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ईरान युद्ध ने चीन का 'खेल' कैसे बिगाड़ दिया है, अब वो क्या करेगा
- Author, लॉरा बिकर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
चीन को अभी तक मध्य पूर्व के युद्ध का झटका नहीं लगा है, लेकिन इसका हल्का असर उस तक जरूर पहुँच रहा है.
फ़िलहाल चीन के पास कई महीनों के लिए तेल का पर्याप्त भंडार है.
इसके बाद ज़रूरत पड़ने पर वह पड़ोसी रूस से मदद ले सकता है.
लेकिन चीन यह भी सोच रहा है कि लंबे समय में इस युद्ध का क्या असर होगा, न सिर्फ़ मध्य पूर्व में उसके निवेश पर बल्कि उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं पर भी.
इसी हफ़्ते बीजिंग में कम्युनिस्ट पार्टी के हज़ारों प्रतिनिधि बैठक कर रहे हैं.
वे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आगे का रोडमैप तय करने पर चर्चा कर रहे हैं.
चीन इस समय कई आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है. जैसे कम घरेलू खपत, लंबे समय से चल रहा प्रॉपर्टी संकट और स्थानीय सरकारों पर भारी क़र्ज़.
गुरुवार को चीन ने अपने सालाना आर्थिक विकास लक्ष्य को घटाकर 1991 के बाद के सबसे निचले स्तर पर कर दिया.
हालाँकि इसके साथ ही चीन हाई-टेक और नवीकरणीय ऊर्जा उद्योगों के तेज़ विकास पर भी काम कर रहा है.
मध्य पूर्व की अस्थिरता का चीन पर असर
चीन को उम्मीद थी कि वह निर्यात बढ़ाकर अपनी आर्थिक मुश्किलों से निकल सकता है.
लेकिन पिछले एक साल से वह अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर में उलझा हुआ है.
अब उसे मध्य पूर्व में अस्थिरता का ख़तरा भी झेलना पड़ सकता है.
जबकि वही क्षेत्र उसके प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा स्रोत है.
अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर और गंभीर हो सकता है. ख़ासकर अगर होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाज़ों की आवाजाही आगे भी बाधित रहती है.
लंदन स्थित रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ फिलिप शेटलर-जोन्स कहते हैं, ''अगर मध्य पूर्व में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका असर उन दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा जो चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं."
वो कहते हैं, ''अफ़्रीका की कई अर्थव्यवस्थाओं को खाड़ी देशों से लगातार निवेश मिलता रहा है. अगर यह निवेश रुकता है तो इससे व्यापक अस्थिरता पैदा हो सकती है. इससे चीन के लंबे समय के हितों को भी नुक़सान पहुँच सकता है.''
यानी चीन के वैश्विक निवेश और बाज़ार भी इस लंबे युद्ध से प्रभावित हो सकते हैं.
किंग्स कॉलेज लंदन के चाइना लाऊ इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफ़ेसर केरी ब्राउन कहते हैं, ''मुझे लगता है चीन वही सोच रहा है जो बाक़ी दुनिया सोच रही है. आख़िर इस सबकी रणनीति क्या है? क्या अमेरिका बिना किसी योजना के इसमें कूद गया है?"
वो कहते हैं, ''शायद बाक़ी देशों की तरह चीन भी सोच रहा होगा, हे भगवान, क्या सच में अमेरिका बिना किसी साफ़ योजना के इसमें उतर गया? हम इस संघर्ष में फँसना नहीं चाहते, लेकिन हमें कुछ न कुछ करना भी पड़ेगा."
ईरान और चीन की दोस्ती कितनी मज़बूत
पश्चिमी देशों में अक्सर ईरान को चीन का "सहयोगी" बताया जाता रहा है.
दोनों देशों के संबंध निश्चित रूप से काफ़ी दोस्ताना रहे हैं.
ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की आख़िरी विदेशी यात्रा 1989 में चीन की थी.
उस समय उन्होंने ग्रेट वॉल के सामने फोटो भी खिंचवाई थी.
दोनों देशों के संबंध 2016 में और गहरे हुए, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तेहरान का दौरा किया.
इसके बाद 2021 में दोनों देशों ने 25 साल की रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर किए.
इसके तहत चीन ने ईरान में 25 वर्षों में 400 अरब डॉलर निवेश का वादा किया. बदले में ईरान ने तेल आपूर्ति जारी रखने का भरोसा दिया.
हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इस निवेश का बहुत छोटा हिस्सा ही वास्तव में ईरान तक पहुँचा है. लेकिन तेल की आपूर्ति जारी रही.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी के अनुसार 2025 में चीन ने ईरान से रोज़ लगभग 13.8 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया.
यह चीन के कुल तेल आयात का लगभग 12 फ़ीसदी है.
कहा जाता है कि इनमें से कई तेल खेपों को उनकी असली पहचान छिपाने के लिए "मलेशियाई तेल" के तौर पर दिखाया गया.
एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एशिया में लगभग 4.6 करोड़ बैरल ईरानी तेल समुद्र में स्टोरेज जहाज़ों में रखा है.
इसके अलावा चीन के डालियान और झोउशान बंदरगाहों में भी काफ़ी तेल जमा है, जहाँ ईरान की राष्ट्रीय तेल कंपनी ने टैंक किराए पर लिए हैं.
दोनों देशों के बीच हथियारों के लेन-देन के आरोप भी लगे हैं. चीन ने ईरान को एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइल बेचने से इनकार किया है.
लेकिन अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों का आरोप है कि चीन ने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम में इंजीनियरों को ट्रेनिंग और उपकरण देकर तकनीकी मदद दी.
मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि ईरान में विरोध प्रदर्शनों को दबाने में इस्तेमाल की गई निगरानी तकनीक ( जैसे फ़ेस रिकग्निशन ) चीन से मिली है.
इन सब बातों से ऐसा लगता है कि दोनों देशों के संबंध बहुत मज़बूत हैं.
इसी वजह से कुछ पश्चिमी मीडिया ने चीन, ईरान, उत्तर कोरिया और रूस को मिलाकर "अस्थिरता की धुरी" तक कहा.
हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन संबंधों की बुनियाद वैचारिक नहीं बल्कि लेन-देन वाली है.
प्रोफे़सर ब्राउन कहते हैं, "ऐसा कोई ख़ास वैचारिक या सांस्कृतिक कारण नहीं है कि चीन और ईरान स्वाभाविक रूप से क़रीब हों."
''चीन की लगभग 'फूट डालो और राज करो' जैसी रणनीति को कई बार इस बात से फ़ायदा हुआ कि ईरान अमेरिका के लिए लगातार परेशानी का कारण बना रहा. इसलिए मुझे लगता है कि चीन के ईरान से संबंध रखने की वजह ज़्यादातर सकारात्मक नहीं, बल्कि नकारात्मक हैं.''
उनके मुताबिक़ यह रिश्ता बहुत मजबूत नहीं था. ये बस एक सीमा तक काम करता रहा.
चीन पश्चिमी देशों की तरह अपने सहयोगियों के साथ रक्षा समझौते नहीं करता.
इसलिए वह किसी सहयोगी की मदद के लिए तुरंत मिलिट्री मदद लेकर आगे नहीं आता.
चीन आम तौर पर किसी भी संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहता है.
ज़िम्मेदार ताक़त बनने की कोशिश
फिर भी इसका मतलब यह नहीं कि चीन मध्यपूर्व की घटनाओं से चिंतित नहीं है.
चीन ने इस पर अपेक्षाकृत हल्की प्रतिक्रिया दी और युद्धविराम की अपील की.
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, "अमेरिका और इसराइल की ओर से ईरान पर हमले को मंज़ूर नहीं किया जा सकता. किसी संप्रभु देश के नेता की हत्या कर शासन परिवर्तन की कोशिश करना तो बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं है."
दरअसल वेनेज़ुएला और अब ईरान की घटनाओं ने यह दिखा दिया है कि चीन की साझेदारियों की भी सीमाएँ हैं.
इन दोनों मामलों में चीन सिर्फ़ दर्शक बनकर रह गया और अपने सहयोगियों की मदद नहीं कर सका.
फिलिप शेटलर-जोन्स कहते हैं कि चीन ख़ुद को अमेरिका को बैलेंस करने वाली एक "ज़िम्मेदार ताक़त" के तौर पर दिखाना चाहता है.
''लेकिन सैन्य क्षमता के मामले में अमेरिका अभी भी दुनिया में कहीं भी नतीजे तय करने की क्षमता रखता है.''
उनके मुताबिक़ चीन बड़े स्तर की आर्थिक ताक़त होने के बावजूद अमेरिका के स्तर का सुपरपावर नहीं है.
इन चिंताओं का जवाब देने के लिए शी जिनपिंग ख़ुद को एक स्थिर और भरोसेमंद वैश्विक नेता के रूप में पेश करते रहेंगे, जो डोनाल्ड ट्रंप के उलट हैं.
एसओएएस चाइना इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर स्टीव त्सांग कहते हैं, "चीन यह तर्क देगा कि डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बिना किसी शक के यह दिखा दिया है कि पश्चिम की कथनी और करनी में कितना फ़र्क है. ख़ासकर तब जब वो 'उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' की बात करता है."
प्रोफ़ेसर त्सांग कहते हैं कि ईरान युद्ध के कारण एनर्जी सप्लाई और हवाई यात्रा में आने वाली बाधाओं का आर्थिक असर पश्चिम की तुलना में ग्लोबल साउथ के देशों पर कहीं अधिक पड़ेगा.
वो कहते हैं, "कुछ देशों में कुछ ही महीनों में खाद्य संकट पैदा हो सकता है…और ये देश ज़्यादातर ग्लोबल साउथ के होंगे. हम पश्चिमी गठबंधन में दरार भी देखने लगे हैं, जहाँ ब्रिटेन और स्पेन जैसे देशों को निशाना बनाकर आलोचना या हमले किए जा रहे हैं."
चीन इसे अन्य देशों के साथ मिलकर वार्ता में मध्यस्थता करने के अवसर के रूप में भी देख सकता है.
चीन के विदेश मंत्री वांग यी पहले ही ओमान और फ़्रांस के अपने समकक्षों से बात कर चुके हैं. चीन ने घोषणा की है कि वह मध्यपूर्व में एक विशेष दूत भेजेगा.
ट्रंप से मुलाक़ात की तैयारी
इतने सारे घटनाक्रम के बीच भी चीन बेहद सावधानी से क़दम बढ़ा रहा है.
इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जो इस महीने के अंत में चीन आने वाले हैं.
चीन ने अब तक अमेरिका और इसराइल की आलोचना करते हुए भी ट्रंप पर सीधा हमला नहीं किया है. इससे मुलाक़ात आसान हो सकती है.
रॉयटर्स के मुताबिक़ दोनों देशों के अधिकारी अभी इस यात्रा की तैयारियों पर चर्चा कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस मुलाक़ात से यह समझने की कोशिश करेगा कि अमेरिका ताइवान जैसे मुद्दों पर आगे क्या रुख़ अपनाएगा.
कुछ चीनी रणनीतिकार इस संकट को अमेरिका को "युद्ध भड़काने वाले देश " के तौर पर दिखाने के मौक़े के रूप में भी देख रहे हैं.
लेकिन प्रोफ़ेसर केरी ब्राउन कहते हैं कि अमेरिका का इतना अप्रत्याशित और अस्थिर व्यवहार चीन के लिए भी चिंता का कारण है.
वे कहते हैं, "चीन शायद ऐसी दुनिया नहीं चाहता, जिसमें अमेरिका का पूर्ण वर्चस्व हो. लेकिन वह ऐसी दुनिया भी नहीं चाहता जिसमें अमेरिका इतना अस्थिर खिलाड़ी बन जाए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.