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वो कश्मीरी, जिनके घर एनकाउंटर में जल गए, तबाह हो गए
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
नसरीना बानो उम्मीदों और नाउम्मीदियों के बीच जी रही हैं.
वो कुछ पलों के लिए बहुत धीमी आवाज़ में बोलती हैं, फिर एक लंबी चुप्पी छा जाती है. इसके बाद वो बताती हैं कि उन्हें किस तरह की तकलीफ़ों का सामना कर पड़ रहा है, वो कितनी असहाय और निराश हैं... लेकिन फिर उनकी आंखों में एक प्रण नज़र आता है. प्रण ये कि चाहे जैसे भी हो, वो अपने बच्चों के लिए जिएंगी.
वो कहती हैं, "कोई किसी की परवाह नहीं करता. सबके पास अपनी समस्याएं हैं. मेरी समस्याएं सिर्फ़ मेरी हैं, किसी और की नहीं. मुझे नहीं लगता कि मैं ख़ुद पर लादे गए सारे बोझ उठा सकती हूं लेकिन मुझे ये करना ही होगा. मेरे तीन छोटे बच्चे हैं, मुझे उनकी देखभाल करनी है."
नसरीना जैसे ही अपने उजड़े घर में कदम रखती हैं, उनका चेहरा अपने आप ग़ुस्से से तमतमा उठता है. वो अपने घर की टूटी हुई दीवारों की ओर इशारा करती हैं और बताती हैं कि एनकाउंटर वाली रात उनके घर की दीवारों पर गोलियां कैसे हमेशा के लिए अपने निशान छोड़ गई.
उस रात के ख़ौफ़ ने आज भी नसरीना को छोड़ा नहीं है.
सब गहरी नींद में थे और एनकाउंटर शुरू हो गया
21 अक्टूबर, 2018 को नसरीना की दुनिया अचानक बदल गई जब सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच हुए एनकाउंटर में उनका दोमंज़िला मकान बुरी तरह टूट गया. वो आधी रात का वक़्त था. नसरीना और उनका परिवार गहरी नींद में सो रहा था, जब अचानक दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले में स्थित उनके गांव में एनकाउंटर शुरू हो गया.
नसरीना याद करती हैं, "रात के लगभग 10 बजे होंगे जब तीन चरमपंथी पनाह मांगते हुए हमारे घर में घुस गए. हमने उन्हें पनाह देने इनकार कर दिया लेकिन वो हमें अनसुना करते हुए कमरे में घुस गए. जिस वक़्त सेना ने हमारे घर को चारों ओर से घेर लिया, तब हम सब सो रहे थे. फिर अचानक हमें गोलियों की आवाज़ें सुनाई दीं और हम जग गए. सुबह तीन बजे से लेकर सात बजे तक हम सब घर के अंदर ही रहे."
"हमारे घर को निशाना बनाकर लगातार फ़ायरिंग हो रही थी. किसी तरह हमारे पड़ोसियों ने सुरक्षाबलों को बताया कि घर में एक परिवार भी है. शुरू में सेना ने पड़ोसियों की बात पर यक़ीन नहीं किया लेकिन फिर वो हमें बाहर ले गए. सुबह 11 बजे जब फ़ायरिंग बंद हुई तब हम वापस अपने घर में आए. वहां आकर हमने जो कुछ देखा उससे हमें गहरा धक्का लगा. हमारा घर जैसे राख में तब्दील हो चुका था. वहां कुछ भी नहीं बचा था, बर्बादी के सिवाय. हम नहीं जानते थे कि हमारे घर को कैसे जलाया और बर्बाद किया गया."
कुछ दिनों बाद पति की लाश मिली...
इसके कुछ दिनों बाद ही नसरीना पर बदक़िस्मती की दूसरी मार पड़ी. उनके पति शिराज़ अहमद को दो अज्ञात बंदूकधारी उनके गांव से दिनदहाड़े अगवा करके ले गए. इसके 40 दिनों बाद शिराज़ की लाश शोपियां ज़िले के एक बगीचे में पड़ी मिली.
पुलिस ने जम्मू-कश्मीर के मानवाधिकार आयोग को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया कि शिराज़ की हत्या जैश और हिज़्बुल के चरमपंथियों ने की थी. लेकिन नसरीना कहती हैं कि उन्हें नहीं मालूम कि उनके पति को असल में किसने मारा क्योंकि किसी ने शिराज़ के अपहरण और हत्या की ज़िम्मेदारी नहीं ली.
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18 अक्टूबर की रात नसरीना और शिराज़ के घर में जो एनकाउंटर हुआ था, पुलिस ने इसमें जैश-ए-मोहम्मद के तीन चरमपंथियों को मारे जाने का दावा किया था. अपने पति को खोने के बाद नसरीना अकेले ही सभी चुनौतियों का सामना कर रही हैं.
वो कहती हैं, "एक तो मैंने अपनी सारी संपत्ति खोई, आशियाना खोया और दूसरे अपने शौहर को खोया. अब मेरी सारी उम्मीदें अपने तीनों बच्चों से ही हैं. लेकिन मैं उनके लिए कर भी क्या सकती हूं क्योंकि उन्हें अच्छी तरह बड़ा करने के लिए मेरे पास कोई सुविधा ही नहीं है."
बेघर होने के बाद नसरीना अपने तीनों बच्चों के साथ एक पड़ोसी के घर में रहती हैं. उन्हें नहीं मालूम कि आगे वो क्या करेंगी और कैसे जिएंगी.
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नसरीना के मुताबिक़ उन्हें अब तक सरकार की ओर से कोई मुआवज़ा नहीं मिला है लेकिन गांव के लोगों ने आपस में कुछ हज़ार रुपये इकट्ठे करके उन्हें ज़रूर दिए.
वो उदास मन से बताती हैं कि इस बर्बादी से न सिर्फ़ उनकी सेहत और दौलत को नुक़सान हुआ बल्कि उनके बच्चों की तालीम पर भी बुरा असर पड़ा.
नसरीना कहती हैं, "मुझे ये फ़िक्र सताती है कि मेरे बच्चों को अच्छी तालीम कैसे मिलेगी? आज की दुनिया में अच्छी पढ़ाई न हो तो कोई आप पर ध्यान नहीं देता. जब मेरे बच्चों के पिता ही ज़िंदा नहीं हैं तो उनकी शिक्षा की चिंता कौन करेगा. मैंने सोचा है कि अपने बच्चों का नाम सरकारी स्कूल में लिखाऊंगी क्योंकि मैं प्राइवेट स्कूल का ख़र्च नहीं उठा सकती."
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'मैंने कहा, मुझे ही गोली मार दो'
40 साल की महमूदा की कहानी भी नसरीना से ही मिलती-जुलती है. वो अब अपने पिता के घर में रहती हैं.
5 जनवरी, 2019 को त्राल स्थित गांव में बसे उनके घर में सुबह-सुबह ही कुछ सुरक्षाबल घुस आए. सुरक्षाबलों को ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी कि कुछ चरमपंथी महमूदा के घर में छिपे हुए हैं. हालांकि महमूदा का दावा है कि उनके घर में कोई चरमपंथी नहीं छिपा था.
वो कहती हैं कि उन्हें बिना किसी वजह के ही जेल में डाल दिया गया.
महमूदा का घर मलबे में तब्दील कर दिया गया था और उन्हें घर में अपना एक भी सामान नहीं मिला.
वो कहती हैं, "ये सुबह-सुबह की बात है जब सेना ने हमारे घर को घेर लिया. मैं सोकर उठी ही थी और सुबह की चाय बना रही थी जब सैनिक मेरे घर में दाख़िल हुए और कुछ वक़्त के लिए मुझे बाहर निकलने को कहा. मैंने उनसे पूछा कि आख़िर मामला क्या है. उन्होंने कहा कि उन्हें मेरे घर की तलाशी लेनी है."
"मैंने उनका पूरा सहयोग किया. मैंने उनसे कहा कि अगर उनके मन में कोई शक़ है तो मैं घर के खिड़कियां और दरवाजे खोल देती हूं. ये कहकर मैं अपने बच्चों को लेकर घर से बाहर निकल गई. इसके बाद सुरक्षाबल सीधे हमारे घर के दूसरे माले पर चले गए और उन्होंने वहां से फ़ायरिंग शुरू कर दी. जब मैंने उन्हें फ़ायरिंग करते देखा तो आकर एक पुलिस ऑफ़िसर से इसे रोकने की मिन्नत की. मैंने उन्हें दोबारा भरोसा दिलाया कि मेरे घर में कोई चरमपंथी नहीं छिपा है. "
"मैं उनके सामने गिड़गिड़ाई कि अगर कोई चरमपंथी मेरे घर में छिपा है तो वो मुझे गोली मार दें. लेकिन मेरी सारी मिन्नतें बेकार गईं. उन्होंने मेरे घर पर हथगोले फेंके और इसे गिरा दिया. जब उन्होंने घर का एक माला गिरा दिया, मैं फिर अधिकारियों के पास आई और उन्हें यक़ीन दिलाया कि घर में कोई नहीं छिपा है लेकिन उन्होंने फ़ायरिंग जारी रखी. कुछ घंटों बाद जब मैं वापस अपने घर आई, वहां बर्बादी का मंज़र था. मेरा घर वहां नहीं था. मेरे सारे सपने बिखर चुकते थे और मेरे सामने अंधेरा वक़्त मुंह बाए खड़ा था. मैं सब कुछ खो चुकी हूं. मेरा सारा घर बर्बाद करने के बाद उन्हें मलबे में भी किसी चरमपंथी का नामोनिशान नहीं मिला."
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इसके बाद एक स्थानीय अख़बार ने एक पुलिस अधिकारी के हवाले से लिखा कि मेरे घर में एक चरमपंथी छिपा था जो बाद में भाग गया. पुलिस ने ये भी कहा कि इस एनकाउंटर में सीआरपीएफ़ का एक जवान भी जख़्मी हुआ था.
महमूदा के पति शौकत अहमद 11 साल पहले एक सड़क हादसे में गुज़र गए थे.
उन्होंने बताया कि वो हर रोज़ अपने बर्बाद घर को निहारने आती हैं और फिर वापस अपने पिता के घर चली जाती हैं.
वो कहती हैं, "मेरे लिए फिर से घर बनाना आसान नहीं है. किसी भी घर को दोबारा बनाना मज़ाक नहीं है. इसमें बहुत पैसा लगता है. किसी ने मेरी मदद नहीं की. वो तो सिर्फ़ मेरे गांव के लोग थे जिन्होंने मेरे लिए एक लाख रुपये जुटाए. सरकार ने मुझे आज तक कोई मुआवज़ा नहीं दिया. हालांकि कुछ दिनों पहले सड़क और इमारत विभाग के अधिकारी मेरे बर्बाद हो चुके घर के पास आए थे. मेरे पास आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था. मैं स्थानीय प्रशासन तक भी नहीं पहुंच सकी क्योंकि मुझे समझाने वाला कोई नहीं था. अब मैं टीन के शेड वाला एक घर बनाकर उसमें रहने की सोच रही हूं."
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महमूदा फीकी सी मुस्कुराहट के साथ कहती हैं, "आख़िर कब तक मैं अपने पिता के घर में रहूंगी?"
वो सुरक्षाबलों को अपने घर की बर्बादी की वजह मानती हैं और पूछती हैं, "अब कौन इस विधवा का घर बनाएगा?"
महमूदा बताती हैं कि पुलिस ने एनकाउंटर के दौरान उनके 14 साल के बेटे को हिरासत में ले लिया था और 20 दिन बाद छोड़ा. उनकी एक बेटी और दो बेटे हैं जिनमें से एक विकलांग है.
'अपनी बर्बाद हो चुकी ज़िंदगी का बोझ ढो रहा हूं'
दक्षिण कश्मीर के खुदवाणी इलाके में स्थित गुलाम मोहम्मद वानी का घर एक साल पहले उस वक़्त मलबे में बदल गया जब उनके घर के सामने गोलियां चलने लगीं.
अब तक वो दोबारा अपना घर नहीं बना पाए हैं लेकिन उन्होंने उसे दोबारा खड़ा करने के लिए थोड़ी-बहुत मरम्मत का काम शुरू कर दिया है.
वानी बताते हैं कि उनके घर के बाहर तीन चरमपंथी छिपे हुए थे जब सेना और सुरक्षा एजेंसियों ने उनके आशियाने को घेर लिया.
वो बताते हैं, "मैंने तीन चरमपंथियों को मेरे घर की ऊंची चारदीवारी पार करते देखा लेकिन वो हमारे घर में नहीं छिपे थे. देर रात में वो हमारे घर से भाग निकले. हम डर गए थे. हमने पास के एक दूसरे घर में पनाह ले ली. हमने गोलियों की आवाज़ सुनी लेकिन ये नहीं समझ पाए कि फ़ायरिंग की शुरुआत किस ओर से हुई. इसके बाद सुरक्षाबलों ने सुबह पांच बजे फ़ायरिंग शुरू की और पेट्रोल डालकर मेरा पूरा घरा जला दिया. घर के अंदर की सारी चीज़ें भी जल गईं. इसमें मेरा लगभग डेढ़ करोड़ का नुक़सान हुआ. हमें अपने घर से कोई सामान नहीं मिला. मेरा घर पूरी तरह बर्बाद हो चुका था."
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वानी के अनुसार इन सबके बाद चरमपंथी किसी तरह उस इलाके से भाग जाने में क़ामयाब रहे थे. अब पिछले एक साल से वो दूसरे जगह पर किराये के मकान में रह रहे हैं.
वो कहते हैं, "पहले तो मैंने मुआवज़े के लिए कई बार सरकारी दफ़्तरों का चक्कर लगाया लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी. फिर मैंने कहीं जाना ही बंद कर दिया."
वानी बताते हैं, "कुछ लोगों ने मुझे अदालत का रुख़ करने की सलाह दी लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया. क़ानूनी लड़ाई लड़ने के लिए पैसों की ज़रूरत होती है, जो मेरे पास नहीं हैं. इसलिए मैं चुप बैठ गया. अब मैं अपना नया घर बनाने और नई जिंदगी शुरू करने के लिए संघर्ष कर रहा हूं. मैं अपनी बर्बाद हो चुकी ज़िंदगी का बोझ ढो रहा हूं."
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सरकार क्या कर रही है?
सरकार ने उन लोगों को मुआवज़ा देने की योजना बनाई है जिनके घरों को एनकाउंटर में नुक़सान पहुंचा है.
कश्मीर ज़ोन के डिविज़नल कमिश्नर बसीर अहमद ख़ान ने बीबीसी को बताया, "अगर किसी व्यक्ति को चरमपंथियों को पनाह देते हुए पाया जाता है तो उसे मुआवज़ा नहीं मिलता लेकिन अगर वो इसमें शामिल नहीं है तो वो मुआवज़ा पाने का हक़दार है. अगर एनकाउंटर में किसी का पूरा घर बर्बाद हो जाता है तो उसे 10 लाख रुपये मुआवज़ा देने का प्रावधान है."
एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ज़ाहिर न होने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि एनकाउंटर में जिनके घर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं उन्हें मुआवज़ा देने के लिए पुलिस, जिलाधिकारी और 'रोड्स ऐंड बिल्डिंग्स' डिपार्टमेंट के अधिकारियों का एक समूह बनाया गया है.
पुलिस का दावा है कि उसने साल 2018 में हुए मुठभेड़ों में 250 से ज़्यादा चरमपंथियों को मारा है. 2018 में दक्षिण कश्मीर में सबसे ज़्यादा एनकाउंटर हुए हैं. पिछले 30 साल से कश्मीर घाटी में हो रहे एनकाउंटरों की वजह से न जाने कितने लोग बेघर हो चुके हैं.
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