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नज़रिया: गोरखपुर और फूलपुर उप-चुनाव में क्या रहे बीजेपी की हार के कारण
- Author, शरद गुप्ता
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात और त्रिपुरा में भाजपा की जीत का श्रेय दिया जा रहा था और उन्हें कर्नाटक में पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जा रहा था, वही आदित्यनाथ अपनी लोकसभा सीट को जिताने में असफल रहे.
वहीं, दूसरा चुनाव फूलपुर में था जहां से भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य 52 फीसदी वोट पाकर जीते थे. जिस व्यक्ति ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन चौथाई बहुमत से जिताया और उपमुख्यमंत्री बना, वह अपनी सीट पर पार्टी को नहीं जिता पाया.
आश्चर्यजनक इसलिए भी था क्योंकि पिछले तीस सालों के दौरान देश में या राज्य में लहर चाहें किसी भी दल की हो, गोरखपुर में जीत भाजपा की ही होती थी.
पहले 1989 से 1996 तक महंत अवैद्यनाथ सांसद रहे और उसके बाद से 2017 तक उनके शिष्य रहे योगी आदित्यनाथ. उनके समर्थकों ने नारा गढ़ लिया था - यूपी में रहना है, तो योगी-योगी कहना है.
तो आखिर ये अप्रत्याशित नतीजे आए क्यों? इन दोनों सीटों पर भाजपा के तीन से साढे़ तीन लाख वोट कम कैसे हो गए?
इसके कई कारण हैं.
पहला कि प्रत्याशी चयन में ग़लती हुई, दूसरी बात जाति समीकरण उल्टे बैठे, तीसरी बात पार्टी संगठन से कार्यकर्ता नाराज था, चौथी बात सरकार के कामकाज से लोग नाराज थे और पांचवी बात मोदी व अमित शाह चुनाव प्रचार में गए ही नहीं.
गलत कैंडीडेट
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार योगी ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साफ तौर पर बताया था कि गोरखपुर में केवल गोरखपुर पीठ का व्यक्ति ही जीत सकता है. लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने चुना उपेन्द्र शुक्ला को जो गोरखपुर के क्षेत्रीय अध्यक्ष थे.
गोरखपुर के आसपास के इलाक़े में जगदंबिका पाल को छोड़कर अन्य सभी सांसद ब्राह्मण हैं. ऐसे में एक अन्य ब्राह्मण को चुनाव लड़ाना जातिगत समीकरणों के लिहाज़ से भी ठीक नहीं था.
वैसे भी गोरखपुर में निषाद सहित पिछड़ी जातियां काफ़ी संख्या में हैं. यही वजह है समाजवादी पार्टी ने कभी फूलन देवी को सांसद बनाया था. इसी वजह से सपा के निषाद उम्मीदवार को सजातीय वोट काफ़ी संख्या में मिले.
जाति समीकरण
इनका महत्व मुलायम सिंह ने पहचाना था. तभी 1999 में उन्होंने गोरखपुर से गोरख निषाद को उम्मीदवार बनाया था. एक जनसभा में उन्होंने यादवों की भारी संख्या देखकर कहा था - जब यादव, निषाद यहाँ है तो मुसलमान कहां जाएगें?
ऐसे ही फूलपुर में मौर्य अपनी पत्नी को टिकट दिलाना चाहते थे. लेकिन पार्टी इसके लिए तैयार नहीं थी. पार्टी ने कौशलेंद्र सिंह पटेल को टिकट दिया जो स्थानीय नहीं थे जबकि सपा के उम्मीदवार को स्थानीय होने का लाभ मिला.
इलाहाबाद के तीन मंत्रियों - नंद कुमार गुप्ता नंदी, सिद्धार्थ नाथ सिंह और मौर्य में आपस में नहीं बनती है. पटेल इनमें से किसी की भी पसंद नहीं थे. मौर्य ने भले ही 11 दिन फूलपुर में रुककर सौ से ज्यादा सभाएं संबोधित की, लेकिन नतीजा कुछ और निकला. फूलपुर में दलितों और पिछड़ी जातियों की संख्या लगभग सत्तर प्रतिशत है. सपा और बसपा के साथ आने से सभी ने साझा उम्मीदवार को जमकर वोट दिए.
नाराज लोग, कार्यकर्ता
वहीं, राज्य सरकार के कामकाज से लोग नाराज थे. एक साल के अंदर राज्य सरकार ने किसानों, छात्रों और बुज़ुर्गों संभालकर नाराज किया. बुज़ुर्गों की पेंशन बंद की, छात्रों की स्कॉलरशिप और किसानों की उपज पर चोट की.
इसके अलावा पार्टी का कार्यकर्ता नेतृत्व से नाराज था. नेता उनसे मिलते ही नहीं थे. उनके कोई काम ही नहीं हो रहे थे. इससे संदेश गया कि सत्ता मिलने के बाद नेता मद में चूर हो गए हैं. यही नहीं संगठन का दायित्व संभाल रहे लोग भी कार्यकर्ताओं से कन्नी काचने लगा थे. आखिर कोई भी पार्टी उतनी ही मज़बूत होती है जितनी उसके कार्यकर्ता. यही वजह है कि बीजेपी की हार के जश्न में सपा और बसपा के अलावा कई भाजपा कार्यकर्ता भी शामिल थे.
पार्टी की केंद्रीय और प्रदेश इकाई ने इन चुनावों को कितनी गंभीरता से लिया यह इसी बात से जाहिर है कि न तो मोदी प्रचार के लिए यहाँ गए और न ही अमित शाह. यहाँ तक कि चुनाव के प्रभारी अनूप गुप्ता और शिव नारायण शुक्ला जैसे लाइटवेट लोग बनाए गए थे. से दोनों राज्य इकाई में मंत्री और महामंत्री हैं. इसी से बीजेपी के अंदर ही कई अफ़वाहें गर्म हो गई हैं. क्या पार्टी योगी और मौर्य का क़द कम करना चाहती थी.
गठजोड़ वजह नहीं
यह कहना सही नहीं होगा कि सपा और बसपा के साथ आने से बीजेपी हार गई. पिछले जो चुनावों में इन दोनों पार्टियों को मिले वोट को जोड़ लिया जाए, तब भी वे बीजेपी उम्मीदवार को नहीं हरा पाते.
गोरखपुर में 2009 में सपा उम्मीदवार मनोज तिवारी (जो अब दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष हैं) को 11 फीसदी वोट मिले थे और बसपा के विनय शंकर तिवारी को 24.4 फीसदी वोट मिले थे. हालांकि दोनों मिल कर भी योगी आदित्यनाथ को हरा नहीं पाते क्योंकि उन्हें लगभग 54 फीसदी वोट मिले थे.
2014 में मोदी लहर के बावजूद योगी को पिछली बार से दो फीसदी वोट कम मिले लेकिन सपा के 22 और बसपा के 17 फीसदी वोटों को मिला दिया जाए तो भी उन्हें हराने में नाकामयाब रहते. यही हालत फूलपुर की भी थी.
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