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लोकसभा चुनाव 2024: मोदी फ़ैक्टर का कितना असर रहा?
- Author, संजय कुमार
- पदनाम, सीएसडीएस
- प्रकाशित
अठारहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को अपने प्रचार अभियान का चेहरा बनाने की रही थी.
गठबंधन के उम्मीदवारों ने मतदाताओं को लगातार ये बात ज़ोर देकर कही कि इस बार का वोट उनके बजाय पीएम मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए है.
पीएम मोदी ने पूरे देश में सिर्फ़ बीजेपी उम्मीदवारों के लिए नहीं बल्कि अपने सहयोगी दलों के प्रत्याशियों के लिए भी प्रचार किया.
विपक्षी गठबंधन इस चुनाव को नेतृत्व की लड़ाई न बनने देने को लेकर सजग था और जानबूझ कर प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया.
'लोकनीति-सीएसडीएस डेटा 2024' चुनावों में नतीजों पर नेतृत्व के फ़ैक्टर के संभावित असर को दिखाता है.
दोनों गठबंधन के दो नेताओं के बीच कोई स्पष्ट लड़ाई नहीं थी, इसके बावजूद मतदाताओं में प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी पहले पसंद बने रहे.
जवाब देने वाले हर 10 लोगों में से चार से थोड़ा ही अधिक (41%) लोगों ने कहा कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी पसंद नरेंद्र मोदी थे.
राहुल गांधी का नाम एक चौथाई से थोड़े अधिक (27%) लोगों ने लिया (टेबल 1 देखें).
यहां ये बताना महत्वपूर्ण हो सकता है कि प्रधानमंत्री पद के लिए पसंदीदा उम्मीदवार के बारे में इससे पहले के चुनावों में भी सवाल पूछे गए थे.
इस बार, 2019 के मुक़ाबले प्रधानमंत्री पद के लिए पसंदीदा विकल्प के तौर पर नरेंद्र मोदी के ज़िक्र में 6 प्रतिशत की कमी आई.
जबकि प्रधानमंत्री पद के लिए पसंदीदा विकल्प के तौर पर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच अंतर आठ प्रतिशत कम हो गया.
एक दशक पहले यह अंतर 22 प्रतिशत था. (टेलब 2)
मोदी पीएम उम्मीदवार थे, वोटर के फ़ैसले पर इसका कितना असर रहा
क्या वोटिंग के फ़ैसले में प्रधानमंत्री पद के लिए प्राथमिकता का कोई असर पड़ा था?
जवाब देने वालों में 10 में से छह लोगों ने कहा कि मतदान के उनके फैसले पर इसका असर था.
जिन उत्तरदाताओं ने भाजपा को वोट दिया था, उनमें से तीन-चौथाई ने बताया कि इसका असर पड़ा था, जबकि हर 10 में से चार ने कहा कि इसका बहुत बड़ा असर पड़ा था.
बीजेपी के सहयोगियों के मामले में, हर 10 में से 6 लोगों ने कहा कि इस फ़ैक्टर का असर था और एक चौथाई ने कहा कि इसका बड़ा असर हुआ.
लेकिन जिन लोगों ने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को वोट किया उनमें मतदाता प्राथमिकता तय करने में नेतृत्व फ़ैक्टर का असर बहुत कम था.
इस फ़ैक्टर के बहुत अधिक असर का दावा करने वालों में, बीजेपी और इसके सहयोगी दलों के मुक़ाबले कांग्रेस को वोट डालने वालों के लिए ये बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था. (टेबल 3)
प्रतिक्रिया इस पर ली जा रही थी कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होते तो क्या मतदान की प्राथमिकता में कोई बदलाव होता.
साल 2014 में जब यह सवाल पूछा गया था, तो बीजेपी को वोट देने वालों में एक चौथाई से थोड़े ही अधिक (27%) लोगों ने कहा था कि उन्होंने जिस तरह से वोट किया वो तरीक़ा बदल दिया होता.
साल 2019 में दो तिहाई (32%) लोगों ने यही रुख़ अपनाया.
इस बार सर्वेक्षण दिखाता है कि बीजेपी को वोट करने वालों में एक चौथाई (25%) लोगों ने कहा कि अगर मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होते तो उन्होंने वोट देने का तरीक़ा बदल दिया होता.
यह आंकड़ा छह प्रतिशत कम हुआ.
इस तरह, बीजेपी ने अपने चुनाव प्रचार को मोदी केंद्रित बना दिया इसके बावजूद, जिन लोगों ने भाजपा को वोट देने की बात कही, उनमें से हर 10 में से छह (56%) ने कहा कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होते तो भी वे उसी पार्टी को वोट देना जारी रखते.
स्पष्ट रूप से, मतदाताओं को बीजेपी की ओर मोड़ने की मोदी फ़ैक्टर की क्षमता एक दशक में ठहर गई लगती है.
बढ़ता असंतोष
एनडीए को बहुमत दिलाने वाले फ़ैक्टर के बावजूद, बेरोज़गारी, महंगाई, गिरती आय और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर मौजूदा सरकार ने ध्यान नहीं दिया.
इन मुद्दों ने काफ़ी हद तक मौजूदा सरकार का समर्थन करने से वोटरों को हतोत्साहित किया है.
उदाहरण के लिए, अप्रैल 2024 में चुनाव पूर्व सर्वे के दौरान हर तीसरे वोटर के लिए बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या थी.
हालांकि, प्रचार अभियान के दौरान, संभवतः रोज़गार के वादों के वोटरों के बीच गूंजने के कारण, चुनाव बाद सर्वे में यह घटकर 27 प्रतिशत रह गया.
महंगाई को लेकर चिंताएं अप्रैल (चुनाव पूर्व- 20%) के मुकाबले चुनाव बाद (30%) काफ़ी बढ़ गईं. (टेबल नीचे)
इसलिए ऐसे नतीजों का आना वोटरों के मूड और उनकी पसंद को प्रतिबिंबित करता है.
एनडीए को बहुमत देने का फ़ैसला मिलीजुली धारणाओं की अभिव्यक्ति है.
एनडीए के प्रदर्शन से संतुष्टि ने कई लोगों को इसे एक और मौका देने के लिए प्रेरित किया, जबकि असंतोष से पता चलता है कि वोटरों ने बीजेपी को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत न देकर संयम बरता है.
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