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क्या सपा, बसपा एक दूसरे को अपना वोट दिला पाएंगे?
- Author, अभिमन्यु कुमार साहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
लखनऊ के एक पांच सितारा होटल में शनिवार दोपहर बारह बजे अखिलेश यादव और मायावती ने आगामी आम चुनावों को लेकर गठबंधन की औपचारिक घोषणा कर दी है.
इस साल की शुरुआत और मध्य में उत्तर प्रदेश में हुए लोकसभा उपचुनावों में दोनों की जोड़ी कामयाब रही थी.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के गढ़ में सपा-बसपा की जोड़ी ने जीत का डंका बजाया था और तब से ये कयास लगाए जा रहे थे कि लोकसभा चुनावों के मद्देनदज़र दोनों हाथ मिला लेंगे.
सामाजिक समीकरण के हिसाब से बसपा और सपा की जोड़ी पहले भी हिट रही है और यह तय माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी को इसका खामियाज़ा भुगतना होगा.
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि दोनों पार्टियों का अपना-अपना वोट बैंक है, जिसके एक साथ आने पर राजनीतिक तौर पर वह 'विनिंग कॉम्बिनेशन' बनाते हैं.
1993 में जब सपा-बसपा साथ आए थे
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी भी इस गठबंधन को 'विनिंग कॉम्बिनेशन' मानते हैं और उसे भाजपा के लिए बड़ी चुनौती के रूप में देखते हैं.
वो बताते हैं, "हम 1993 का उदाहरण ले सकते हैं, जब पहली बार कांशीराम और मुलायम सिंह ने हाथ मिलाया था, उस वक़्त नारा लगा था 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम'."
"उस समय भाजपा की बाबरी विघ्वंस के बाद हवा चल रही थी. वो राजनीति में छलांगें लगाने की कोशिश में थी लेकिन कांशीराम-मुलायम की जोड़ी ने भाजपा को शिकस्त दी."
नवीन जोशी कहते हैं कि लगभग उसी तरह का दृश्य आज बन रहा है. काफ़ी कुछ बदला भी है, कांशीराम नहीं है, मुलायम सिंह यादव नहीं है, अब उनकी नई पीढ़ी है, मायावती हैं और अखिलेश हैं.
वो मानते हैं कि सपा-बसपा के एक हो जाने से उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुत ही तगड़ा मुक़ाबला मिलने वाला है.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी भी इस जोड़ी को विनिंग कॉम्बिनेशन मानते हैं. वो कहते हैं कि इस साल हुए उपचुनावों में दोनों पार्टियों के बीच औपचारिक गठबंधन नहीं था, फिर भी दोनों की जोड़ी कामयाब रही.
वो कहते हैं, "इस गठबंधन से खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़े-दलित और अल्पसंख्यक समुदाय में एकजुटता आएगी, जो कहीं न कहीं भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी."
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कांग्रेस को गठबंधन में जगह क्यों नहीं
सपा और बसपा के गठबंधन में कांग्रेस की जगह नहीं मिली है.
मायावती और अखिलेश पहले से ये कहते आ रहे हैं कि वो साथ मिलकर चलेंगे और उन्हें किसी और राष्ट्रीय पार्टी की ज़रूरत नहीं है. वहीं कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर लड़ने का इशारा कर चुकी है.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं कि इस स्थिति से सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस को फायदा होगा और भाजपा को नुक़सान.
वो कहते हैं, "कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में जो सवर्ण वोटर है, वो सपा और बसपा, दोनों को पसंद नहीं करता है. ऐसे में सभी 80 सीटों पर कांग्रेस का अकेले लड़ना भाजपा के सामने मुश्किल पैदा करेगा."
वहीं नवीन जोशी गठबंधन में कांग्रेस के नहीं होने की दो वजहें मानते हैं.
पहला, दोनों पार्टियों का जन्म गैर-कांग्रेसवाद से हुआ है. हालांकि उसकी जगह आज भाजपा ले चुकी है. लेकिन कांग्रेस की उनकी दूरी बनी रहेगी. राजस्थान और मध्य प्रदेश में यह एक तरह की रणनीति ही थी कि मायावती कांग्रेस के साथ नहीं आईं. वो ज़्यादा सीटों की मांग भी कर रही थीं.
लेकिन वहां भी गठबंधन होता तो उतना फायदा नहीं होता क्योंकि भाजपा से नाराज सवर्ण वोटर फिर से भाजपा की ओर रुख कर सकते थे.
नवीन जोशी दूसरी वजह गिनाते हैं, "उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पैर जमीन से उखड़े हुए हैं. साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में वो किसी तरह से दो सीटें ही जीत पाई थी."
"कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में जमीन ख़त्म है और गठबंधन उन्हें सीटों के मामले में बड़ा शेयर नहीं दे सकता था. चार से पांच सीटें अगर कांग्रेस को दी जाती तो वो उनके लिए फायदे का सौदा नहीं होता."
हालांकि ये भी स्पष्ट है कि रणनीतिक तौर पर सपा-बसपा का गठबंधन चुनावों के बाद कांग्रेस का साथ देगा.
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माया-अखिलेश एक-दूसरे को अपना वोट दिला पाएंगे
मायावती और अखिलेश के गठबंधन की घोषणा के बाद दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वो चुनावों में अपना वोट एक-दूसरे को दिला पाए.
राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि बसपा के लिए ऐसा करना आसान होगा, पर सपा के लिए मुश्किलों भरा.
इस साल हुए उपचुनावों में सपा के उम्मीदवार मैदान में थे और उन्हें बसपा वोटरों का समर्थन मिला था. लेकिन आगामी चुनावों में बारी सपा की होगी.
सपा के वोटर बसपा के उम्मीदवारों को कितना समर्थन देंगे? इस सवाल पर नवीन जोशी कहते हैं, "मायावती वोट ट्रांसफर कराने में माहिर हैं. किसी भी चुनाव में जब भी बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन किसी से हुआ, तो वो अपना वोट बैंक पूरा का पूरा सहयोगी दल को ट्रांसफर करवा देती थीं."
"इस मायने में समाजवादी पार्टी को फायदा ज्यादा होगा. यही कारण है कि अखिलेश यादव दो-चार सीटें कम भी मिलेगी तो वो गठबंधन चलाएंगे."
वो आगे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश या फिर भारतीय समाज में हम पाते हैं कि यादव जातियां दलितों से दूरी बनाए रखती हैं.
सवर्ण जातियों से ज़्यादा दलितों से बैर यादवों का रहा है. जब भी सपा-बसपा का गठबंधन होता है तो यादव समाज का पूरा का पूरा वोट मायावती की पार्टी को ट्रांसफर नहीं होता. ये पुरानी मानसिकता के चलते होता रहा है.
"लेकिन बसपा के साथ ये है कि मायावती का आदेश उनके वोट बैंक के लिए 'बह्म वाक्य' है. बहनजी ने कह दिया तो उनके वोटर सुबह उठेंगे, मुंह धोएंगे और नास्ता करने से पहले वोट डाल कर चले आएंगे."
लेकिन मायावती का फायदा ये है कि उनके पास 22 फीसदी वोट हर समय मौजूद रहता है, अगर पांच फीसदी वोट भी उन्हें मिल जाता है तो उनकी स्थिति बहुत अच्छी हो जाएगी.
वहीं रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं कि योगी आदित्यनाथ के राज में यादवों को प्रशासन खेमे से दरकिनार कर दिया गया.
"यादवों को यह यकीन हो गया है कि भाजपा उनके लिए ठीक नहीं है. ऐसे में यादवों को बसपा को समर्थन देना उनकी मजबूरी होगी."
मुसलमान किसके तरफ
गठबंधन के बाद मुस्लिम वोटर कहां जाएंगे? वो गठबंधन की ओर रुख करेंगे या फिर कांग्रेस की तरफ? क्या उनके सामने दुविधा की स्थिति होगी?
नवीन जोशी समझाते हैं कि मुसलमान वोटरों के लिए दुविधा की स्थिति है नहीं. उन्हें भाजपा को हराने के लिए वोट देना है और भाजपा को हराने वाला एक बड़ा गठबंधन राज्य में आ गया है.
कांग्रेस से उनकी दूरी 1992 के बाद से बनी हुई है. वक़्त के साथ यह दूरी थोड़ी मिटी भी है तो वह चुनावों में बहुत काम नहीं कर पाएगी.
रायबरेली और अमेठी का बात छोड़ दें तो कांग्रेस अन्य जगहों पर जीतने की स्थिति में नहीं है. ऐसे में मुसलमान वोटरों के सामने दुविधा की स्थिति नहीं है. वो समय-समय पर बसपा के साथ रहे हैं और सपा का भी उन्होंने साथ दिया है.
जब दोनों एक साथ आ चुके हैं तो उनकी दुविधा खत्म लगभग खत्म हो गई है.
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