आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
शौचालय बनवाने के सरकारी फ़रमान से परेशान बिहार के मिड डे मील वर्कर
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
कुमांती देवी बीते 10 साल से बिहार के पूर्वी चंपारण के हरसिद्धि प्रखंड के एक सरकारी स्कूल में रसोइये का काम करती हैं.
उन्हें रोज़ाना 350 बच्चों का मिड डे मील चूल्हे पर तैयार करना होता है. उनकी छाती में दर्द रहता है लेकिन अब इस दर्द के अलावा अब कुमांती देवी को एक नई परेशानी ने आ घेरा है.
नई परेशानी है, बिहार सरकार के शिक्षा विभाग का फरमान जो 12 जुलाई को आया.
इसके मुताबिक़, मिड डे मील में कार्यरत रसोइये अगर 15 अगस्त 2018 तक अपने घर में शौचालय नहीं बनवाते हैं तो उनकी सेवाएं समाप्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी.
परेशान कुमांती कहती हैं, "महीना में 1250 रुपया मिलता है, बाल बच्चा का पेट पालें या कर्ज़ा लेकर शौचालय बनवाएं?"
"हमारे साथ तो ऐसा है कि पहले माट साब (मास्टर साहब) पैखाना साफ़ करवाते थे और अब कहते हैं शौचालय बनवाओ नहीं तो निकाल देंगें."
जागरूकता की दलील
लेकिन कुमांती देवी अकेली नहीं हैं जो इस नए फ़रमान के चलते परेशान हैं.
बिहार में सरकारी स्कूलों की मिड डे मील योजना से जुड़े कुल सवा दो लाख में से ज़्यादातर लोग इस 'धमकी' से सहमे हुए हैं.
हालांकि मिड डे मील के उप निदेशक जीवेन्द्र झा इस सरकारी फ़रमान को किसी 'धमकी' की तरह नहीं देखते.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "ये पत्र रसोइयों को जागरूक करने के लिए जारी किया गया है. उन्हें डराने और धमकाने के लिए नहीं."
वैसे सेवाएं समाप्त करने की कार्रवाई के संबंध में उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया.
'सुकून छीन लिया है'
जमुई ज़िले के केन्हर उत्क्रमित मध्य विद्यालय की ललिता देवी सुबह 9 बजे से दोपहर तीन बजे तक स्कूल में काम करती हैं.
अपने तीन साथी रसोइयों के साथ वो 300 बच्चों का खाना तैयार करती हैं.
दो बच्चों की मां ललिता को इस बात से थोड़ी राहत में हैं कि बहुत से दूसरे रसोइयों की तरह उन्हें चूल्हा नहीं फूंकना पड़ता.
उनके स्कूल में गैस पर खाना बनता है लेकिन बीते दिनों स्कूल की 'चेकिंग' पर आए कुछ लोगों ने उनका सुकून छीन लिया.
वो कहती हैं, "पति दुखन खेत में काम करते हैं, हम स्कूल में खटते हैं. चेकिंग वाला आता है और कहता है शौचालय बनवाओ नहीं तो नौकरी चली जाएगी."
मिड डे मील योजना
रसोइयों की परेशानी सिर्फ़ शौचालय बनवाने तक ही नहीं है, मुश्किलें और भी हैं.
एक तो उनकी महीने की पगार 1250 रुपये है जिसे इस महंगाई के दौर में किसी भी लिहाज़ से अच्छा नहीं कहा जा सकता. दूसरा ये पैसा भी उन्हें नियमित रूप से नहीं मिलता है.
बिहार के सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा से आठवीं क्लास तक मिलने वाले मिड डे मील (दोपहर का भोजन) का एक करोड़ 28 लाख बच्चे लाभ उठाते हैं. जबकि एक करोड़ 90 लाख बच्चों के नाम स्कूल में रजिस्टर्ड हैं.
सुप्रीम कोर्ट के सुपरविज़न में चलने वाली इस योजना में रसोइयों को हर महीने 1000 रुपये का भुगतान केंद्र सरकार की तरफ़ से मिलता है जबकि बिहार सरकार अतिरिक्त 250 रुपये देती है.
मार्च और जून की मज़दूरी नहीं
ये मानदेय उन्हें साल के सिर्फ़ 10 महीने ही मिलता है. मार्च और जून का मानदेय नहीं देने का प्रावधान है. हालांकि मार्च महीने में भी रसोइये काम करते हैं.
रसोइयों की मांगों को लेकर काम करने वाले दिनेश कुशवाहा बताते हैं, "इस साल भी मार्च में 23 दिन रसोइयों से काम करवाया गया."
"इसके अलावा चुनाव हों या स्कूल में किसी तरह का दूसरा आयोजन, रसोइयों से बंधुआ मजदूरों की तरह काम करवाया जाता है."
पटना से लगे फतुहा प्रखंड की सोना देवी को 8 माह से मानदेय नहीं मिला है.
तीन बच्चों की मां सोना देवी बांकीपुर प्राथमिक कन्या विद्यालय में रसोइये का काम करती हैं.
सोना देवी कहती हैं "निर्माण मज़दूर की न्यूनतम मज़दूरी 300 रुपये रोज़ाना है लेकिन सरकार तो हमें 100 रुपये की दिहाड़ी भी नहीं देती है."
"पैसा भी वक़्त पर नहीं मिलता है, प्रभारी कहता है ऊपर से आएगा तभी मिलेगा."
रसोइयों की मांग
हाल ही में रोहतास के बैसपुरा गांव में कंचन देवी नाम की रसोइया ने अपने 16 साल के बेटे को ज़हर देकर ख़ुद भी आत्महत्या कर ली थी.
एक हिंदी दैनिक से जुड़े स्थानीय पत्रकार अमर बताते है, "कंचन देवी को सात महीने से मानदेय नहीं मिला था. जिसके चलते पति की मौत के बाद से ही आर्थिक तौर पर तंगहाली झेल रही कंचन परेशान हो गई थीं."
बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ लगातार सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर रसोइयों को 18 हज़ार रुपये का मासिक वेतन, उन्हें सरकारी कर्मचारी घोषित करने और मानदेय के नियमित भुगतान की मांग कर रहा है.
संघ की राज्य अध्यक्ष सरोज चौबे कहती हैं, "हमारे संघ के सदस्य कर्ज़ लेकर शौचालय नहीं बनवाएंगे. सरकार उन्हें शौचालय बनवाकर दे. ये फ़रमान जारी करके रसोइयों को बेरोज़गार करने की कोशिश की तो संगठन शांत नहीं रहेगा."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)