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ब्लॉग: 'बोल ना आंटी आऊं क्या, घंटी मैं बजाऊं क्या?'
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
वो क्या होगा जो आपको अपने घर का आराम छोड़कर भरे बाज़ार में एक 'फ़्लैश मॉब' का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करेगा? सोचकर जवाब दीजिएगा.
क्या आप जाएंगे अगर वो 'फ़्लैश मॉब' एक गाने को चिल्लाए और गायक के लिए अपना समर्थन ज़ाहिर करे?
क्या आप जाएंगे अगर वो गाना पड़ोस में रहने वाली आंटी के साथ सेक्स करने के बारे में हो?
क्या आप जाएंगे अगर आप ये जानते हैं कि वो गाना औरतों को इस्तेमाल किए जानेवाले सामान की तरह दिखाता है, ज़बरदस्ती उनके साथ सेक्स को बढ़ावा देता है और इस सबके लिए औरत को ही ज़िम्मेदार बताकर सही ठहराता है?
याद रखिए कि सोशल मीडिया पर गुमनाम रहकर 'ट्रोल' करनेवालों से अलग 'फ़्लैश मॉब' असली लोगों से बनती है जिनकी पहचान की जा सकती है.
इन जवान मर्दों और औरतों को साथ कर ये गाना गाने में कोई परेशानी नहीं थी जिसमें गायक पूछता है, 'बोल ना आंटी आऊं क्या, घंटी मैं बजाऊं क्या?'
गाने में गायक अपनी पड़ोस की आंटी के साथ बहुत हिंसक तरीके से सेक्स करने के बारे में बख़ान करता है.
यूट्यूब पर वीडियो
फिर वो पड़ोस की आंटी को एक ऐसे चरित्र वाली औरत बताता है जो छोटे कपड़े पहनती है, अपने पिता के पैसे उड़ाती है और जिसे 'दस आदमियों के साथ रोज़ सेक्स करने' की आदत है.
डिक़्शनरी इसे 'मिसॉजनी' शब्द की संज्ञा देती है यानी औरतों से घृणा करना, उनकी उपेक्षा करना और उनके ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह रखना.
लेकिन ज़ाहिर है कि सब इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते और क़रीब 30 लाख लोगों ने गाने की वीडियो को यूट्यूब पर देखा है (अब ये वीडियो हटा दिया गया है).
गाना अब भी देखा जा सकता है क्योंकि हज़ारों ने इसे 'शेयर' किया है और अपने निजी पन्नों पर 'पोस्ट' किया है.
इतना ही नहीं, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फ़ेसबुक पर ऐसे दर्जनों 'इवेंट्स' बनाए गए हैं जिनमें लोगों को कहा जा रहा है कि वो भरे बाज़ार या कॉलेज के सामने 'बोल ना आंटी आऊं क्या' चिल्लाने के लिए 'फ़्लैश मॉब' का हिस्सा बनें.
मैंने ऐसी 'फ़्लैश मॉब्स' के दो वीडियो देखे. वो उग्र लग रहे हैं. उन्हें मज़ा आ रहा है. वो शर्मिंदा तो बिल्कुल नहीं हैं.
हिंसा को बढ़ावा
क्या ये इसलिए है कि उन्हें अंदाज़ा ही नहीं कि वो क्या गा रहे हैं?
मॉब में कुछ मर्दों के हाथों के इशारों और कमर और जांघें हिलाने के तरीके से ऐसा लगता तो नहीं है.
या ये इसलिए है कि उन्हें लगता है कि ये बस मज़ा है जिससे किसी को कोई नुक़सान नहीं होगा?
'सिर्फ़ मज़ा' जो एक तरीके से औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा देता है.
जो भरे बाज़ार में जोश-ओ-ख़रोश से 'सेक्सिस्ट' भाषा का इस्तेमाल करता है.
और इस भीड़ में औरतें भी शामिल हैं.
साथ चिल्लातीं, हंसतीं और उतना ही मज़ा लूटतीं.
कौन हैं ये जवान मर्द और औरतें?
सड़क पर जुटी 'मॉब' और इंटरनेट पर घूमती 'मॉब' कितनी अलग है?
जब एक पत्रकार ने इस गाने की आलोचना की तो उसके सोशल मीडिया पन्नों पर उसे बलात्कार की धमकियां दी गईं और फ़ोन पर जान से मारने की धमकियां.
ये सब इतना असभ्य और हिंसक था कि उस समाचार की वेबसाइट को शंका हुई कि कहीं उनकी पत्रकार सचमुच किसी मुसीबत में ना फंस जाए और इससे बचने के लिए वो वीडियो रिपोर्ट हटा दी.
'सिर्फ़ मज़ा' कब ख़तरनाक बन जाता है?
फ़्लैश मॉब की तरह
बॉलीवुड की फ़िल्में भी तो सेक्स का संकेत देते हुए भद्दे शब्दों से भरे गाने इस्तेमाल करती हैं, पीछा करने वाले मर्दों को हीरो दिखाती हैं और शारीरिक संबंध बनाने में औरत की मर्ज़ी का मख़ौल बनाती हैं.
तो अगर एक अनजान सा गायक अपने गाने में भी ऐसा कर रहा है, तो मैं क्यों इतनी परेशान हो रही हूं.
और सैकड़ों जवान मर्द और औरतें अपने घर का आराम छोड़कर एक 'फ़्लैश मॉब' की तरह जुटकर उसे चिल्लाते हैं.
मेरी चिंता उस गायक से नहीं है. उस भीड़ से है.
जो मुझे ये सोचने के लिए मजबूर करती है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार कब उग्र होने का लाइसेंस बन जाता है.
संयम की लक़ीर कहां है? उसे कौन ख़ींचता है और कौन ये तय करता है कि वो पार हो गई है?
मेरा गुस्सा उस गायक से नहीं है. उस भीड़ से है.
जो तैयार नहीं है वो सुनने के लिए जो वो चिल्ला रही है, वो पढ़ने के लिए जो वो लिख रही है और ये देखने के लिए कि उससे क्या नुक़सान हो सकता है.
भारत के वो जवान मर्द और औरतें जो इंटरनेट पर जाकर घृणा की उल्टी करने के लिए व़क्त निकाल रहे हैं और जिन्होंने अब औरतों से नफ़रत को भरे बाज़ार चिल्लाने की प्रेरणा ढूंढ ली है.
क्या आप उस भीड़ का हिस्सा बनना चाहेंगे? सोचकर जवाब दीजिएगा.
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