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छप्पनिया अकाल: जब लोगों को कुत्तों से खाना छीनकर पेट भरना पड़ा
- Author, जय शुक्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 13 मिनट
नोट: इस रिपोर्ट में दिए कुछ विवरण आपको परेशान कर सकते हैं.
"कालू की ओर बहने वाली हवा और उस मौसम की मार मानो चिल्ला रही थी- खाओ! खाओ!"
"पक्षी भी भूख और प्यास से तड़प रहे थे. चैत्र की हवाएँ और लू बिल्कुल सूखी और झुलसाने वाली थीं. चारों तरफ़ जली-पड़ी धरती ऐसी लगती थी, जैसे कालु को अपना दुश्मन मानकर उसके पैरों को जकड़ लेना चाहती हो."
घास के गठ्ठों और गहनों के सहारे किसी तरह दो महीने निकालने के बाद उसने पूछा, "क्या पूरे बारह महीने से रूठी हुई बारिश जेठ के आख़िरी पखवाड़े में भी नहीं लौटेगी?"
"मानो जेठ का आख़िरी पखवाड़ा सामने खड़ा हो. कालु तुरंत बोल पड़ा, "एक बार बरसात आ जाए, फिर किसी तरह दिन कट ही जाएँगे. पेड़ों की कोंपलें और साग-पात खाकर भी गुज़ारा कर लेंगे. बस किसी तरह बारिश हो जाए."
"तभी गाँव की ढलान वाली पगडंडी के दूसरे छोर से एक चीख़ सुनाई दी, 'दौड़ो. मवेशियों पर हमला हो गया है. दौड़ो.'"
"कालू के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई. और ऊपर चढ़कर उसने जो नज़ारा देखा, उसे कालू सात जन्मों में भी नहीं भूल सकता था..."
"मरे हुए मवेशियों पर बीस कंकाल जैसे लोग टूट पड़े थे. उनके दांत चाकू की तरह दिख रहे थे. भूख ने उनके पेट में जैसे आग लगा रखी थी."
कालू सिहर उठा. एक पल के लिए उसे लगा, कहीं ये गिद्ध तो नहीं? वे गिद्धों की तरह ही टूट पड़े थे.
दो-तीन लोग मवेशी के हर पैर को पकड़े हुए थे, जबकि ऊपर चढ़े दो आदमी तलवारों से उन्हें काट रहे थे. अगर उनके शरीर पर लंगोटी के अलावा कोई कपड़ा होता, तो वे उसे भी फाड़ देते.
वे उनकी बगलों पर वार कर रहे थे. पेट और जांघों के बीच दबा रहे थे. तलवार के डर के बावजूद, कुछ लोग शायद एक-एक तीर निकाल लेते.
"कालु बड़ी मुश्किल से उठा. उसका पूरा शरीर अकड़ गया था.
वह रोते-रोते सो गया था. आँखें खुलीं तो उनमें फिर आँसू भर आए. वह उठकर बोला, "हे भगवान, तुम्हारा नामोनिशान मिट जाए. मेरे लोगों की यह कैसी दशा हो गई है."
वह भारी साँसें लेते हुए बड़बड़ाया, मानो कोई पहाड़ तोड़ रहा हो, 'दुनिया में बुराई से भी बदतर कोई चीज है तो वह है भूख!'"
उपन्यास 'मानवीनी भवाई' में बयां है इंसान की ये बेबसी
गुजराती साहित्य के जाने-माने लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित पन्नालाल पटेल ने अपने उपन्यास 'मानवीनी भवाई' में छप्पनिया अकाल की पृष्ठभूमि में भूख और इंसानी बेबसी की इस भयावह तस्वीर को बयां किया है.
इस उपन्यास में कालू नाम के काल्पनिक किरदार के ज़रिए लेखक ने प्राकृतिक आपदा, भूख, इंसानी संघर्ष और आत्मसम्मान के लिए किए गए भीषण संघर्ष को दर्शाते हैं.
यह उपन्यास प्रेम, भूख और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा दस्तावेज़ है, जो अकाल की भयावहता के बीच भी मनुष्य की जीने की इच्छा और उसके दृढ़ संकल्प को जीवित रखता है.
1899-1900 के इस भयानक अकाल में चारे के अभाव में मवेशी और भेड़-बकरियां मर गईं. इंसानों की हालत भी ऐसी हो गई थी कि वे कंकाल जैसे दिखने लगे थे.
पन्नालाल पटेल के इस उपन्यास की भूमिका में गुजराती लेखक 'दर्शक' यानी मनुभाई पंचोली ने बताया है कि प्रकृति की इस बेरहमी के सामने इंसान कितना बेबस हो जाता है.
भूख की वजह से रिश्ते और इंसानियत तक दम तोड़ने लगते हैं. लोग अनाज के एक-एक दाने के लिए तरसते हैं. लेखक ने ऐसे लोगों को 'भूखे भूत' कहा है.
इस अकाल का दिल दहला देने वाला चित्र खींचते हुए वे लिखते हैं, "छप्पनिया अकाल ढलती हुई पीढ़ी पर आई एक महाविपत्ति थी."
"इसमें नानिया जैसे पति अपनी पत्नियों को छोड़कर चले गए. जिन माताओं ने बेटों को जन्म दिया था, उनके पास तन ढकने के लिए कपड़े तक नहीं बचे थे."
"भाली और रूखी जैसी औरतों को अपनी लाज-शर्म तक छोड़नी पड़ी. मर्दों के मन में बस एक ही चिंता रह गई थी कि किसी तरह पेट भरने का इंतज़ाम हो जाए."
"चाहे भीख माँगकर, चाहे चोरी करके, और हाय, यहाँ तक कि कुत्तों और हाथियों के खुर चाटकर भी. पेट की आग बुझाने के लिए औरतें अपना जिस्म तक बेचने लगी थीं."
"मानवता के इस पतन को देखकर शंकरदा कहानी में ठीक ही कहते हैं, "पहले को खो देना, आख़िरी को खो देने से बेहतर है."
"जब एक औरत अपने पति की इज़्ज़त की परवाह छोड़ दे, एक माँ अपनी बेटी का ख़याल छोड़ दे और एक बेटी अपने पिता का लिहाज़ छोड़ दे, तब समझो सब कुछ बिखर चुका है."
"कल तो सबको मरना ही है. इसलिए आज जैसे बन पड़े वैसे जी लो. जितना जी सकते हो जी लो, जितना दुःख सह सकते हो सह लो. फिर कौन सोचे कि यह न्याय है या अन्याय. यह नैतिक है या अनैतिक..."
इस अकाल को छप्पनिया अकाल क्यों कहा गया?
1899 में देश के कई हिस्सों में मानसून नाकाम हो गया. इसके चलते 1900 में ऐसा अकाल पड़ा, जिसकी मिसाल पिछले 200 साल में नहीं मिलती.
तब अनाज और पशुओं के चारे की भारी कमी हो गई थी.
छोटे किसान, कारीगर और भूमिहीन मजदूर सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए. अनाज न मिलने के कारण गरीब लोग पेड़ों की पत्तियां और 'थोर' (एक प्रकार का कैक्टस) के तने खाकर अपना गुजारा करने को मजबूर थे.
इतिहासकार हरिप्रसाद शास्त्री और प्रवीण चंद्र पारीख ने अपनी किताब 'पॉलिटिकल एंड कल्चरल हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात: ब्रिटिश पीरियड' में लिखा है कि इस अकाल को छप्पनिया अकाल इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह विक्रम संवत 1956 में पड़ा था.
वे लिखते हैं, "छप्पनिया अकाल 1900 में पड़ा. इस तरह गुजरात को राजनीतिक और प्राकृतिक, दोनों तरह की आपदाओं से बड़ा झटका लगा. अकाल आयोग बार-बार कह चुके थे कि अकाल के दौरान किसानों पर लगान चुकाने का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन मुंबई सरकार ने इसके उलट नीति अपनाई. नतीजतन गुजरात के लोग दहशत में आ गए."
गुजराती स्रोतों में गुजरात के इस काले दौर के बारे में बहुत सीमित जानकारी मिलती है.
बड़े पैमाने पर हुई मौतों और मवेशियों के नुकसान ने लोगों का मनोबल भी तोड़ दिया था. गांवों में भूख और मौत का ऐसा माहौल था कि अकाल का सबसे बुरा असर वहीं देखने को मिला.
'पॉलिटिकल एंड कल्चरल हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात' में लिखा है, "इसकी वजह यह थी कि व्यापक जांच करने के बजाय सरकारी अधिकारियों ने अलग-अलग मामलों की जांच की. इससे पक्षपात और मनमानी बढ़ गई. ऐसे में कहानदास पारेख ने गुजरात में लगान वसूली के दौरान हुए अत्याचारों का ब्योरा जुटाकर उसे लोगों के सामने रखने की हिम्मत दिखाई."
इसके बाद जब विधानसभा में भू-राजस्व अधिनियम लाया जाना था तो फिरोजशाह मेहता ने इसका विरोध किया.
जनता के प्रतिनिधियों और सर फ़िरोजशाह मेहता की मांग थी कि मौजूदा विधेयक को सार्वजनिक चर्चा के लिए रखा जाए और लोगों की राय ली जाए.
लेकिन सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी. इसके विरोध में सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया. विधानसभा के इतिहास में यह पहली ऐसी घटना थी. इससे गुजरात में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी.
'ऐसा लग रहा था जैसे खाल से ढके कंकाल हों'
ब्रिटिश अधिकारी एफ़एचएस मेरीवेदर ने अकाल प्रभावित इलाकों का दौरा करने के बाद अपनी किताब 'अ टूर थ्रू द फ़ेमाइन डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ़ इंडिया' में लोगों की मुश्किलों, तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों और राहत शिविरों के हालात का विस्तार से जिक्र किया है.
बिलासपुर के एक सरकारी राहत शिविर के दौरे का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं, "वहां मौजूद कई लोगों ने मुझे बताया कि वे महीनों से शिविर में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा."
"सभी की एक ही शिकायत थी कि वे भूखे हैं. यह कहते हुए वे अपने शरीर की ओर इशारा करते थे. उनके हाथ-पैरों की हड्डियां साफ़ दिखाई दे रही थीं और जोड़ों की हड्डियां बुरी तरह बाहर निकली हुई थीं. ऐसा लग रहा था मानो वे खाल से ढके कंकाल हों."
वे आगे लिखते हैं, "एक गरीब बच्ची को देखकर रोंगटे खड़े हो गए. उसकी मां ने बताया कि वह पांच साल की है. लेकिन वह किसी इंसानी बच्चे के बजाय शरीर रचना विज्ञान के किसी विकृत नमूने जैसी दिख रही थी."
"उसके चेहरे की त्वचा इतनी खिंच गई थी कि सारे दांत दिखाई दे रहे थे. सिर की सभी हड्डियां साफ़ नज़र आ रही थीं. उसके हाथ मेरी छोटी उंगली जितने पतले और जांघें मेरे अंगूठे जितनी चौड़ी थीं."
"यह पूरी तरह से भुखमरी का नतीजा था. एक और आदमी, जो बस एक कंकाल जैसा रह गया था, ढाई महीने से सरकारी राहत पर निर्भर था."
"इसके बावजूद उसका वजन 31 किलो भी नहीं था. मैंने उसे आसानी से उठा लिया. ज्यादातर महिलाएं लगभग नग्न थीं और कमर पर सिर्फ एक फटा हुआ कपड़ा लपेटे हुए थीं."
"उनकी हालत इतनी दयनीय हो गई थी कि उनमें वह स्वाभाविक शर्म या संकोच भी नहीं बचा था, जो आमतौर पर भारतीय महिलाओं की पहचान होती है."
'लोगों को धीमी मौत की तरफ़ धकेला जा रहा था'
इस किताब में उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना भी की है.
वे लिखते हैं, "मैं अपनी आंखों से देखी गई परिस्थितियों के आधार पर पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि इस तथाकथित कल्याणकारी संस्था में रह रहे लोगों को भयानक और धीमी मौत की ओर धकेला जा रहा था."
उस समय भारत आए ब्रिटिश पत्रकार और अर्थशास्त्री वॉन नैश ने अपनी किताब 'द ग्रेट फे़माइन एंड इट्स कॉज़ेज़' (भीषण अकाल और उसके कारण) में इसके बारे में लिखा.
"देश में हैजे की महामारी फैल गई है... शवों की भयानक बदबू हवा में फैल रही है. लोग इतनी तेजी से मर रहे हैं कि उनके शवों को जलाना या दफ़नाना भी संभव नहीं हो पा रहा."
"अहमदाबाद, भरूच, खेड़ा और पंचमहल जिलों के राहत शिविर भी इस महामारी की चपेट में आ गए हैं. काठियावाड़ में भी हालात इतने ही ख़राब हैं."
अर्थशास्त्री वॉन नैश लिखते हैं, "अहमदाबाद के राहत शिविरों से आधे लोग भाग चुके हैं. मरने वालों की संख्या का पता नहीं है. गोधरा में कलेक्टर और दूसरे अधिकारियों को अपने हाथों से करीब एक हजार शवों को जलाना पड़ा."
हालांकि, उन्होंने लिखा कि वडोदरा में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर थी.
कई इतिहासकारों और लेखकों के मुताबिक़, ब्रिटिश सरकार और गुजरात की रियासतों के राजाओं ने राहत शिविर और भोजन वितरण केंद्र शुरू किए थे, लेकिन हालात इतने ख़राब थे कि ये प्रयास नाकाफ़ी साबित हुए.
वॉन नैश लिखते हैं, "ब्रिटिश सरकार ने भारत के अलग-अलग हिस्सों से अतिरिक्त अधिकारियों को भर्ती करके गुजरात भेजा है."
"लोग कमिश्नर मिस्टर लेली को पिता और रक्षक की तरह देखते हैं. उन्हें पूरी छूट दी गई है. उनकी नई नीति गांवों के पास राहत केंद्र खोलने की है, ताकि विस्थापित लोगों को आसपास ही मदद मिल सके."
"लेकिन हक़ीक़त यह है कि भारतीय प्रजा को जानवरों की तरह मरने के लिए मजबूर किया जा रहा है."
गुजरात के जाने-माने लेखक अच्युत याग्निक ने अपनी किताब 'अहमदाबाद- रॉयल सिटी टू मेगा सिटी' में भी इसका ज़िक्र किया है-
"इस अकाल ने ब्रिटिश सरकार का बेरहम चेहरा सामने ला दिया. राहत शिविर बहुत देर से शुरू किए गए और लगान की वसूली जारी रही. ऐसा तब हो रहा था, जब सरकार बर्मा और अफ़ग़ानिस्तान में साम्राज्यवादी विस्तार के लिए धन जुटाने की कोशिश कर रही थी."
अच्युत याग्निक लिखते हैं, "शहरों पर अकाल का असर कम था. फिर भी अहमदाबाद के एक राहत शिविर की तस्वीर गरीबों पर आई इस विपत्ति की भयावहता दिखाती है."
"इसके बावजूद ऐसा लगता है कि अहमदाबाद के लोग, जिन्हें अपनी सामाजिक चेतना पर गर्व था, जो दान-पुण्य को गंभीरता से लेते थे. हिंदू और जैन मंदिरों के ट्रस्टों के कोष का प्रबंधन करते थे, इस संकट में निष्क्रिय बने रहे."
ईश्वर पेटलीकर आगे लिखते हैं, "तालाब और उनके किनारे, पक्षियों से खाली हो गए हैं. मवेशी भूख से मरने लगे."
"आवारा मवेशी कौवों के बीच पड़े रहते और कौवे उन्हें नोचने लगते. उनमें इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि वे कौवों को भगा सकें.
"गिद्ध उन जगहों पर चोंच मारते, जहां कौवों ने उनके शरीर पर घाव कर दिए थे. इस तरह पक्षी दावत उड़ाते और मवेशी बेबस पड़े रहते."
"गर्मी आते-आते लोग भी मरने लगे. भाई लाल ने इंसानों और मवेशियों, दोनों की लाशें देखीं. दलित समुदाय के लोग शवों को घसीटकर कुएं में डाल देते थे."
"ऊपर से मिट्टी तक नहीं डालते थे. कुछ ही समय में कुआं लाशों से भर जाता था. कुछ शव खेतों में फेंक दिए जाते थे, जिन्हें सियार और कुत्ते घसीटकर खाने लगते थे."
'गांधीजी ने भी राहत कार्य के लिए मदद जुटाई'
वे आगे लिखते हैं कि "कसाइयों के यहां बैल छह रुपये में बिक रहे थे. पास के सोजित्रा बाजार में खटकी समुदाय के एक-दो घर थे. वे मवेशियों को मुंबई भेजते थे."
"मध्यम वर्ग के लोग अपने गहने तक बेच चुके थे, लेकिन फिर भी गुजारा करना मुश्किल था."
"बोरसद और आनंद के बड़ी संख्या में गरीब किसानों ने अपने बच्चों को मिशनरियों के हवाले कर दिया. मिशनरियों ने इंग्लैंड और आयरलैंड से पैसे मंगवाए और धर्म प्रचार के लिए इस मौके का इस्तेमाल किया."
"ऐसे हालात में कई लोगों ने जान बचाने के लिए ईसाई धर्म अपना लिया. वहां उन्हें खाना और काम, दोनों मिल सकते थे."
वल्लभविद्यानगर यूनिवर्सिटी के संस्थापक और स्वतंत्र पार्टी के पूर्व अध्यक्ष भाई लाल पटेल के संस्मरणों का हवाला देते हुए अच्युत याग्निक ने आगे लिखा-
"गुजरात में ऐसे धार्मिक गुरु थे, जो किसानों और गरीबों के चढ़ावे से अमीर बन गए थे. वैष्णव हवेलियों में 'छप्पन भोग' लगाए जा रहे थे और आचार्य अपने ठाठ-बाट का आनंद लेने में व्यस्त थे."
"स्वामीनारायण मंदिरों में भी खूब पैसा था. डाकोर के रणछोड़राय मंदिर के पास अच्छा-खासा कोष था और जैन मंदिरों में भी संपत्ति की कमी नहीं थी. लेकिन किसी भी धार्मिक गुरु ने भूखे लोगों का पेट भरने के लिए आगे आने की इच्छा नहीं दिखाई."
वे लिखते हैं कि कुछ उद्योगपतियों ने राहत कार्य किए. दक्षिण अफ़्रीका में रहने वाले गुजरातियों ने भी मदद के लिए पैसा जुटाया. इनमें गांधीजी भी शामिल थे. लेकिन आपदा का दायरा इतना बड़ा था कि यह मदद नाकाफ़ी साबित हुई.
किन लोगों ने इस मुद्दे के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई?
अच्युत याग्निक के मुताबिक़, भारत के पितामह कहे जाने वाले दादाभाई नौरोजी ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठाई.
उन्हें महसूस होने लगा था कि ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ अब एक अलग तरह की रणनीति की ज़रूरत है. उन्होंने राजनीतिक राष्ट्रवाद की आवश्यकता पर जोर दिया.
इसका असर तब देखने को मिला, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 18वां अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ. इस अधिवेशन में अंबालाल सांकरलाल को स्वागत समिति का अध्यक्ष चुना गया.
अच्युत याग्निक ने अंबालाल सांकरलाल के भाषण का हवाला देते हुए लिखा है, "गुजरात एक औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र है. पिछले दो अकालों के कारण एक करोड़ से कम आबादी वाले गुजरात में 25 लाख लोग मर चुके हैं. इसकी वजह देश से बाहर ले जाई जा रही संपत्ति है."
"अहमदाबाद में कई उद्योगपति थे. उन्हें लगता था कि बिगड़ते राजनीतिक हालात की वजह से उनके कारोबार पर असर पड़ रहा है. इसलिए वे राजनीतिक आंदोलन शुरू करना जरूरी समझने लगे थे."
"इनमें से कई लोगों की अपनी कपड़ा मिलें थीं. ब्रिटिश सरकार उनसे 'अनुचित तरीके से एक्साइज़ ड्यूटी वसूल रही थी'. वहीं, लगान व्यवस्था की वजह से किसान भी परेशान थे."
"इन सभी मुद्दों के बीच कांग्रेस के इस अधिवेशन में एक सवाल उठा- 'हम इतने गरीब क्यों हैं?'"
ब्रिटिश शासन का विरोध करने के बावजूद ये लोग पूरी तरह से ब्रिटिश शासन को ख़त्म करने के पक्ष में नहीं थे. अहमदाबाद कांग्रेस में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया:
"हम भारत में ब्रिटिश शासन के स्थायी बने रहने की प्रार्थना करते हैं. हम उस प्राचीन और सम्मानित व्यवस्था की बहाली की मांग करते हैं, जिसने भारत को कानून-व्यवस्था और स्थायी शांति दी है. हम न्याय, स्वतंत्रता, समान अधिकारों और साम्राज्य में अपनी भागीदारी की मांग करते हैं."
करीब 20 लाख लोगों की मौत हुई
ब्रिटिश सरकार के राजपूताना प्रांत में राहत कार्यों के लिए बनाई गई समिति के अध्यक्ष जेई स्कॉट ने अपनी किताब 'इन फ़ेमाइन लैंड' में लिखा है कि ब्रिटिश वायसराय ने हालात की समीक्षा के लिए कलकत्ता में एक बैठक की थी.
उस समय ब्रिटिश सरकार का अनुमान था कि ब्रिटिश शासन वाले इलाकों में कुल 2 करोड़, 20 लाख और दूसरी रियासतों में 2 करोड़, 70 लाख लोग अकाल से प्रभावित थे.
कुल 4 करोड़, 90 लाख लोग अकाल की चपेट में थे. वायसराय ने बताया था कि 30 लाख लोगों को राहत दी जा रही थी.
जेई स्कॉट लिखते हैं, "सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में बॉम्बे प्रांत, काठियावाड़, गुजरात और राजपूताना शामिल थे. करीब 60 लाख लोग सरकारी राहत पर निर्भर थे."
"भारत में आबादी बढ़ने की सामान्य दर डेढ़ फीसदी थी. इस हिसाब से दस साल में आबादी में 10 लाख की बढ़ोतरी होनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय इस अवधि में आबादी में 80 लाख की कमी दर्ज की गई."
वे आगे लिखते हैं कि "सूखे के वर्षों में मृत्यु दर बहुत बढ़ गई थी. भरूच में यह प्रति हजार 2.96 से बढ़कर 24.83 हो गई थी. पंचमहल में यह प्रति हज़ार 46.60, खेड़ा में 21.07 और अहमदाबाद में प्रति हज़ार 24 थी."
इन दिनों हैजा भी फैला हुआ था इसलिए इस बीमारी से मरने वालों की संख्या भी काफ़ी अधिक थी.
साल 1901 की सरकारी अकाल रिपोर्ट के मुताबिक़, "ब्रिटिश इलाकों में करीब 10 लाख लोगों की मौत हुई थी, जिनमें से पांचवां हिस्सा हैजे की वजह से मरा था. रियासतों के इलाकों में भी करीब 10 लाख लोगों की मौत हुई थी."
'गुजरात विश्वकोश' के मुताबिक़, सरकारी आंकड़ों में इस अकाल के दौरान अकेले मुंबई प्रांत में 7,40,376 लोगों की मौत दर्ज की गई थी. इस प्रांत में गुजरात का इलाका भी शामिल था.
ये सरकारी आंकड़े हैं और वह भी ब्रिटिश सरकार के दौर के, जब ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी जुटाने के संसाधन सीमित थे. इसलिए जानकार मानते हैं कि मरने वालों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज़्यादा रही होगी.
जैसा कि पहले बताया गया, अहमदाबाद में कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति के अध्यक्ष अंबालाल सांकरलाल ने मरने वालों की संख्या 25 लाख बताई थी.
दूसरे इतिहासकारों के हवाले से भी इन आंकड़ों में अंतर मिलता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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