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नज़रिया : संविधान के तहत राष्ट्रगान के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
- Author, सुभाष कश्यप
- पदनाम, संविधान विषेशज्ञ
- प्रकाशित
संविधान के मूल कर्तव्य से जुड़े भाग में संविधान, राष्ट्रीय झंडा और राष्ट्र गान का आदर करने की बात कही गई है.
लेकिन इसे क़ानून के ज़रिए किसी पर थोपा नहीं जा सकता. इसका मतलब यह है कि किसी को क़ानूनी तौर पर राष्ट्र गान का सम्मान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.
पहले भी सिनेमा हॉल में राष्ट्र गान बजाने और उस समय दर्शकों के खड़े होने की प्रथा थी.
उस समय राष्ट्र गान फ़िल्म ख़त्म होने पर बजाया जाता था. लेकिन बाद में इस प्रथा को बंद कर दिया गया. इसकी वजह यह थी कि राष्ट्र गान का उचित सम्मान नहीं होता था. उधर राष्ट्र गान शुरू होता थ, इधर दर्शक उठ कर जाने लगते थे.
इससे बचने के लिए अब यह कहा जा रहा है कि राष्ट्र गान फ़िल्म शुरू होने के पहले बजाया जाए. पर इसमें दिक्क़त यह है कि लोग उस समय हॉल में आ रहे होंगे.
अब यदि इतनी जागरूकता हो कि राष्ट्र गान बज रहा हो तो लोग जहां हों, वहीं खड़े हो जाएं, तो ठीक है. लेकिन राष्ट्र गान चलता रहे और हॉल का कर्मचारी टॉर्च जला कर लोगों को सीट दिखाता रहे, यह अशोभनीय होगा.
इस फ़ैसले पर फिर से विचार सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है. यह उसका निर्णय है और उस पर विचार भी वही कर सकता है.
यदि लोगों में जागरूकता आ जाए कि वे राष्ट्र गान का उचित सम्मान करें तो ठीक है, वर्ना सुप्रीम कोर्ट को इस पर फिर से विचार करना चाहिए.
केरल का एक मामला आया, जिसमें एक आदमी राष्ट्र गान गा नहीं रहा था. उस पर अदालत का फ़ैसला था कि यदि वह खड़ा है और राष्ट्र गान गा नहीं रहा है, तो कोई बात नही. मुख्य बात गान को आदर देना है.
महाराष्ट्र का जो मामला था कि राष्ट्र गान के दौरान एक विकलांग खड़ा नहीं हुआ था और उस पर उसकी पिटाई कर दी गई थी, यह ग़लत था.
किसी को भी राष्ट्र गान के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, यह साफ़ है.
यदि कोई जानबूझ कर राष्ट्र गान का अपमान करता है तो उसक ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जा सकता है. पर यह साबित करना होगा कि उसन जानबूझ कर राष्ट्र गान के प्रति नफ़रत दिखाई या उसका अपमान किया.
(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से हुई बातचीत पर आधारित)