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समय के बारे में हमारी समझ कितनी सही?
- Author, क्लॉडिया हैमंड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
- प्रकाशित
वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं, एक पल में ये आगे निकल जाता है, आदमी ठीक से देख पाता नहीं और पर्दे से मंज़र बदल जाता है.
वक़्त यानी समय या टाइम को लेकर हमारी यही धारणा है.
टाइम की अहमियत का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि ये अंग्रेज़ी भाषा में सब से ज़्यादा इस्तेमाल की जाने वाली संज्ञा है.
हम सब सब को पता है कि अभी जिस पल में हम जी रहे हैं, वो कुछ देर में गुज़रा हुआ समय होने वाला है.
गुज़रा हुआ कल, फिर आज और उस के बाद आने वाला कल. माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल. समय के ये तीन चक्र हैं, जिन से हम बख़ूबी परिचित हैं.
वैसे, बदलते मौसमों से भी हमें समय की आवाजाही का अंदाज़ा होता है. गर्मी, ठंड, बरसात, बसंत ये आते-जाते मौसम हमें गुज़रे हुए समय और आने वाले कल का एहसास कराते हैं.
मज़े की बात ये है कि वैज्ञानिक हमारे ज़ेहन में अब तक ऐसी कोई सेंट्रल क्लॉक नहीं खोज सके हैं, जो समय को लेकर हमारी सोच को नियंत्रित करती हो. लेकिन हम वक़्त को लेकर बहुत सजग हैं.
मसलन कोई अगर ये कहता है कि वो पांच मिनट में आ रहा है, तो हम ठीक ठीक अंदाज़ा लगा लेते हैं कि वो पांच मिनट कब पूरे होंगे.
इसी तरह हफ़्तों और महीनों के गुज़रने का भी हमें एहसास हो जाता है.
समय को लेकर धारणा
कुल मिलाकर, समय को लेकर हमारी समझ ये है कि ये पीछे से बीतता हुआ आगे की ओर बढ़ता जा रहा है.
पर आप ये जान कर हैरान होंगे कि दक्षिण अमरीका में अमेज़न के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों अमोन्डावा के बीच समय की कोई अवधारणा ही नहीं है.
उनकी भाषा में समय के लिए कोई शब्द ही नहीं है. कई लोग इस का ये मतलब निकालते हैं कि इन आदिवासियों को समय का कोई एहसास नहीं है. वैसे समय की समझ हमें अपनी सभ्यता के विकास से मिली है.
प्राचीन ग्रीक दार्शनिक अरस्तू मानते थे कि हमारा वर्तमान लगातार बदल रहा है और 160 ईस्वी में रोमन बादाह मार्कस ऑरेलियस ने समय को एक बहती हुई नदी बताया था.
आज भी पश्चिमी देशों में बहुत से लोग समय की यही धारणा मानते हैं. वहीं शून्य के आविष्कारक भारत में कई प्राचीन दार्शनिक ये भी मानते थे कि शून्य में समय ठहर जाता है.
हालांकि भौतिकी के नियम समय की हमारी इन अवधारणाओं को चुनौती देते हैं. पिछली सदी में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था कि समय कुछ चीज़ों से बनता है.
वो कहीं खड़ा होकर उन चीज़ों के बनने बिगड़ने का इंतज़ार नहीं करता. घटनाएं किसी क्रम में नहीं घटतीं. वक़्त में 'अभी इस वक़्त' जैसा कोई लम्हा नहीं होता.
ये सच है कि ब्रह्मांड की कई घटनाओं को हम सिलसिलेवार ढंग से समझ सकते हैं. लेकिन, ये कल आज और कल के खांचे में फिट बैठें, ये ज़रूरी नहीं.
भौतिक विज्ञानी और मशहूर लेखक कार्लो रोवेली तो ये कहते हैं कि, 'समय न तो बहता है और न ही समय का कोई अस्तित्व है. ये तो महज़ भ्रम है.'
लेकिन, भले ही भौतिक विज्ञानी ये बात न मानें, लेकिन, हमारी सोच में गुज़रा हुआ कल, आज और आने वाला कल गहरे पैबस्त हैं.
झूठा कल
समय की हमारी सोच का एक बड़ा हिस्सा हम अपने बीते हुए कल के तौर पर देखते हैं. जो तमाम घटनाओं की वीडियो लाइब्रेरी होती है.
एक ऐसी लाइब्रेरी, जिस में से हम अपनी ज़रूरत के मुताबिक़, कोई टेप निकाल कर फिर से देख लेते हैं.
हालांकि, हम अपने गुज़रे हुए कल की ज़्यादातर बातें भूल जाते हैं. कुछ घटनाएं तो हमारे ज़हन से एकदम ही निकल जाती हैं. बहुत ज़ोर देने पर भी वो याद नहीं आती हैं.
जब हम अपनी याददाश्त सहेजते हैं, तो हम उन्हें तार्किक बनाने के लिए कई बार बदलाव भी कर डालते हैं.
जब भी हम कोई बात याद करते हैं, तो उस में हमारा ज़हन बदलाव करता है, ताकि नई जानकारियों के हिसाब से उस डेटा को अपडेट कर सके.
हमारी ये सोच ग़लत है कि भविष्य की हमारी कल्पना का गुज़रे हुए कल से कोई ताल्लुक़ नहीं है. असल में दोनों का गहरा नाता है.
हम बिताए हुए लम्हों के तजुर्बों से ही आने वाले कल की कल्पना कर पाते हैं. हमारा ये हुनर ही हमें भविष्य की योजनाएं बनाने में मदद करता है.
गुज़रे हुए कल की याद भविष्य की योजना के लिए कितनी अहम होती है. ये बात हम बच्चों की मिसाल से समझ सकते हैं. बहुत छोटे बच्चे आज में जीते हैं. उन्हें न कल की याद होती है और न आने वाले कल की कल्पना. इसलिए, अगर उनसे ये पूछा जाए कि कल क्या करेंगे, तो वो बता नहीं पाते.
समय को लेकर हमारी जो सोच है, हम उस की अनदेखी नहीं कर सकते. भले ही हम ये जान लें कि समय आगे पीछे नहीं होता. पर, ट्रेन का इंतज़ार करना फिर भी हमें भारी ही लगेगा.
हालांकि, हम अपनी सोच में समय को लेकर ये बदलाव ज़रूर ला सकते हैं कि हम इस के बारे में कैसे सोचते हैं. इस का ये फ़ायदा होगा कि समय गुज़रेगा, तो हमें इस का अच्छा एहसास होगा.
बदलाव का समय
हम कल आज और कल को एक सीधी लाइन न मान कर, अपनी याददाश्त की मदद से भविष्य की कल्पना करें, तो बेहतर होगा. हमारे अंदर ये अद्भुत क्षमता होती है कि हम कहीं पर मौजूद रह कर दिल ही दिल में कहीं और पहुंच सकते हैं.
ऐसा हम इसलिए कर पाते हैं क्योंकि हमारे अंदर कल्पनाशीलता होती है. और ये कल्पनाशीलता हमें जीवन के अनुभवों और बिताए हुए पलों की यादों से मिलती है.
मान लीजिए कि आप अगले महीने न्यूयॉर्क जाने की योजना बना रहे हैं. तो आप के ज़हन में ख़ाका खिंच जाएगा कि घर से आप टैक्सी पर सवाल होकर एयरपोर्ट पहुंचेंगे. फिर लंबी उड़ान भर कर न्यूयॉर्क पहुंचेंगे. न्यूयॉर्क शहर भी आप को ज़हन में दिख जाएगा.
इस कल्पना की बुनियाद वो तस्वीरें हैं, वो यादें हैं, जो हम पहले देख चुके हैं. हमें पता है कि न्यूयॉर्क विमान से ही जाया जा सकता है. एयरपोर्ट जाने के लिए टैक्सी की ज़रूरत पड़ेगी और न्यूयॉर्क शहर की तस्वीरें देखने हमें पता है कि न्यूयॉर्क कैसा है.
इंसान की याददाश्त ग़ज़ब की होती है. वो इन के बल पर एक पल में हिमालय पर्वत को लांघ सकता है. आसमान में सैर कर सकता है. किसी परी के साथ डेट पर जा सकता है.
समय तू धीरे-धीरे चल…
समय की अपनी मौजूदा सोच को बदल कर हम अपने जीवन में काफ़ी सुकून ला सकते हैं.
इस बात को तो सभी मानते हैं कि अच्छा वक़्त जल्दी बीत जाता है. और बुरा समय काटे नहीं कटता.
तो, आप अपने हर साप्ताहिक अवकाश में कुछ नई यादें सहेजिए. कुछ नए अनुभव कीजिए. रोज़ दफ़्तर एक ही रास्ते से जाने के बजाय, अलग-अलग रास्तों को आज़माइए. खान-पान से लेकर रोज़मर्रा के तमाम कामों में जो रूटीन आप तोड़ सकते हैं, उन्हें तोड़ने की कोशिश कीजिए. इस से आप के ज़हन में नई यादें जमा होंगी.
इस से रविवार की शाम ख़त्म होते ही बोझिल सोमवार का ख़याल आप को परेशान नहीं करेगा.
समय को लेकर हमारी समझ, भौतिकी के नियमों से मेल नहीं खा सकती.
संत ऑगस्टाइन से जब पूछा गया कि, समय क्या है? तो उन्होंने कहा कि-जब ये सवाल मुझ से कोई नहीं पूछेगा, तो मुझे पता है कि समय क्या है. लेकिन, अगर मुझे यही बात किसी को समझानी हो, तो मुझे नहीं पता कि समय क्या है.
तो, अगली बार जब कोई आप से ये कहे कि
इक बार चले जाते हैं जो सुब्ह-ओ-शाम, दिन-रात
वो फिर नहीं आते…वो फिर नहीं आते…
तो, आप उसे ये कह कर चौंका दीजिए कि हर गुज़रे हुए कल और आने वाले पल को आप ने अपने ज़हन में क़ैद कर रखा है.
(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. यह मूल लेख का शब्दश: अनुवाद नहीं है. भारतीय पाठकों के अनुसार इसमें प्रसंग और संदर्भ जोड़े गए हैं. आप बीबीसी फ़्यूचर कोफ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
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