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'लो प्रोफ़ाइल' नेता को मायावती ने क्यों बनाया था उम्मीदवार?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की दसवीं सीट के चुनाव को बेहद रोमांचक बनाने वाले अनिल अग्रवाल और भीमराव आंबेडकर में चुनाव के दौरान न सिर्फ़ संख्या बल का अंतर था बल्कि दोनों की आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक स्थिति में भी ज़मीन-आसमान का अंतर है.
ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले अनिल अग्रवाल पेशे से इंजीनियर रहे हैं और ग़ाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण में तैनात थे. लेकिन बाद में नौकरी छोड़कर उन्होंने शिक्षा जगत को अपना व्यवसाय बनाया और आज ग़ाज़ियाबाद और मेरठ में उनके कई व्यावसायिक शिक्षण संस्थान हैं.
दो साल पहले बीजेपी से जुड़े
अरबों रुपये के मालिक अनिल अग्रवाल इससे पहले भी राजनीति में हाथ आज़मा चुके हैं. दो साल पहले ही वो बीजेपी में शामिल हुए थे और उनके जानने वालों के मुताबिक़ पहले वो ग़ाज़ियाबाद नगर निगम में मेयर का टिकट लेना चाहते थे लेकिन टिकट नहीं मिल सका.
ग़ाज़ियाबाद के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि बीजेपी ने टिकट तो उन्हें इस बार भी नहीं दिया था, हां समर्थन ज़रूर दिया था.
उनके मुताबिक़, "अनिल अग्रवाल को समर्थन सिर्फ़ इसलिए दिया गया था कि यदि आप जीत सकते हों तो जीत लीजिए, हम अपने बचे वोट आपको दे देंगे. इस चुनाव में पैसा कितना अहम होता है, ये सबको पता है. हां, ये ज़रूर है कि प्रतिष्ठा फंस जाने के कारण बीजेपी ने अपनी ताक़त भी लगा दी उन्हें जिताने में."
अनिल अग्रवाल इससे पहले भी 2014 में शिक्षक कोटे से विधान परिषद का चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इस कोटे में वही शिक्षक मतदाता होते हैं जो कि सहायता प्राप्त इंटरमीडिएट कॉलेजों में पढ़ाते हैं.
मायावती के क़रीबी आंबेडकर
दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी के घोषित उम्मीदवार भीमराव आंबेडकर बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. इटावा के रहने वाले आंबेडकर बीएसपी की स्थापना के साथ ही इस पार्टी से जुड़े हैं और 2007 में इटावा ज़िले की लखना सीट से एक बार विधानसभा का चुनाव भी जीत चुके हैं. बीएसपी के टिकट पर उन्होंने 2017 का चुनाव भी लड़ा था लेकिन हार गए थे.
इटावा में वरिष्ठ पत्रकार और भीमराव आंबेडकर के पड़ोसी दिनेश शाक्य बताते हैं, "भीमराव आंबेडकर बीएसपी के ज़िलाध्यक्ष भी रहे हैं. मायावती के बेहद क़रीबी रहे हैं लेकिन मायावती की नाराज़गी भी झेल चुके हैं. उनकी पत्नी एक डिग्री कॉलेज में क्लर्क हैं और ख़ुद शुरू से बीएसपी के नेता और कार्यकर्ता रहे हैं. इटावा में वो अपने पुराने मकान में रहते हैं और उसे देखकर कोई ये नहीं कह सकता है कि ये पूर्व विधायक का मकान है."
अग्रवाल हाई प्रोफ़ाइल, आंबेडकर लो प्रोफ़ाइल
बीएसपी ने जब आंबेडकर को राज्यसभा का इतना अहम टिकट दिया तो राजनीति के दिग्गज भी चौंक गए थे क्योंकि बीएसपी में इस समय ज़ोनल को-ऑर्डिनेटर होने के बावजूद वो पार्टी में एक 'लो प्रोफ़ाइल' नेता के तौर पर ही जाने जाते हैं, बहुत चर्चा में नहीं रहते.
बीबीसी से बातचीत में आंबेडकर का कहना था, "पार्टी का आदेश हमारे लिए सब कुछ है. पार्टी ने कहा कि राज्यसभा लड़ना है, हम लड़े. इससे पहले पार्टी ने विधानसभा का भी टिकट दिया, हम जीते भी और हारे भी लेकिन लड़े हमेशा पूरी ताक़त से थे."
राज्यसभा चुनाव में आर्थिक पृष्ठभूमि की अहमियत पर आंबेडकर कोई सीधी टिप्पणी तो नहीं करते लेकिन 'पैसा और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग' को अपनी हार का प्रमुख कारण बताते हैं.
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