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जिन्होंने अपने अभिनय से दिलीप साब को चौंकाया था
- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
संजीव कुमार हिंदी सिनेमा के हीरो नहीं थे. वो किसी भी तरह से हीरो के आज के मापदंड पर खरे नहीं उतरते थे. उनके अंदर ना ही आज के हीरो जैसा स्टाइल था, ना ही हैंडसम, डैशिंग और सेक्सी हीरो की आज की श्रेणी में वो कहीं ठहरते थे.
उनके अंदर कुछ था तो सिर्फ़ विशुद्ध 24 कैरेट अभिनय.
वो हिंदी सिनेमा के बड़े अभिनेता थे.
उनके अभिनय का लोहा हर कोई मानता था, लेकिन वो अपने दौर के दूसरे स्टारों की तरह स्टार नहीं माने जाते थे. गंभीर अभिनेता होते हुए भी वो उन फ़िल्मों के हिस्सा नहीं थे जिसे कला सिनेमा कहते हैं.
संजीव कुमार का दौर व्यवसायिक सिनेमा और कला सिनेमा के बीच स्पष्ट बंटवारे का दौर था.
लेकिन इस दौर में एक दूसरी तरह की फ़िल्में भी बन रही थीं जिन्हें पूरी तरह से व्यवसायिक और कला फ़िल्म की श्रेणी में रखना मुश्किल था.
ये फ़िल्में किसी ख़ास सांचे में ढली फ़िल्में नहीं थीं. इसलिए इन फ़िल्मों का कोई तयशुदा दर्शक वर्ग नहीं होता था. ये संजीदा फ़िल्में कही जाती थीं और इन्हीं फ़िल्मों के अभिनेता थे संजीव कुमार.
कहानी और पटकथा की कसौटी पर कसी इन फ़िल्मों को एक सितारे से ज़्यादा दमदार अभिनय क्षमता वाले एक अभिनेता की ज़रूरत थी जो अलग-अलग तरह के चरित्रों में ढल सके.
इसे उस वक्त पूरा किया संजीव कुमार ने.
'सत्यकाम', 'मौसम', 'आंधी', 'दस्तक', 'कोशिश', 'नौकर', 'नमकीन', 'अंगूर', 'आशीर्वाद', 'चरित्रहीन', 'नया दिन नई रात', 'पति-पत्नी और वो', 'गृह प्रवेश', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'परिचय' जैसी फ़िल्मों में उनका अभिनय इस बात की तस्दीक करते हैं.
उस दौर में गुलज़ार 'आंधी', 'मौसम', 'नमकीन', 'अंगूर', 'कोशिश' और 'परिचय' के अपने चरित्रों को संजीव कुमार के सहारे ही फ़िल्मी पर्दे पर उतार पाए. एक वक़्त तो गुलज़ार की फ़िल्मों का अटूट हिस्सा हुआ करते थे संजीव कुमार.
ज्यादातर फ़िल्मी सितारों के विपरीत संजीव कुमार बचपन से ही अभिनेता ही बनना चाहते थे. इसलिए फ़िल्मों तक पहुंचने का उनका सफ़र कोई इत्तेफाक़ नहीं था.
संजीव कुमार ने अपने अभिनय जीवन की शुरुआत इप्टा के स्टेज से की थी. इसके बाद वे इंडियन नेशनल थिएटर से जुड़ गए थे.
रंगमंच के इस दौर में वो संजीव कुमार नहीं थे बल्कि उनका नाम था हरिहर जेठालाल ज़रीवाला.
इप्टा के दौर में मशहूर चरित्र अभिनेता एके हंगल ने संजीव कुमार को एक बूढ़े का किरदार निभाने को कहा था. लेकिन संजीव हीरो बनना चाहते थे.
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तब एके हंगल ने उनसे कहा था, ''तुम हीरो तो दिखते ही हो, लेकिन जो तुम दिखते नहीं हो वो किरदार निभा सको रंगमंच पर, तब माना जाए कि भाई तुम एक्टर हो.''
बाद में फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद तो लगता था कि संजीव कुमार इसी बात को साबित करने पर तुले हुए हैं. उन्होंने जितनी फ़िल्मों में बूढ़े इंसान का किरदार निभाया उतनी तो शायद किसी बूढ़े अभिनेता ने भी नहीं निभाई हो.
विडम्बना देखिए संजीव कुमार ने अपने हिस्से का बुढ़ापा सिनेमा के पर्दे पर ही जिया क्योंकि अधेड़ उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई. वो असल ज़िंदगी में कभी बूढ़े हुए ही नहीं.
उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत 1960 में आई फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' से होती है. लेकिन बतौर हीरो वो 1965 में बनी फ़िल्म 'निशान' से अपने करियर की शुरुआत करते हैं.
कहा जाता है कि 1968 में आई फ़िल्म 'संघर्ष' में अपने अभिनय से उन्होंने दिलीप कुमार जैसे अभिनेता की पेशानी पर भी बल ला दिया था.
संजीव कुमार का अभिनय जितना लीक से हटकर था उतनी ही उनकी ज़िंदगी भी लीक से हटकर थी.
ऐसा लगता है कि वो ख़ुद की ही ज़िंदगी को अपनी फ़िल्मों में दोहरा रहे थे.
कई अफ़ेयर्स, हेमा मालिनी को दिल देने की ख़बरें, फिर हेमा का कथित इंकार, आजीवन कुंवारा रहना, अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित का उनको दिल देना, फिर सुलक्षणा पंडित का आजीवन कुंवारा रहना और समय से पहले उनकी आशंका के ही मुताबिक़ उनकी मृत्यु.
महज 47 साल की उम्र में 9 जुलाई 1938 को जन्मे संजीव कुमार की 1985 में मृत्यु हो गई थी. संजीव कुमार की आख़िरी फ़िल्म 'प्रोफेसर की पड़ोसन' उनकी मृत्यु के आठ साल बाद 1993 में रिलीज़ हुई थी.
भारतीय सिनेमा को इसके बाद से अब तक इतने अनजानेपन से भरा 'राह पे रहने वाला, यादों में बसर करने वाला' कोई दूसरा संजीव कुमार नहीं मिला है.
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