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आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ईरान की लगातार नाकामियों का मुक़ाबला कैसे करेंगे?
- Author, उमीद मुंतज़री
- पदनाम, बीबीसी फ़ारसी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
बीते महीने अपदस्थ सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के पतन के बाद से, ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई अपने देश, सीरिया और मध्य पूर्व के भविष्य पर चार बार भाषण दे चुके हैं.
उनके भाषणों में कही गई बात उतनी ही महत्वपूर्ण है जितने वहां बैठे दर्शक.
ईरान के सर्वोच्च नेता को सुनने वालों में ईरानी सैनिक, ईरान समर्थित मिलिशिया और सरकार समर्थक शामिल थे. ये सभी व्यक्ति किसी न किसी तरह से एक दशक पहले सीरिया में हुए गृहयुद्ध की घटनाओं से जुड़े थे.
इन ईरानी सैनिकों को अपनी पहचान इराक़ के ख़िलाफ़ आठ साल तक चले युद्ध में मिली थी, जो 1980 से 1988 तक जारी रहा था.
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हालिया भाषण उन मारे गए ईरानी सैनिकों के परिवारों को भी दिया गया, जिन्हें ईरानी सरकार 'शहीद' कहती है.
इस स्थिति में, हसन नसरल्लाह और क़ासिम सुलेमानी जैसी ख़ास शख़्सियतों की ग़ैर-मौजूदगी में, आयतुल्लाह ख़ामेनेई पर अपने समर्थकों को जवाब देने का दबाव है: ईरान असद शासन का बचाव करने के लिए सीरिया क्यों गया? इस बार सीरिया की रक्षा क्यों नहीं की गई? और ईरान की 'प्रतिरोध की धुरी' (एक्सिस ऑफ़ रेसिस्टेंस) का भविष्य क्या होगा?
ऐसा महसूस होता है कि ईरान सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर विफल रहा है.
ख़ामेनेई ने 'उहुद की जंग' और मुसलमानों की हार का ज़िक्र क्यों किया?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हादी मासूमी ज़ारे और अली समदज़ादेह दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ईरान को यह स्वीकार करना चाहिए कि वह क्षेत्रीय संघर्षों में विफल रहा है और अब नई रणनीति अपनाने का समय आ गया है.
हादी मासूमी ज़ारे का मानना है कि ईरानी सरकार 'जीत के साहित्य' की आदी हो चुकी है, लेकिन अब उसे 'हार का साहित्य' भी सीखना होगा.
इराक़ के ख़िलाफ़ जंग के आख़िर में, तत्कालीन ईरानी सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने युद्ध विराम प्रस्ताव को मंज़ूरी देने को स्पष्ट रूप से 'ज़हर का प्याला पीने' से तुलना की थी.
हालांकि, वर्तमान ईरानी सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अभी तक अपने भाषणों में स्पष्टता ज़ाहिर नहीं की है और न ही उन्होंने ईरानी रणनीति की कमज़ोरी को स्वीकार किया है.
हां, यह ज़रूर है कि उन्होंने इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर का हवाला देते हुए 'जंग ए उहुद' का ज़िक्र किया, जिसे इस्लामी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयों में से एक माना जाता है. इस जंग में मुसलमान पराजित हुए थे.
अपने भाषण के दौरान ख़ामेनेई ने कहा कि, "इस्लाम के शुरुआती दिनों में, मुसलमानों को उहुद के युद्ध के मैदान में भारी नुक़सान उठाना पड़ा, और सिपहसार हमज़ा शहीद हो गए. दूसरे सिपहसलार अली इब्न ए अबी तालिब सिर से पैर तक घायल हो गए."
उन्होंने कहा कि इस जंग में इस्लाम के पैग़ंबर घायल हो गए और 'कई लोग शहीद हो गए. जब वो मदीना वापस लौटे तो कपटी लोगों ने देखा कि यह दुष्प्रचार फैलाने का अच्छा मौक़ा है और उन्होंने इस स्थिति का फ़ायदा उठाने के लिए दुष्प्रचार शुरू कर दिया.'
ऐसा लगता है कि ईरान के सर्वोच्च नेता विफलता की व्याख्या करने से ज़्यादा दुष्प्रचार और अपने समर्थकों के बीच बढ़ते संदेहों से अधिक चिंतित हैं.
ख़ामेनेई ने सीरिया में ईरान की विफलता को कैसे समझाया?
सीरिया में विफलता के बाद मध्य पूर्व में ईरान की स्थिति कमज़ोर होती दिख रही है. नई पीढ़ी के ईरान के इस्लामी गणतंत्र का समर्थन करने वालों में गहरी चिंता पाई जा रही है. ये वही लोग थे जिन्होंने क्षेत्रीय युद्धों और 'प्रतिरोध की धुरी' के माध्यम से अपनी पहचान बनाई.
ईरानी शासन के कई समर्थकों को डर है कि जो कुछ सीरिया के पूर्व शासकों के साथ हुआ, वही ईरान में भी दोहराया जा सकता है.
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने क़ासिम सुलेमानी की पांचवीं बरसी पर अपने भाषण में इन चिंताओं का जवाब देने की कोशिश की है.
ख़ामेनेई ने कहा, "कुछ देश जो बड़ी ग़लती करते हैं, वह यह है कि वे स्थिरता और संप्रभुता जैसी प्रमुख चीज़ों की अनदेखी करते हैं. (लेकिन) युवाओं का गिरोह अपनी जानें क़ुर्बान करने के लिए तैयार रहता है. यह किसी राष्ट्र की संप्रभुता की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है. उन्हें हटाया नहीं जाना चाहिए. हमारे लिए भी यही सबक़ है."
ख़ामेनेई ने कहा, "ख़ुदा का शुक्र है, वो यहां सुरक्षित हैं. कुछ अन्य देशों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए. उन्हें पता होना चाहिए कि उनकी स्थिरता की वजह क्या हैं. उन वजहों को निकाल दिया जाता है तो क्षेत्र के कई देशों में ऐसा ही होता है. (जब) वो स्थिरता और संप्रभुता जैसी चीज़ों को बाहर निकाल देते हैं तो वो सीरिया बन जाते हैं."
ईरान के सर्वोच्च नेता ने ये कहकर दरअसल अपने समर्थकों को दावत दी है कि उन्हें इस मुश्किल हालात में उनकी ज़रूरत है.
असद शासन के पतन के बाद अपने पहले भाषण में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने कहा कि उनके भाषण का उद्देश्य जनता के सवालों और अस्पष्टताओं का जवाब देना था.
वो चाहते हैं कि उनके समर्थकों की चिंताएं दूर हो जाएं और उनका मनोबल ऊंचा हो जाए इसलिए उन्होंने एक महीने के अंदर चौथी बार मध्य पूर्व में ईरान की रणनीति पर चर्चा की.
दमिश्क में असद सरकार के पतन के ठीक तीन दिन बाद, ईरान के सर्वोच्च नेता ने बिना किसी भूमिका के अपने पहले भाषण में सीरियाई मुद्दे को संबोधित करते हुए कहा था, "वो अज्ञानी और भोले विश्लेषक जो इन घटनाओं को ईरान के कमज़ोर होने के रूप में देखते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि ईरान मज़बूत है, वो और अधिक शक्तिशाली बनेगा."
इसी भाषण में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने कहा था कि "सीरिया के मौजूदा हालात और पीड़ा सीरियाई सेना की कमज़ोरी और प्रतिरोध की भावना की कमी का नतीजा हैं."
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि 'सीरिया की कमज़ोरी के उलट' ईरानी सशस्त्र बलों के शीर्ष अधिकारियों का मनोबल ऊंचा है.
ईरान के लिए नए दौर की शुरुआत
ईरान के सर्वोच्च नेता ने इन सभी भाषणों में बशर अल-असद का नाम लेने से भी परहेज़ किया.
हाल के सालों में ईरान और बशर अल-असद के बीच संबंध उतने घनिष्ठ नहीं रहे हैं जितने सीरिया में साल 2011 के बाद हुए गृहयुद्ध के दौरान थे.
बीते चार सालों में, बशर अल-असद ने आर्थिक दबाव और कड़े प्रतिबंधों की वजह से संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब सहित ईरान के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के साथ संबंधों में सुधार किया था.
इसके साथ-साथ इसराइली हमलों और सीरिया में सुरक्षा समस्याओं की वजह से ईरानी सेना की उपस्थिति कमज़ोर हो गई थी.
ऐसा लगता है कि आयतुल्लाह ख़ामेनेई यह अच्छी तरह जानते हैं कि बशर अल-असद के शासन का अंत ईरान के लिए एक नए युग की शुरुआत है.
यह एक ऐसा नया युग है जिसमें ख़तरों के साथ-साथ दोस्त, दुश्मन और जंग की लकीरों को नए सिरे से गढ़ा जाएगा.
यह देखना अभी बाक़ी है कि क्या आयतुल्लाह ख़ामेनेई 'ज़हर का प्याला' पिएंगे और पश्चिम के साथ बातचीत करेंगे या 'जंग ए उहुद' की तरह शिकस्त स्वीकार करना पसंद करेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.