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लॉकडाउन आपके इम्यून सिस्टम पर क्या असर डाल रहा है?
- Author, लिंडा गेडिज
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
- प्रकाशित
पिछले क़रीब ढाई महीने से दुनिया की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा घरों में क़ैद है.
लॉकडाउन के कारण लोग बस ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए कभी-कभार बाहर निकलते हैं.
ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि कोविड-19 महामारी को फैलने से रोका जा सके.
लेकिन, घरों में रहने के कुछ ऐसे दुष्प्रभाव हैं जो हमें कोरोना वायरस से मुक़ाबले में कमज़ोर बना रहे हैं.
इंसान का विकास दिन और रात के 24 घंटों के हिसाब से हुआ है.
बैक्टीरिया और वायरस
हमारे शरीर के अंदर मौजूद सिर्केडियन क्लॉक या शरीर की जैविक घड़ी, सूरज के उजाले और रात के अंधेरे से तालमेल बना कर चलती है.
सूरज की किरणों से हमें विटामिन डी मिलता है. ये विटामिन हमारे दांतों और हड्डियों को मज़बूत बनाता है.
विटामिन डी हमारे फेफड़ों की रोगों से लड़ने की क्षमता को भी मज़बूत करता है.
कोई संक्रमण होने पर, फेफड़ों के अंदरूनी हिस्से की ऊपरी परत से पेप्टाइड निकलते हैं, जो बैक्टीरिया और वायरस का ख़ात्मा करते हैं.
इस पेप्टाइड को कैथेलिसिडिन कहते हैं, जो हमारी बी और टी इम्यून सेल को भी मज़बूती देता है.
जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है उन्हें सांस की नली में वायरस का इन्फ़ेक्शन होने की आशंका अधिक होती है.
विटामिन डी की कमी
वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि क्या विटामिन डी के सप्लीमेंट लेने से कोविड-19 से लड़ने में मदद मिलती है?
डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज की रिसर्चर रोज़ केनी की रिसर्च के मुताबिक़, इटली और स्पेन में कोरोना वायरस से मरने वाले लोगों में विटामिन डी की भारी कमी पायी जाती है.
इन जगहों पर लोग घरों के भीतर रहते हैं. बाहर निकलने पर सनस्क्रीन का प्रयोग करते हैं. इसी कारण से उनमें विटामिन डी की कमी होती है.
विटामिन डी के सप्लीमेंट लेने से बेहतर है कि सूरज की रौशनी से इसे हासिल किया जाए.
इससे अन्य वायरल इन्फ़ेक्शन से भी लड़ने में मदद मिलती है, जैसे कि इन्फ्लूएंज़ा या सामान्य सर्दी खांसी.
रोग प्रतिरोधक क्षमता
लॉकडाउन के कारण लोग घर से बाहर नहीं निकल रहे, तो उनके व्यायाम करने में भी कमी आई है. जबकि इससे तनाव को कम करने में काफ़ी मदद मिलती है.
तनाव कम होता है, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक काम करती है.
अगर आप पार्क, बागीचे या हरे भरे इलाक़े में वर्ज़िश करते हैं, तो क़ुदरत के क़रीब होने से भी आप ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों से बचते हैं.
इससे डायबिटीज़ से भी बचने में मदद मिलती है. बाहर घूमने फिरने से अकेलापन भी दूर होता है. हम अन्य लोगों के संपर्क में आते हैं.
इससे हमारे ज़हन को आराम करने और रिकवर करने में भी मदद मिलती है.
कैंसर की कोशिकाएं
कुछ रिसर्च में ये भी पाया गया है कि पेड़ हमारे इम्यून सिस्टम पर सीधा असर डालते हैं.
पेड़ों के आस पास अधिक समय बिताने से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं अधिक सक्रिय होती हैं.
ये कोशिकाएं वायरस और कैंसर की कोशिकाओं का पता लगाकर उन्हें ख़त्म कर देती हैं.
जापान में हुए एक अध्ययन के अनुसार पेड़ों के आस पास रहने से हम सांस के साथ फाइटोनसाइड्स नाम के तत्व को अपने अंदर लेते हैं.
इसका हमारे इम्यून सिस्टम को मज़बूत करने में बड़ा योगदान होता है.
शरीर की घड़ी की बिगड़ी लय
बाहर घूमने फिरने से हमारी नींद पर भी फ़र्क़ पड़ता है. लॉकडाउन के दौरान घर में बंद रहने के कारण हमारे शरीर की घड़ी की लय बिगड़ी हुई है.
इससे नींद पर भी बुरा असर पड़ा है. सुबह देर तक सोते रहने और रात में देर तक जागने का सिलसिला हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता.
अगर कोई लंबे समय तक घर से बाहर नहीं निकलता, तो उसके शरीर की जैविक घड़ी की लय बिगड़ जाती है.
जो लोग सुबह का वक़्त खुली हवा और रोशनी में गुज़ारते हैं, उन्हें नींद बेहतर आती है. उनकी नींद में ख़लल भी कम पड़ता है.
जो लोग बंद घरों में बिजली की रोशनी में रहते हैं, उनकी नींद परेशान करती है. रौशनी का हमारे इम्यून सिस्टम से सीधा ताल्लुक़ भले न हो, ये नींद से सीधे तौर पर जुड़ी है.
सोशल डिस्टेंसिंग
सुबह जल्दी उठने से रात में अच्छी नींद आती है. अच्छी नींद हमें तनाव और डिप्रेशन से बचाती है. और इनसे दूर रहने पर हमारा इम्यून सिस्टम बेहतर ढंग से काम करता है.
घर से बाहर निकलने के इन फ़ायदों का लाभ उठाने के लिए कितनी देर बाहर रहना ज़रूरी है?
इस सवाल का कोई ठोस जवाब तो फिलहाल वैज्ञानिकों के पास नहीं है.
लेकिन, सुबह की रौशनी में टहलना और सूरज की किरणों से विटामिन डी हासिल करना, हमारी रोगों से लड़ने की क्षमता को मज़बूत करता है.
तो, अगर लॉकडाउन आगे भी जारी रहता है, तो आपको कोशिश ये करनी चाहिए कि दिन में कम से कम एक बार ज़रूर घर से बाहर निकलें.
सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए और ख़ुद को सूरज की तपिश से झुलसने से बचाते हुए आप क़ुदरत के क़रीब होने के फ़ायदे उठाने की कोशिश करें.
सूरज की रोशनी और क़ुदरत से नज़दीकी, ज़ख़्मों पर मरहम सा काम करते हैं. मज़े की बात ये है कि ये मुफ़्त आते हैं.
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(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं. आप बीबीसी फ्यूचर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं)
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