकिस्तान का पिता कहते सुने जाते हैं.
यह बताने को कि जब इकबाल तक ने राम को इमामे हिन्द मान लिया है तो बाबरी मस्जिद की उस जमीन पर उनके हक़ को चुनौती देनेवाले आप कौन!
अगर आख़िरी उदाहरण छोड़ दें तो यह सब कुछ नेक इरादे से किया जाता है. मुसलमान इस साझा संस्कृति से अभिन्न हैं, इसे गढ़ने में उनका योगदान है, यही साबित करने की कोशिश की जाती है.
फिर भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ शक़ और नफ़रत बढ़ती चली जाती है.
यूरोप में यहूदी शक़ और नफ़रत के दायरे में थे. उनका ख़ात्मा करने का इरादा हिटलर का था. लेकिन यह भी याद रखें, स्टालिन को यहूदियों से उतनी ही घृणा थी. और ख़ुद को उदार बतानेवाले यूरोप ने जर्मनी से बेदख़ल यहूदियों को पनाह न दी, सुदूर अरब में फ़लीस्तीन का रास्ता दिखाया.
भारत में मुसलमान
यहूदियों के यूरोपीय संस्कृति में योगदान, उनकी मानवीयता आदि के बारे में भी कुछ उसी तरह जर्मनों और ईसाइयों को शिक्षित करने का प्रयास किया जाता था जैसे भारत में मुसलमानों को लेकर किया जाता रहा है.
थियोडोर अडोर्नो ने इसपर लिखा कि अगर आप क़ातिल के सामने मकतूल के गुण गिनाने लगें तो उससे क़त्ल का उसका इरादा ज़रा भी हल्का नहीं पड़ता. कहा जा सकता है कि इससे शायद वह और पक्का हो जाता है.
यहूदी इसलिए नहीं मारे गए कि उन्हें लेकर यूरोप में ग़लतफहमी थी जिसे दूर कर लेने भर से मसला सुलझ जाता. वह तो थी ही. इसके लिए सिर्फ शायलॉक को याद कर लेने की ज़रूरत है.
फिर यहूदी हों या मुसलमान, यह सिर्फ़ सूचना, जानकारी या संपर्क का अभाव नहीं है जो उनके ख़िलाफ़ पूर्वग्रह या नफ़रत पैदा करता है.
हिंसा का कारण
अगर सिर्फ यह पूर्वाग्रह या अलगाव है जो हिंसा का जन्म देता है तो 1984 के सिखों के कत्लेआम की कैसे व्याख्या की जाएगी जिन्हें हिंदू अपना रक्षक मानते हुए बड़े हुए?
या मैं क्यों अपने उस पड़ोसी को मार डालता हूँ जिसके घर चुपके चुपके गोश्त खाने मैं जाया करता था, या कोई मुस्लिम विरोधी हिंसा में उस औरत का बलात्कार कैसे कर बैठता है जिसे वह बुआ या बहन कहा करता था और जो बार बार इस रिश्ते ही दुहाई देकर रहम की भीख माँगती मारी जाती है या कोई अपनी छत से अपने पड़ोसी की छत पर पेट्रोल या किरासन डालकर उसे क्यों जला डालता है?
यह जानकारी या संपर्क या आवाजाही की कमी नहीं जो हिंसा का कारण हो.
मुसलमानों के 'मानवीय','हिंदू मित्र' होने या 'भारतीय' होने के हरेक उदाहरण के बाद जो सवाल किया जाता है, वह है "यह सब तो ठीक,लेकिन...?" या, "इसके बावजूद..."
भारत के लिए...
आप कितने ही आंकड़े गिनाते रहें कि मुसलमानों में बहुविवाह लोकप्रिय नहीं, कि उनकी जन्म दर ऐसी नहीं कि वे भारत में हिन्दुओं पर भारी पड़ें, या यह कि उनमें तीन तलाक़ नगण्य है, इससे उन पर हमले या उन्हें औकात बताने के इरादे में कोई कमी नहीं आती.
आप कितना ही कुरआन से आयतें निकालते रहें जिससे साबित हो इस्लाम अमन का मज़हब है वह संदेह का स्रोत बनी रहती है.
और यह कोई नहीं पूछता कि किसी की अशिक्षा या पिछड़ापन उसके ख़िलाफ़ हिंसा की वजह कैसे हो सकती है? या यह कि हर पैदा होने वाली मुसलमान संतान भारत के लिए वैसे ही स्वाभाविक क्यों नहीं जैसे एक हिंदू पैदाइश है?
इसका मतलब सिर्फ यह है कि हिंसा का स्रोत वह नहीं जिसे निशाना बनाया जाता है बल्कि वह है जो निशाना बनाता है और हमला करता है. जो निशाने पर है उसे ख़ुद को दुरुस्त करने की ज़रूरत नहीं, हिंसा को अपना अधिकार माननेवाले के इलाज की और उसे नियंत्रित करने की ज़रूरत है.
स्वतंत्रता दिवस पर...
इसीलिए इस स्वाधीनता दिवस पर या आगे मुसलमानों को न तो मदरसे पर या अपनी गाड़ियों पर तिरंगा लगाने की ज़रूरत है और न सस्ते देशप्रेम के शेर भेजकर दुनिया जहान को अपने वतन परस्त होने का सबूत देने की मजबूरी.
जब इस बार एक मुसलमान नौजवान की यह टिप्पणी पढ़ी तो संतोष हुआ कि अब ऐसी पीढ़ी आ गई है जो इस वतन पर अपनी दावेदारी के लिए हिंदुओं की दिलजोई की मजबूरी से बंधी नहीं है.
जैसे कभी किसी ने पिछली सदी में कहा था कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है उसी तरह यह पीढ़ी कह रही है कि इस मुल्क पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे हासिल करने के लिए उसे कुछ भी अलग से करने की बाध्यता नहीं.
बेहतर हो कि हम इस पीढ़ी को सावधानी और सम्मान के साथ सुनें और उसकी पीठ न ठोकें बल्कि हमारा सहारा लेकर जो हाथ उनपर उठ रहे हैं, उन्हें बीच में पकड़ें.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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