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हैमिल्टन, जिसने विनोद खन्ना और मधुबाला को पहचान दी
- Author, हिना कुमावत
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
क्या होता अगर भारतीय सिनेमा को ज़ीनत अमान न मिली होतीं? ज़ाहिर है कि हिन्दी सिनेमा की ज़ीनत अधूरी रहती.
दरअसल, ज़ीनत अमान ने कभी हिन्दी फ़िल्मों मे आने की कल्पना तक नहीं की थी. लेकिन शादी के लिए खिंचवाई गई एक तस्वीर ने उन्हें मॉडल बना दिया.
एक बार ज़ीनत अपनी मां के साथ मुंबई के हैमिल्टन स्टूडियो मे शादी के लिए तस्वीरें खिंचवाने आई थीं.
उस दौरान रंजीत माधव के कोडेक वुडन बॉक्स कैमरा (1926) में कैद होने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती थी.
जैसे ही इस कैमरे के पीछे की नज़र ने ज़ीनत अमान को देखा, उसने पहचान लिया कि ये कोई आम चेहरा नहीं.
रंजीत माधव उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "उनकी माँ हमारे यहाँ अक्सर आया करती थीं. वो जब अपनी बेटी ज़ीनत के साथ आईं, तो मुझे लगा कि इसमें मॉडल बनने के सारे गुण हैं.
उस दौरान हम बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए कैलेंडर शूट किया करते थे. उनकी मां को मनाना मुश्किल था, लेकिन उनके मान जाने के बाद हमने ज़ीनत को कैलेंडर के लिये शूट किया."
कई बड़ी एजेंसियों और कंपनियों के लिए फ़ोटोशूट करने वाले हैमिल्टन स्टूडियो ने जहाँ ज़ीनत को हिन्दी सिनेमा की ज़ीनत बनाया वहीं और भी कई अदाकाराएं थीं, जिन्होंने इस स्टूडियो में आकर मॉडलिंग की.
बबीता, साधना, हंटर वाली के नाम से मशहूर नादिया और मधुबाला - ये कुछ ऐसे नाम हैं जो उस दौरान बतौर मॉडल हैमिल्टन स्टूडियो आया करते थे.
रंजीत माधव बताते हैं, "हमारे पास एजेंसी उन्हें भेजती थी और जो हमें खूबसूरत लगती, हम उन्हें कैलेंडर के लिए शूट करते."
वो कहते हैं, "ये सभी लड़कियां बाद मे हीरोइन बनीं. कहा जाए तो हैमिल्टन ने इन सब को पहचान दी."
हिन्दी सिनेमा के मोस्ट हैंडसम हीरो कहे जाने वाले विनोद खन्ना ने भी हीरो बनने से पहले यहां तस्वीर खिंचवाई थी.
हाल ही में इंडस्ट्री को अलविदा कहने वाले विनोद खन्ना की इस तस्वीर में वो हाथ में सिगार लिए, चमकदार जूते और फिटिंग वाले पैंट में कॉन्फिडेंस के साथ मुस्कुरा रहे हैं.
उनकी इस तस्वीर को देखकर कोई नहीं कहेगा कि यहाँ वो अपना पोर्टफ़ोलियो शूट करवाने आए थे.
चेहरे पर चमक और विश्वास देखकर लगता है कि वो स्ट्रगलर नहीं सुपरस्टार हैं.
रंजीत माधव की तबियत ख़राब होने के कारण बीते तीन साल स्टूडियो उनकी बेटी अजीता संभाल रही हैं.
यहाँ लगी हर तस्वीर से जुड़ी कहानी उन्होंने अपने पिता से सुनी है.
नरगिस दत्त और राज कपूर की ये तस्वीर इस बात की गवाह है कि सेलिब्रिटी क्रिकेट मैच का चलन हिन्दी सिनेमा में बहुत पुराना है.
अजीता बताती हैं, "पापा को फ़ोटोग्राफ़ी का शौक था. इस मैच के दौरान उन्होंने राज कपूर और नरगिस को देखा और तुरंत क्लिक कर लिया. ये काफी नैचुरल तस्वीर है."
इंडिया युनाईटेड मिल बिल्डिंग के तौर पर मशहूर इस बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर हैमिल्टन नाम के इस फ़ोटो स्टूडियो को सर विक्टर ससुन ने 1928 में बनवाया था.
1958 में रंजीत इस स्टूडियो से जुड़े. 1976 मे कई मिलें बंद होने के साथ ही पब्लिक प्रिमाइसेस एक्ट के तहत इस स्टूडियो को भी खाली करने का नोटिस दिया गया.
इसकी लड़ाई आज भी कोर्ट में चल रही है.
अजीता बताती हैं, "हम आधिकारिक रूप से मुम्बई (उस समय बॉम्बे) फ़ोटोग्राफर हुआ करते थे. हमारे पास 7 से 8 लाख का फ़ोटो आर्काइव (पुरानी तस्वीरें) है. कई आधिकारिक दस्तावेज़, ख़ासकर के कोर्ट के डॉक्युमेंट हैं."
वो कहती हैं, "हैमिल्टन की वजह से कई लोगों ने अपनी पहचान बनाई, लेकिन आज उनके पास हमें हैलो कहने का भी समय नहीं है. ये बात तो बुरी लगती है."
रंजीत और अजीता अब इस स्टूडियो के दो फ्लोर में से एक को आर्ट गैलरी बनाना चाहते हैं. साथ ही ली गई कई अनोखी तस्वीरों की कॉफी टेबल किताब लॉन्च करना चाहते हैं.
आज डिजिटल फ़ोटोग्राफी के चलन ने, कभी 22 लोगों का स्टाफ रखने वाले इस स्टूडियो की चमक थोड़ी फ़ीकी कर दी है.
आज भी विदेशी लोग पॉट्रेट फ़ोटोग्राफ़ी के लिए इस मशहूर स्टूडियो की ओर खिंचे चले आते हैं.
हाल ही में कुछ फ़िल्मों की शूटिंग भी यहाँ हो चुकी है. जैसे फ़राह ख़ान की "शिरीन फ़रहाद" और अक्षय कुमार की "रुस्तम".
रंजीत और अजीता को बस एक ही बात सताती है कि कई लोगों को उनकी पहचान दिलाने वाला ये स्टूडियो आज ख़ुद की पहचान गुम होने की लड़ाई लड़ रहा है.
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