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ग़ज़ा में इसराइली बंधकों को छुड़ाना कितने जोखिम का काम?
- Author, फ़्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता, यरूशलम
- प्रकाशित
शुक्रवार को इसराइली डिफ़ेंस फ़ोर्सेस (आईडीएफ़) ने ग़ज़ा में सफेद कपड़ा लहराते तीन इसराइली बंधकों को ग़लती से हमास के लड़ाके समझ कर गोली मार दी.
इस घटना ने ये दिखाया है कि बंधकों को सैन्य कार्रवाई के ज़रिए छुड़ाने का काम कितना जोखिम भरा है.
ब्रिटिश सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल चार्ली हर्बर्ट ने इराक़ और अफ़िग़ानिस्तान में 13 सैन्य अभियानों में भूमिका निभाई है.
मेजर जनरल हर्बर्ट ने बीबीसी से कहा, "तीन बंधकों को गोली मार कर मार डालना दुखद है और यह ताक़त के इस्तेमाल और विशेष स्थितियों में कार्रवाई की आईडीएफ़ की रणनीति पर सवाल खड़ा करता है. कोई सिर्फ ये कल्पना ही कर सकता है कि इसी तरह के हालात में कितने नागरिक मारे गए होंगे."
इसराइली सेना का कहना है कि वो नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुंचाने के लिए भारी सतर्कता बरत रही है, लेकिन ग़ज़ा में 18,000 से अधिक मौतों के लिए उस पर बमबारी का दोष लगाया जा रहा है.
इतिहास में अपहरण की जितनी वारदातें हुईं हैं उनमें लगभग हर मामले में देखा गया कि सैन्य कार्रवाई के बजाय मध्यस्थता और समझौते के मार्फ़त अपहृत लोगों को सुरक्षित छुड़ा पाने की संभावना अधिक रहती है.
अतीत के बंधक संकट से मिले सबक
बंधकों के मामले को मैंने कवर किया था, जब 1998 में यमन में अल-क़ायदा से जुड़े जिहादियों ने 16 पश्चिमी पर्यटकों को अगवा कर लिया था.
उस समय ब्रिटिश राजदूत बंधकों की रिहाई के लिए वार्ता शुरू करने का दबाव बनाने के लिए गृह मंत्री से मिले थे.
लेकिन तबतक देर हो गई थी और उन्हें बताया गया कि यमन की सेना पहले ही कार्रवाई के लिए निकल चुकी है.
इस कार्रवाई के दौरान गोलीबारी में एक चौथाई बंधक मारे गए और अन्य घायल हो गए.
हालांकि पश्चिमी और इसराइली विशेष सुरक्षा दस्ते बंधकों को छुड़ाने की कला में पारंगत होने के लिए दशकों खर्च कर चुके हैं लेकिन इसके बावजूद कभी योजना के मुताबिक कुछ नहीं हुआ.
1976 में यूगांडा के एंतेबे में इसराइल ने इसी तरह का एक ऑपरेशन चलाया था जिसमें उसने 106 में से 102 बंधकों को छुड़ा लिया, लेकिन इसराइली कमांडो का कमांडर मारा गया.
आज उसी कमांडो के भाई बिन्यामिन नेतन्याहू इसराइल के प्रधानमंत्री हैं.
1980 में एसएएस ने लंदन में ईरान के दूतावास को कब्ज़ा कर लिया था. बंधक रिहाई मामले में आधुनिक समय की एक प्रमुख घटना थी क्योंकि यह टीवी कैमरों के सामने घटी.
साल 2009 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने एक ब्रिटिश पत्रकार स्टेफेन फ़ैरेल का अपहरण कर लिया था, जिसे ब्रिटिश स्पेशल फ़ोर्सेस ने छुड़ाया.
लेकिन इस कार्रवाई में हिस्सा ले रहे एक सैनिक, दो नागरिक और अफ़ग़ान अनुवादक की मौत हो गई.
इसके दूसरे साल ही अफ़ग़ानिस्तान में ही तालिबान ने एक ब्रिटिश सहायता कर्मचारी लिंडा नोर्ग्रोव का अपहरण कर लिया और उसे अमेरिकी नेवी सील ने छुड़ाया.
इस हथियारबंद कार्रवाई में लिंडा के अपहरणकर्ता की मौत हो गई लेकिन सैनिकों में से एक ने ग्रेनड फेंका था जिसके जद में आने से लिंडा की भी मौत हो गई.
नाइजीरिया में 2012 में एक ब्रिटिश और एक इतालवी बंधक को रिहा कराने के लिए चलाया गया ब्रिटिश स्पेशल फ़ोर्सेस का अभियान बर्बाद हो गया जब नाइजारियाई सैनिकों ने पहले ही गोली चला दी. इससे अपहरणकर्ता सतर्क हो गए और उन्होंने बंधकों की हत्या कर दी.
सैन्य कार्रवाई बनाम कूटनीतिक रास्ता
सालों से यमन में बंधक संकट के कई मामले आम तौर पर शांतिपूर्ण लंबी वार्ताओं के मार्फ़त हल किए गए.
लेकिन आख़िरकार ये सब अपहरणकर्ताओं की मांगों और उनकी मंशा पर निर्भर करता है.
अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट ग्रुप (आईएस) के मामले में, जिहादी अपहरणकर्ताओं की मंशा कभी भी अमेरिकी और ब्रिटिश बंधकों को रिहा करने की नहीं रही.
इसकी बजाय उनका लक्ष्य, कैमरे के सामने उनकी हत्या करके मनोवैज्ञानिक असर डालने का होता था.
इन हालातों में, अगर जगह का पता चल जाए तो आम तौर पर हथियारबंद कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प बचता है.
हमास इन दोनों का मिला जुला मामला है. सात अक्टूबर को दक्षिणी इसराइल पर किया गया उनका हमला बहुत क्रूर और हिंसक था. लेकिन बाद में वे 100 से अधिक बंधकों को रिहा करने के लिए समझौते के इच्छुक रहे हैं.
आज इसराइल के बंधकों के परिवारों को ये पता चल चुका है कि अस्थाई युद्ध विराम के दौरान जिनको रिहा कराया गया, उनकी आज़ादी साहसिक सैन्य कार्रवाई की बजाय अमेरिका समर्थित, क़तर और मिस्र की मध्यस्थता और पीड़ादायी वार्ताओं से ही संभव हो पाई.
आज तक केवल एक इसराइली बंधक, प्राइवेट ओरी मेगेदिश को ही सेना द्वारा छुड़ाया जा सका है.
लेकिन अपहरणकर्ताओं से समझौता करना, ख़ासकर जिन्हें कई सरकारों ने आतंकवादी घोषित कर रखा हो, उसे पचा पाना बहुत कड़वी सच्चाई है.
अपहरणकर्ता इसके बदले कुछ मांग रखेंगे.
हमास के मामले में, इसका मतलब होगा इसराइली जेलों में बंद बड़ी संख्या में कैदियों की रिहाई, लड़ाई बंद करना और ग़ज़ा में पर्याप्त मात्रा में सहायता सामग्री भेजने की इजाज़त देना.
जनरल हर्बर्ट के अनुसार, आगे भी बंधकों की सफल रिहाई केवल कूटनीतिक बातचीत से ही संभव हो सकती है.
वो कहते हैं, “ग़ज़ा में इस मुद्दे का कोई प्रभावी सैन्य समाधान नहीं है.”
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