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कोरोना वायरस: ज्यादा टेस्टिंग होती तो, तबलीग़ी जमात मामला पहले सामने आ जाता?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
पिछले कुछ दिनों में भारत का कोरोना ग्राफ तेज़ी से बढ़ा है.
गुरुवार सुबह पूरे देश में अब तक कोविड19 के कुल 1965 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 400 मामले ऐसे हैं जो तबलीग़ी जमात के आयोजन में या तो गए थे या वहां जाने वालों के संपर्क में आए थे.
यानी भारत में जितने पॉज़िटिव केस सामने आए हैं उसमें से तकरीबन 20 फ़ीसदी इस जमात से ताल्लुक़ रखते हैं.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी बुधवार को अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि कोरोना के मामलों में वृद्धि की वजह तबलीग़ी जमात है.
ये हाल तब है जब सभी राज्यों में ऐसे सभी लोगों की शिनाख़्त नहीं हो पाई है, जो वहां मार्च के महीने में मौजूद थे.
अब भी तकरीबन 20 से ज़्यादा राज्यों में ऐसे लोगों की खोज की जा रही है.
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ये एक मामला भारत के कोरोना ग्राफ को बदल देगा?
भारत में कोरोना ट्रेंड
भारत के कोरोना ग्राफ़ पर ब्रुकिंग्स इंडिया ने लगातार नज़र बनाई है. ब्रुकिंग्स इंडिया की रिसर्च डायरेक्टर शमिका रवि के मुताबिक़ इस एक मामले ने कोरोना की लड़ाई में देश को कई दिन पीछे धकेल दिया है.
ब्रुकिंग्स इंडिया के ताज़ा रिसर्च के मुताबिक़
• भारत में कोराना के केस 23 मार्च से पहले 3 दिन में दोगुने हो रहे थे.
• 23 मार्च से 29 मार्च तक 5 दिन में दोगुने हो रहे थे
• 29 मार्च के बाद से कोरोना के मामले 4 दिन में दोगुना हो रहे है.
शमिका और उनके साथी मोहित पिछले कई दिनों से भारत में कोरोना के ट्रेंड पर स्टडी कर रहे हैं.
शमिका इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी की इकोनॉमिक एडवाइज़री काउंसिल यानी आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य भी रह चुकी हैं.
रिसर्च के आंकड़ों के पीछे शमिका वजहें भी गिनाती है. बीबीसी से उन्होंने बताया कि 23 मार्च से 29 मार्च कोरोना के मामले बढ़ने की रफ़्तार में कमी आ रही थी उसके पीछे की बहुत बड़ी वजह केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए क़दम थे.
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केंद्र और राज्य सरकारों ने 5 से 15 मार्च के बाद ही जगह-जगह पर एहतियाती क़दम उठाने शुरू कर दिए थे.
- जैसे स्कूलों को बंद करना
- ट्रैवल एडवाइजरी
- एपिडेमिक एक्ट लागू करना
- लोगों के जमा होने पर एडवाइजरी जारी करना
- दूरी रखते हुए होली मनाने की सलाह
- समय-समय पर हाथ धोने की सलाह और
- सोशल डिस्टेंसिंग की गाइडलाइन जारी करना.
इन निर्देशों और उनके पालन का असर ये हुआ कि 23 मार्च के बाद कोरोना संक्रमण के पॉजिटिव मामलों की संख्या कम रफ़्तार से बढ़ने लगी थी. उस वक़्त शमिका ने कहा था कि भारत 'कोरोना कर्व' को 'फ्लैट' करने की तरफ़ बढ़ रहा है.
इसको आम बोलचाल की भाषा में समझाते हुए शमिका कहतीं हैं, "अगर आप कोरोना को हाइवे पर चलता ट्रक मान ले, तो ये ट्रक आपकी ओर पहले 100 किलोमीटर प्रति घंटा स्पीड पर आ रहा था, 23 मार्च से 29 मार्च तक उसकी स्पीड 60 किलोमीटर प्रति घंटा हो गई थी."
मतलब ये कि ये कोरोना ट्रक रुक नहीं रहा, बस तैयारी का वक़्त दे रहा था.
लेकिन पिछले तीन दिन की घटना ने वापस से कोरोना ट्रक की रफ्तार को 70 किमी प्रति घंटा कर दिया है.
आने वाले दिनों में इसकी स्पीड 80, 90 या 100 किलोमीटर प्रति घंटा या फिर उसके पार पहुंचती है, ये आने वाला वक़्त बताएगा.
निज़ामुद्दीन मामला और सुपर स्प्रेडिंग
शमिका की रिसर्च बताती है कि सरकारों की तरफ़ से जो क़दम उठाए जाते हैं, उसका असर दिखने में कम से कम 10 दिन का वक़्त लगता है.
निज़ामुद्दीन मरक़ज़ मामले का असर अब सामने आ रहा है.
राज्य सरकारें अपनी तरफ से लोगों को खोजने के काम में जुटी है. स्वास्थ्य विभाग गृह विभाग से साथ मिल कर तबलीग़ी जमात से जुड़े विदेशी वर्कर को खोजने के काम में जुटा है, जिनमें से कइयों का पता लगा भी गया है.
सरकार नें घरों में और अस्पतालों में उन्हें क्वारंटीन में भेज दिया है.
अब तक मरक़ज़ में शामिल लोगों की संख्या 3000 से 4000 के बीच है ऐसा बताया जा रहा है. लेकिन आने वाले दिनों में ये कितने लोगों से मिले, उसको देखते हुए कोरोना पॉजिटिव लोगों की संख्या ज़्यादा भी बढ़ सकती है.
शमिका इस तरह से कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए, "सुपर स्प्रेडिंग" शब्द का इस्तेमाल करती हैं. बीबीसी को उन्होंने बताया है कि अभी तो सिर्फ़ तीन दिन ही हुए हैं, आने वाले दिनों में गुज़रते वक़्त के साथ इसके सही असर का आकलन कर पाएंगे."
लॉकडाउन का असर
शमिका आज भी भारत के पूरे कोरोना ग्राफ़ को लेकर बहुत निराश नहीं दिखती.
उनके मुताबिक़ अभी मामले बढ़ ज़रूर रहे हैं, आज भी बढ़ोतरी जरूर दर्ज होगी, लेकिन ये ना भूलें कि लॉकडाउन भी किया गया है. इसका असर दिखना अभी बाक़ी है.
भारत में लॉकडाउन 24 और 25 मार्च की मध्यरात्रि से लागू हुआ था. जिसका असर शमिका की रिसर्च के मुताबिक 5 तारीख के बाद देखने को मिलेगा.
भारत ने जिस बड़े पैमाने पर लॉकडाउन किया है, दुनिया के किसी देश में इतने बड़े पैमाने पर नहीं हुआ है.
शमिका का विश्वास है कि 5 अप्रैल के बाद कोरोना रूपी ट्रक की रफ़्तार फिर से धीमी होगी अगर लोगों ने इसका पूरी तरह पालन किया होगा तो.
टेस्टिंग की रणनीति में बदलाव
तो क्या कोरोना के बदलते ग्राफ़ को रोकने के लिए लॉकडाउन को बढ़ाना एक विकल्प होगा?
इस सवाल के जवाब में शमिका कहतीं है, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगा. 10 दिन कम से कम और इंतज़ार कीजिए. पहले हमें लॉकडाउन के असर को देखना होगा, जो अभी दिखना शुरू नहीं हुआ है.
केंद्र सरकार ने भी लॉकडाउन को बढ़ाने की अटकलों को पहले ही खारिज़ कर दिया है.
लेकिन शमिका अपनी बात को यहीं ख़त्म नहीं करती.
कोरोना से निपटने के लिए भारत सरकार की नीतियों पर चर्चा करते हुए वो कहती हैं, "हमें अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए हर रोज़ होने वाली टेस्टिंग की संख्या तुंरत बढ़ानी चाहिए."
बुधवार तक भारत में कोरोना के लिए तकरीबन 47 हज़ार लोगों की टेस्टिंग हुई थी, जो भारत के टेस्टिंग क्षमता का मात्र 38 फ़ीसदी ही है.
टेस्टिंग की संख्या
बीबीसी से बातचीत में शमिका ने दावा किया, "अगर हमने शुरुआत के दिनों में रैंडम टेस्टिंग की होती तो निज़ामुद्दीन का मामला हम कई दिनों पहले पकड़ पाते. अभी तो लोगों को उस तरह के लक्षण दिखाई देने लगे तब हमने पकड़ा. तेलंगाना में जब पहली मौत हुई थी, उस वक़्त अगर हम रैंडम टेस्टिंग करते तो आज वाली नौबत नहीं आती. हम अब ऐसे लोगों को तलाशने में जुटे है. लोग डरे हुए हैं, छुपे हैं, समाज में उनके साथ कैसा बर्ताव होगा इस बात से भी भयभीत हैं."
वो कहती हैं, "आज की स्थिति ऐसी है कि आग लग गई है और हम आग के पीछे-पीछे दौर रहे हैं. हमें टेस्टिंग की संख्या तुरंत बढ़ानी चाहिए ताकि बाक़ी जगह निज़ामुद्दीन जैसी घटना हो रही हो तो वो भी समय रहते बाहर आ सके."
ज़्यादा टेस्टिंग होती तो हम ना सिर्फ़ निज़ामुद्दीन मामले को पहले पकड़ लेते बल्कि उसको फैलने से भी रोक सकते थे. अभी भी ऐसा नहीं कि सरकार ने सबको पकड़ कर टेस्ट कर ही लिया है.
अभी भी भारत सरकार राज्यों के साथ मिल कर लोगों को ट्रेस (खोजने) करने में ही लगी है.
कोरोना से निपटने में विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन भी यही कहती है - टेस्ट, टेस्ट, टेस्ट.
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