जब जहांगीर ने अहमदाबाद को कहा था 'गर्दाबाद' और 'जहन्नुमाबाद', क्या थी इसकी वजह?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, जय शुक्ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
"इस शहर के संस्थापक को इस जगह में ऐसा कौन सा सौंदर्य दिखाई दिया कि उन्होंने यहां शहर बसाया? इसके अलावा, दूसरे बादशाहों ने भी यहां अपनी ज़िंदगी के कीमती साल कैसे बिताए होंगे? यह मेरी कल्पना से भी परे है. यहां गर्म हवाएं चलती हैं और पानी की कमी रहती है."
"मैं इस शहर को गर्दाबाद (धूल से भरा शहर) तो कह ही चुका हूं. इसकी हवा भी धूल से भरी हुई है. यहां का पानी बेहद ख़राब है और पीने लायक नहीं है."
"शहर के पास बहने वाली नदी मानसून को छोड़कर बाकी समय सूखी रहती है. कुओं का पानी ज़्यादातर खारा है. तालाबों का पानी धोबियों ने कपड़े धो-धोकर छाछ जैसा बना दिया है."
"संपन्न लोगों के घरों में टांके होते हैं. वे बरसात का पानी जमा करके पूरे साल इस्तेमाल करते हैं. ऐसा पानी, जिसमें बाहर की हवा न लगी हो, सेहत के लिए नुक़सानदेह है."
"शहर के बाहर की ज़मीन हरियाली की बजाय कांटों (थोर) से ढकी हुई है. इन कांटों के ऊपर से बहने वाली हवा का असर सब जानते हैं. मैं इस शहर को पहले गर्दाबाद कह चुका हूं और अब समझ नहीं पा रहा कि इसे क्या कहूं."
"मैं इसे शमुमिस्तान कहूं, या बीमारीस्तान कहूं, या फिर ज़ुकुमदार (कांटों का शहर) कहूं, या फिर जहन्नुमाबाद (नरक का शहर)? क्योंकि ये सभी नाम इस पर ठीक बैठते हैं."
ये शब्द जहांगीर ने अपनी आत्मकथा 'तुज़ुक-ए-जहांगीरी', यानी 'जहांगीरनामा' में लिखे हैं.
आज अहमदाबाद अपनी समृद्ध विरासत, भव्य स्थापत्य और यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी के रूप में सम्मानित स्थान रखता है.
लेकिन मुग़ल बादशाह जहांगीर के साथ इस शहर में ऐसा क्या हुआ था कि उन्होंने इसे इतने नकारात्मक नाम दे दिए?
आख़िर क्यों जहांगीर ने 'तुज़ुक-ए-जहांगीरी' में अहमदाबाद के प्रति अपना गुस्सा और नफ़रत खुलकर ज़ाहिर की?
अहमदाबाद आने के बाद जहांगीर को बुख़ार हो गया

इमेज स्रोत, Getty Images
आपके लिए नितिन श्रीवास्तव द्वारा चुनी गईं खास कहानियाँ
और जानें
समाप्त
जहांगीर बादशाह के समय अहमदाबाद में 8 सूबेदार नियुक्त किए गए थे. सूबेदार मुक़र्रब ख़ान के समय जहांगीर बादशाह ने गुजरात का दौरा किया था.
वे मालवा से खंभात होते हुए अहमदाबाद आने वाले थे. हिजरी सन 1027, यानी साल 1617 के दिसंबर महीने में लगभग 30 तारीख़ के आसपास, बादशाह का क़ाफ़िला खंभात में समुद्र की सैर करने के बाद अहमदाबाद के लिए रवाना हुआ था.
पांच दिन की यात्रा के बाद उनका क़ाफ़िला अहमदाबाद पहुंचा. शहर में प्रवेश का मुहूर्त अगले दिन था, इसलिए उन्होंने कांकरिया तालाब के पास डेरा डाला.
जहांगीर लिखते हैं, "कांकरिया तालाब के अंदर का बाग़ उजड़ गया था और इमारतें गिर चुकी थीं. इसलिए सफ़ी ख़ान ने उनकी मरम्मत करवाई."
कांकरिया की बनावट बादशाह को बहुत पसंद आई. लेकिन नगीनावाड़ी के पुल के पास तालाब के किनारे 'तबक़ात-ए-अकबरी' के लेखक और प्रसिद्ध बख्शी निज़ामुद्दीन अहमद ख़ान का बाग़ था.
जहांगीर लिखते हैं कि उसके पेड़ भी काट दिए गए थे.
अगले दिन जब उन्होंने अहमदाबाद में प्रवेश किया, तो रास्ते में उन्हें देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी.
जहांगीर लिखते हैं, "कांकरिया से भद्र तक पूरे रास्ते में केवल धूल ही धूल थी. मुख्य सड़क चौड़ी और विशाल थी, लेकिन दुकानों का रूप-रंग सड़क की शोभा के अनुरूप नहीं था. मकान लकड़ी के बने हुए थे और सड़क की ओर बने उनके खंभे पतले और कमज़ोर थे."

इमेज स्रोत, Photo by Burstein Collection/Corbis/VCG via Getty Images
अहमदाबाद पहुंचने के बाद जहांगीर ने अपने बेटे शाहजहां का 27वां जन्मदिन मनाया.
जहांगीर को अहमदाबाद पसंद नहीं आया. इसलिए उन्होंने मालवा होते हुए आगरा जाने का विचार किया. 10 फ़रवरी 1618 को उन्होंने अहमदाबाद छोड़ दिया.
लेकिन जब बादशाह का काफ़िला मालवा की सीमा तक पहुंचा, तो उन्हें बेचैनी महसूस हुई.
उन्होंने दोबारा अहमदाबाद लौटने का फ़ैसला किया. मालवा की सीमा से झालोद होते हुए वे फिर अहमदाबाद पहुंच गए. 17 अप्रैल 1618 को उन्होंने दोबारा शहर में प्रवेश किया.
उस समय उनका अहमदाबाद प्रवास लंबा था. लेकिन उसी दौरान शहर में एक बीमारी फैल गई थी.
जहांगीर लिखते हैं, "अहमदाबाद में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा होगा जिसे यह बीमारी न हुई हो. अच्छी बात यह थी कि इससे मरने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ी थी."
जहांगीर को भी बुख़ार हो गया था. उस समय अहमदाबाद में रहने वाले यूरोपीय लोग भी इसकी चपेट में आ गए थे.
इस बीमारी के दर्द और कमज़ोरी से परेशान होकर जहांगीर ने अहमदाबाद के प्रति अपना गुस्सा और नाराज़गी ज़ाहिर की.
उन्होंने अहमदाबाद को गर्दाबाद, जहन्नुमाबाद और शमुमिस्तान जैसे उपनाम दिए.
अहमदाबाद की हवा की गुणवत्ता जांचने के लिए जहांगीर का प्रयोग

इमेज स्रोत, Getty Images
'जहांगीरनामा' में दिए गए विवरण के अनुसार, जहांगीर का प्रकृति प्रेम और पशु-पक्षियों के बारे में उनका गहरा ज्ञान आश्चर्यजनक था.
उन्होंने चित्रकारों को प्रोत्साहित किया था और वे स्वयं भी एक कुशल चित्रकार थे. इसके अलावा, उन्हें संगीत और बाग़-बगीचों का भी शौक था.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंसेज़ ऑफ़ इंडिया की ओर से प्रकाशित और एमए अल्वी एवं ए. रहमान की लिखी किताब "जहांगीर - द नेचुरलिस्ट" में अहमदाबाद में उनके किए एक प्रयोग का उल्लेख मिलता है.
इसमें बताया गया है कि जहांगीर ने अहमदाबाद और महेमदाबाद की हवा और पानी की तुलना करने के लिए एक प्रयोग किया था.
इसमें दर्ज है, "अहमदाबाद और महेमदाबाद के वातावरण की मानव स्वास्थ्य के लिए उपयुक्तता जांचने के लिए यह प्रयोग किया गया था. जहांगीर लिखते हैं, 'निःसंदेह महेमदाबाद का पानी और हवा, अहमदाबाद के पानी और हवा जैसे नहीं हैं. इस बात की जांच करने के लिए मैंने सख़्त आदेश दिया कि कांकरिया तालाब के किनारे एक भेड़ की खाल उतारकर उसे लटका दिया जाए.''
"साथ ही, ऐसी ही एक भेड़ महेमदाबाद में भी लटकाई जाए, ताकि दोनों स्थानों की हवा में मौजूद अंतर का पता चल सके. अहमदाबाद में 7 घड़ी समय बीतने के बाद भेड़ को लटकाया गया."
"जब दिन की केवल 3 घड़ी बाकी रह गई थी, तब उसका शरीर इतना बदलकर सड़ चुका था कि उसके पास से गुज़रना भी मुश्किल हो गया था. दूसरी ओर, महेमदाबाद में सुबह लटकाई गई भेड़ के शरीर में शाम तक कोई बदलाव नहीं आया था. रात का डेढ़ पहर बीतने के बाद ही उसमें सड़न शुरू हुई थी."
"संक्षेप में कहें तो अहमदाबाद में भेड़ का शरीर 8 घंटे में सड़ गया था, जबकि महेमदाबाद में उसे सड़ने में 14 घंटे लगे थे." (Rogers, Vol. II, London, 1914, p. 33)
जहांगीर अहमदाबाद में नौ महीने तक रहे

इतिहासकार रत्नमणिराव भीमराव की लिखित और गुजरात साहित्य सभा की ओर से प्रकाशित पुस्तक 'गुजरातनुं पाटनगर-अहमदाबाद' में लिखा गया है कि जहांगीर की नाराज़गी अहमदाबाद शहर से नहीं, बल्कि इस बात से थी कि इस जगह पर शहर क्यों बसाया गया.
रत्नमणिराव लिखते हैं, "एक विदेशी यात्री ने भी लिखा है कि अहमदाबाद की सड़कें धूलभरी थीं. लेकिन 18वीं सदी तक इस शहर की आलोचना करने वाला कोई नहीं मिलता."
"अबुल फ़ज़ल लिखते हैं कि पाटण से वडोदरा तक का पूरा इलाक़ा एक बाग़ जैसा दिखाई देता था. जहांगीर के बाद आने वाले यात्री अहमदाबाद को एक विशाल उद्यान बताते हैं."
"सुल्तान महमूद बेगड़ा को अच्छी हवा और बड़े बाग़-बगीचों का बहुत शौक था. वे गर्मियों में चांपानेर से विशेष रूप से अहमदाबाद आते थे."
"इन सभी बातों से ऐसा लगता है कि बादशाह ने अहमदाबाद की जो आलोचना की थी, वह संभवतः उनकी बीमारी की वजह से थी."
वे आगे लिखते हैं, "ऐसा भी नहीं है कि जहांगीर ने अहमदाबाद में आनंद नहीं लिया. उसी दौरान एक दिन बहुत तेज़ बारिश हुई थी और साबरमती नदी में बाढ़ आ गई थी."
"उस बाढ़ में कई मकान भी गिर गए थे. जहांगीर ने भी लिखा है कि अहमदाबाद के लोग कहते थे कि इससे पहले इतनी बारिश कभी नहीं हुई थी. जहांगीर ने अहमदाबाद में अच्छा समय भी बिताया था."
"कांकरिया उनकी पसंदीदा जगहों में से एक प्रतीत होती है. एक बार शब-ए-बरात की रात उन्होंने कांकरिया के आसपास रोशनी करने का आदेश दिया था और आतिशबाज़ी भी करवाई थी."
"बादशाह को इसमें इतना आनंद आया कि उन्होंने अगले दिन भी रोशनी करवाई. उसी अवसर पर उन्होंने कांकरिया के किनारे रहने वाले एक संन्यासी से मुलाक़ात की थी और उनसे बातचीत भी की थी."
ब्रिटिश यात्री थॉमस रो का उल्लेख करते हुए रत्नमणिराव लिखते हैं, "वे जहांगीर के अहमदाबाद आने पर उनसे मिलने गए थे. उस समय बादशाह शहर के एक बाग़ में महिलाओं के साथ नदी किनारे बैठे थे. बादशाह से मुलाक़ात नहीं हो पाई और मुझे भद्र महल में बुलाया गया. जब मैं महल पहुंचा, तब बादशाह वहां नहीं थे."

इमेज स्रोत, Getty Images
2 सितंबर 1618 को बादशाह का काफ़िला फिर रवाना हुआ और एक बार फिर कांकरिया तालाब के किनारे रुका. रत्नमणिराव लिखते हैं कि उसी समय बादशाह ने अपना 50वां जन्मदिन वहीं मनाया था.
उस समय इस्लाम का पवित्र महीना रमज़ान चल रहा था. इसलिए जहांगीर ने अहमदाबाद के विद्वानों को बुलाकर रोज़ा खोला था. रत्नमणिराव यह भी लिखते हैं कि उस दिन मोतियों और सोने के फूल भी बिखेरे गए थे.
जहांगीर ने कांकरिया में चार दिन तक प्रवास किया था. उन्होंने अहमदाबाद में लगभग नौ महीने तक निवास किया था.
इसी वर्ष जहांगीर ने अपने पुत्र शाहजहां को अहमदाबाद का सूबेदार नियुक्त किया था. अहमदाबाद में अपने प्रवास के दौरान जहांगीर ने सिक्के भी ढलवाए थे.
उस समय राज्य का प्रशासन उनकी पत्नी नूरजहां के हाथों में था. इसलिए कहा जाता है कि उन सिक्कों पर यह शब्द भी लिखे गए थे- "राज्य के तेरहवें वर्ष में जहांगीर की पत्नी नूरजहां, अहमदाबाद की महिला सूबेदार."
अहमदाबाद के कालूपुर में स्थित टकसाल जहांगीर के समय की बनी हुई मानी जाती है.
जहांगीर के इस प्रवास के दौरान शाहजहां की आयु 27 वर्ष थी. उन्होंने अपनी युवावस्था का बेहतरीन समय अहमदाबाद में बिताया था. लेकिन तीन वर्ष बाद शाहजहां ने अपने ही पिता के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.






















