आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
मध्य प्रदेश: शिवराज मंत्रिमंडल में एक तिहाई मंत्री सिंधिया समर्थक : नज़रिया
- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
महज साढ़े तीन महीने पहले कांग्रेस छोडकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश में भाजपा को सत्ता दिलाने की क़ीमत की 'एक और बड़ी किस्त' वसूल कर ली.
लगभग 100 दिन पुरानी राज्य की शिवराज सिंह चौहान मंत्रिपरिषद के बहुप्रतीक्षित विस्तार में सिंधिया अपने 9 और समर्थकों को मंत्री बनवाने में कामयाब रहे. उनके दो समर्थक पहले ही मंत्री बनाए जा चुके हैं.
इस प्रकार अब मुख्यमंत्री सहित 34 मंत्रियों में एक तिहाई मंत्री सिंधिया समर्थक हो गए हैं. उनके साथ कांग्रेस छोडने वाले जो विधायक मंत्री नहीं बन पाए हैं, उन्हें अब निगम और मंडलों का अध्यक्ष /उपाध्यक्ष बना कर समायोजित किया जा सकता है.
गुरुवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया समर्थकों के अलावा कांग्रेस से भाजपा में आए तीन अन्य पूर्व विधायकों भी मंत्री बनाया गया है.इन तीनों को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का क़रीबी माना जाता था.
कुल मिलाकर राज्य मंत्रिपरिषद में अब 14 मंत्री ऐसे हैं, जिन्हें अपना मंत्री पद बचाए रखने के लिए आने वाले तीन महीने में अनिवार्य रूप से विधानसभा का सदस्य बनना होगा. देश के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका है जब किसी प्रदेश की मंत्रिपरिषद में 40 फ़ीसदी मंत्री ऐसे हैं, जो विधायक नहीं हैं. इसे हमारे लोकतंत्र की विडंबना भी कहा जा सकता है.
गौरतलब है कि बीते मार्च महीने में सिंधिया के 19 समर्थकों सहित कांग्रेस के कुल 22 विधायक विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप कमलनाथ के नेतृत्व वाली 15 महीने पुरानी सरकार गिर गई थी. बड़े पैमाने पर हुए इस दलबदल की बदौलत भाजपा की सत्ता में वापसी हो गई थी और शिवराज सिंह चौहान चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.
भाजपा जैसे-तैसे सरकार बनाने में तो कामयाब हो गई थी, लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर गुटीय खींचतान इतनी अधिक थी कि क़रीब एक महीने तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अकेले ही सरकार चलाते रहे.
सिंधिया की ओर से जब अपने समर्थकों को सरकार में शामिल करने का दबाव बनाया गया तो 21 अप्रैल को राज्य मंत्रिपरिषद का पहला विस्तार किया गया, मगर सिर्फ़ पांच मंत्रियों को ही शपथ दिलाई जा सकी. इन पांच में से दो सिंधिया समर्थक थे.
दिग्गजों की मायूसी
मंत्रिपरिषद के दूसरे विस्तार में सिंधिया समर्थकों को तो उनसे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा किए गए वायदे के मुताबिक पर्याप्त जगह दे दी गई लेकिन इस चक्कर में मंत्री पद की आस लगाए बैठे भाजपा के ही कई दिग्गजों को मायूस होना पडा है.
खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी अपने महज चार वफ़ादारों को ही मंत्रिमंडल में शामिल कर पाए. सिर्फ़ शिवराज ही नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय जैसे प्रदेश के दिग्गजों को भी मंत्रिमंडल विस्तार में 'बहुत कम' से संतोष करना पडा.
अपने क़रीबी और पुरानी सरकार में मंत्री रहे नेताओं को इस सरकार में जगह न दिला पाने का मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को बेहद अफ़सोस है, जिसे उन्होंने छुपाया भी नहीं.
नए मंत्रियों की सूची को दिल्ली से हरी झंडी मिलने के बाद बुधवार शाम को ही उन्होंने कह दिया था कि ''समुद्र मंथन में जो अमृत निकलता है वह सभी बंटता है और विष अकेले 'शिव' को पीना पड़ता है.'' उनका यह बयान इस बात का ही संकेत था कि मंत्रियों के चयन में शीर्ष नेतृत्व ने उनकी सिफ़ारिशों को तवज्जो नहीं दी है.
मंत्रियों के चयन में सिंधिया की इच्छा या जिद को तवज्जो मिलने से आहत शिवराज ने बुधवार को ही एक ट्वीट के जरिए भी अपने दर्द का इजहार किया था.
आए थे हमदर्द बनकर...
शायराना अंदाज में किए अपने ट्वीट में उन्होंने कहा था, ''आए थे आप हमदर्द बनकर, मगर रह गए सिर्फ़ रहजन बनकर. पल-पल रहजनी की है आपने इस कदर कि आपकी यादें रह गई हैं दिल में जख़्म बनकर.'' शिवराज का यह ट्वीट परोक्ष रूप से सिंधिया को संबोधित करते हुए ही माना गया.
बहरहाल, कहा जा सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्रिमंडल विस्तार में पूरा ज़ोर सिंधिया को संतुष्ट करने पर दिया है और आने वाले दिनों में 24 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव को ध्यान में रखा है.
यही नहीं, सिंधिया समर्थक गैर विधायकों को भारी मात्रा में मंत्री पद से नवाज कर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने एक तरह से राजस्थान और महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ दलों के विधायकों को भी एक तरह से संदेश दिया है, ''मंत्री पद चाहिए तो उठाइए बग़ावत का झंडा और आइए हमारे (भाजपा के) साथ. किसी को निराश नहीं किया जाएगा.''
गुरुवार के मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया अपने समर्थकों को भरपूर जगह दिला कर कांग्रेस से बग़ावत की बडी क़ीमत वसूल करने में सफल रहे हैं. संभव है कि वे अपने समर्थकों को महत्वपूर्ण विभाग दिलाने में भी सफल हो जाएं. इससे पहले वे खुद राज्यसभा में पहुंच ही गए हैं और माना जा रहा है कि जल्दी ही केंद्र में मंत्री भी बन जाएंगे. लेकिन उनके लिए अब बडी चुनौती है अपने साथ कांग्रेस से आए सभी पूर्व विधायकों को उपचुनाव में भाजपा का टिकट दिलाना और जिताना.
माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व सिंधिया समर्थक सभी पूर्व विधायकों को उपचुनाव के लिए टिकट भी दे देगा, लेकिन उनको टिकट देने से भाजपा के उन नेताओं को कैसे संतुष्ट करेगा जो पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से आए इन पूर्व विधायकों के मुक़ाबले मामूली अंतर से हारे गए थे?
पिछले दिनों अधिकांश क्षेत्रों से असंतोष के स्वर उभरे हैं और भाजपा के पुराने उम्मीदवारों ने उपचुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की है. माना जा रहा है कि अगर उनकी दावेदारी को अनदेखा कर कांग्रेस से आए सभी सिंधिया समर्थकों को टिकट दिया गया तो उन्हें चुनाव में पुराने दावेदारों की ओर से भारी भीतरघात का सामना करना पड़ेगा.
सवाल यह भी है कि अपने मनमाफ़िक मंत्रिमंडल विस्तार न कर पाने से आहत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी इन सिंधिया समर्थकों को चुनाव में जिताने के लिए किस हद तक प्रयास करेंगे?
राज्य विधानसभा में अभी जो संख्या बल है, उसके मद्देनजर उपचुनाव में अगर भाजपा आधी से ज़्यादा सीटें हार भी जाती है तो उसके बहुमत पर कोई असर नहीं पडेगा. इसलिए आने वाले दिनों सबसे ज़्यादा चुनौती ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने होगी- अपने समर्थकों को उपचुनाव में जिताने की और अपना जनाधार साबित करने की.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)