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एक ऐसा घर जहां से कूड़ा निकलता ही नहीं
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
दिल्ली से सटे नोएडा में एक दुकानदार और एक ग्राहक के बीच बहस चल रही थी.
दरअसल ग्राहक साहब ऑफ़िस से घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में उनकी बीवी का फोन आया, "दूध लेते आइएगा"
वो दूध लेने के लिए घर के बगल में किराने की दुकान पर पहुंचे. दुकानदार ने दूध का पैकेट निकाल कर मेज़ पर रख दिया. ग्राहक ने प्लास्टिक की थैली में दूध देने की मांग की.
जवाब में दुकानदार ने कहा, "सरकार ने प्लास्टिक बैन कर दिया है. अब दुकानों में प्लास्टिक मिला तो लाखों का जुर्माना लगेगा. हमने प्लास्टिक रखना बंद कर दिया है."
ग्राहक ने गुस्से में कहा, " दूध भर कर ले जाने वाले प्लास्टिक पर बैन लगा दिया, लेकिन पैकिंग वाले प्लास्टिक का क्या? दूध भी तो प्लास्टिक में ही पैक हो रहा है." इतना बोलकर ग्राहक दूध का पैकेट हाथ में उठा कर वहां से निकल लिए.
लेकिन उनके इस सवाल ने समाज की एक बड़ी सच्चाई उजागर की.
हाल ही में देश के दो बड़े राज्यों - उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में प्लास्टिक पर पाबंदी लगा दी गई है. यह पाबंदी सिर्फ ज़्यादा नुक़सानदेह मानी जाने वाली प्लास्टिक पर लगाई गई है.
पर पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक भी कम नुकसानदायक नहीं. आखिर इस प्लास्टिक की समस्या से कैसे निपटा जाए?
इस समस्या का हल है - ज़ीरो वेस्ट वाला घर.
जी हां! आप सही समझे हैं. जीरो वेस्ट वाला घर यानी जहां से कूड़ा ही न निकले. कोई सामान फेंकने वाला न हो.
क्या आप एक साफ़ सुथरे ऐसे घर की कल्पना कर सकते हैं जिसमें कोई कूड़ेदान न हो?
अगर घर में पति-पत्नी के साथ छोटे बच्चे भी रहते हों तब तो शायद ये कल्पना संभव ही न हो.
लेकिन बेंगलुरू में रहने वाली दुर्गेश नंदनी के लिए ये बिलकुल भी मुश्किल नहीं.
दुर्गेश की दो बेटियां है. छोटी बेटी सिर्फ दो महीने की और दूसरी पांच साल की. बावजूद इसके वो अपने घर को बिना कूड़ेदान वाला घर बनाने में कामयाब रही है.
बेटी के सवाल
इसकी शुरुआत तीन साल पहले हुई.
दुर्गेश याद करते हुए बताती हैं, "मैं अपनी बड़ी बेटी के साथ कहीं जा रही थी. रास्ते में हमने दुकान से सामान खरीदा, सामान को प्लास्टिक बैग में लेने की जगह हमने सीधे हाथ में लिया. हमने दुकानदार को प्लास्टिक देने से मना किया था. बेटी ने दुकान से बाहर निकलते ही पूछा मम्मा आपने प्लास्टिक क्यों नहीं लिया."
बेटी का सवाल जितनी फुर्ती से आया दुर्गेश ने भी जवाब देने में उतनी ही चुस्ती दिखाई.
तुरंत कहा, "बेटा, प्लास्टिक गलता नहीं है. इसे इधर उधर फेंक दें और जानवर खाएं तो उन्हें दिक्कत होती है. प्रदूषण फैलता है"
फिर क्या था, मां - बेटी के बीच सवाल-जवाब का सिलसिला चल पड़ा.
बेटी ने फिर से पूछा, "आखिर प्लास्टिक क्यों नहीं गलता मम्मा?"
बेटी के इस एक सवाल ने दुर्गेश को सोचने पर मजबूर कर दिया की आखिर कैसे दो साल के बच्चे को प्लास्टिक क्यों नहीं गलता ये समझाया जाए?
फिर दुर्गेश ने वही किया जो बाकी लोग करते हैं. गूगल का सहारा लिया, कई रातों की नींद खराब की ये पता लगाने के लिए कि आखिर प्लास्टिक क्यों नहीं गलता.
उन्होंने लॉरेन सिंगर का ब्लॉग पढ़ा और 'ज़ीरो वेस्ट' के कॉन्सेप्ट को अपनाने का फैसला किया.
लॉरेन सिंगर, पर्यावरण के लिए काम करने के लिए जानी जाती है. वो 'ज़ीरो वेस्ट' पर अपने पाठकों को जागरुक करती हैं और अपनी जीवन शैली में अपनाने के लिए प्रेरित भी करती हैं.
बस फिर क्या था, उसी दिन से दुर्गेश के जीवन में बड़ा बदलाव किया.
ये बदलाव कुछ यूं थेः
•दुर्गेश का पूरा परिवार अब दो समय कच्ची सब्ज़ियां और फल खाने में खाते हैं.
•बाहर से खाना कभी नहीं मंगाते.
•प्लास्टिक के पैकेट का दूध इस्तेमाल नहीं करते. घर पर ही ग्वाला आता है और दूध दे जाता है.
•अपनी छोटी बेटी के लिए डायपर का इस्तेमाल तक नहीं करती, कपड़े के डायपर का इस्तेमाल करती है.
•दुर्गेश खुद सेनिटेरी पैड का इस्तेमाल नहीं करती. अब वो कप का इस्तेमाल करने लगी है.
•पति और बेटी का टिफिन भी वो फॉयल में पैक कर नहीं देती. सिर्फ बर्तन का इस्तेमाल करती है.
क्या हैं समस्याएं?
इतना सब करने के बाद भी कुछ कूड़ा घर पर हो ही जाता है.
वो कौन सी चीज़ है जो उन्हें पूरी तरह अब भी 'जीरो वेस्ट' बनने नहीं दे रही?
इस सवाल के जवाब में वो बड़ी से सादगी से कहतीं हैं, "घर पर मिलने के लिए आने वाले मेहमान बच्चों के लिए चिप्स का पैकेट और चॉकलेट लेकर आते हैं. उनका क्या करूं ये समझ में नहीं आता. रिसाइकल करने वाले भी इतनी छोटी-छोटी लेने से मना कर देते हैं."
फिर वो उनका क्या करती हैं?
दुर्गेश इसे अपने लिए सही मानती हैं. उनके मुताबिक अमूमन वो ऐसे गिफ्ट लेने से मना कर देती हैं. लेकिन जहां मुमकिन नहीं होता वहां गिफ्ट के साथ-साथ उसके रैपर को भी संभाल कर रखती है.
मिनिमिलाइजेशन
अब वो कोई भी चीज़ खरीदती हैं तो उसके पहले 10 बार सोचती हैं - क्या वाकई में उस चीज़ की जरूरत है.
चाहे वो बच्ची के लिए खिलौने हो या फिर घर के लिए कोई सामान. इसे साइंस में 'मिनिमिलाइजेशन' कहते हैं.
उनके मुताबिक तीन साल पहले उनके घर से एक थैला कूड़ा रोज़ निकलता था. लेकिन आज सालभर में एक थैला कूड़ा निकलता है.
तीन साल में इनकी ज़िंगदी ऐसे बदल गई है.
एक सवाल जो दुर्गेश से पूछना बनता है, वह यह कि आखिर घर से निकलने वाले किचन के कूड़े का वो क्या करती हैं? जैसे सब्जी, फल, चायपत्ति …
इस सवाल पर वो घर में पड़े टैराकोटा के बर्तन की फोटो दिखाती है. घर के किचन से निकलने वाले सब्जी, फल, चायपत्ति को उन्हीं बरतन में डाल कर गलने छोड़ देती हैं. उन्हें सुखाती हैं और फिर पीस कर खाद बना देती हैं.
वो अपने घर पर पौधे नहीं रखतीं इसलिए ऐसे बना हुआ खाद पड़ोसियों को बांट देती है.
जानी मानी पर्यावरणविद् और सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायरमेंट की अध्यक्ष सुनीता नारायण ने भारतीयों के हर घर से निकलने वाले कचड़े पर एक किताब लिखी है - "नॉट इन मई बैकयार्ड".
इस किताब के मुताबिक हर घर से रोज़ाना 100 ग्राम के आसपास का प्लास्टिक कचड़ा निकलता है. यानी महीने में तकरीबन 3 किलो और साल में तकरीबन 10 किलो के आसपास प्लास्टिक कचड़ा देश के हर घर से निकलता है.
लेकिन हर घर दुर्गेश वाली ज़ीरो वेस्ट की तकनीक अपना लें तो देश की एक बड़ी समस्या से निजात मिल सकती है.
सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायरमेंट के च्रंदभूषण के मुताबिक, "ज़ीरो वेस्ट वाला घर बनाना मुश्किल नहीं है. उसके लिए बस निश्चय करने की देर है. इससे केवल प्लास्टिक, प्रदूषण और जानवरों की मौत की समस्या नहीं सुलझेगी. इससे लैंडफिल साइट और नालों के ओवर फ्लो होने की भी समस्या सुलझेगी."
उनके मुताबिक प्लास्टिक पर पाबंदी समस्या का हल नहीं है. ये जल्दबाजी में लिया गया कदम है. 'जीरो वेस्ट' अपनाना इस समस्या से लड़ने का सबसे असरदार तरीका है.
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