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नज़रिया: 'अब आडवाणी-जोशी के लिए राष्ट्रपति पद के बारे में सोचना भी मुश्किल'
- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
- प्रकाशित
करम गति टारे नाहीं टरे.
हिंदू धर्म में कर्म फल का सिद्धांत अटल माना जाता है. इससे कोई बचाव नहीं है.
भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी और कुछ अन्य को एक बार फिर लखनऊ की विशेष अदालत में मुलज़िम की तरह कठघरे में खड़े होना पड़ेगा, जबकि देश में राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी चल रही होगी.
पच्चीस साल पुराने इस मामले को लोग लगभग भूल गए थे, क्योंकि यह अदालती प्रक्रिया की भूलभुलैया में खो सा गया था.
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने तमाम तकनीकी अड़चनें दूर करते हुए आदेश सुनाया है कि विवादित बाबरी मस्जिद गिराने से सम्बंधित दोनों मामले एक साथ चलाए जाएं.
रायबरेली कोर्ट
इसका परिणाम यह होगा कि अब लालकृष्ण आडवाणी और जोशी समेत अन्य लोगों पर रायबरेली में केवल भड़काऊ भाषण देने का नहीं, बल्कि एक धार्मिक पूजा स्थल को गिराने के षडयंत्र समेत अन्य सभी धाराओं में मुकदमा चलेगा.
छह दिसम्बर 1992 को विवादित बाबरी मस्जिद गिरने के बाद दो आपराधिक मुक़दमे क़ायम किए गए थे.
एक लाखों अज्ञात कारसेवकों के ख़िलाफ़ और दूसरा नामज़द मामला आडवाणी समेत आठ बड़े नेताओं के ख़िलाफ़. इन दो के अलावा 47 और मुक़दमे पत्रकारों के साथ मारपीट और लूट आदि के भी लिखाए गए थे.
पुलिस ने दूसरे मामले में नामज़द अभियुक्तों की तत्काल गिरफ़्तारी करके जेल भेज दिया. इस मामले में चार्जशीट दाख़िल हो गई और अयोध्या में बवाल की आशंका से रायबरेली की विशेष अदालत में मुक़दमा शुरू हो गया.
हाई कोर्ट में चुनौती
बाद में सारे मुक़दमों की जाँच सीबीआई को दी गई. सीबीआई ने दोनों मामलों की संयुक्त चार्जशीट फाइल की.
इसके लिए हाईकोर्ट की सलाह पर लखनऊ में अयोध्या मामलों के लिए एक नई विशेष अदालत गठित हुई. लेकिन उसकी अधिसूचना में दूसरे वाले मुक़दमे का ज़िक्र नहीं था.
विशेष अदालत ने आरोप निर्धारण के लिए अपने आदेश में कहा कि चूँकि सभी मामले एक ही कृत्य से जुड़े हैं, इसलिए सभी मामलों में संयुक्त मुक़दमा चलाने का पर्याप्त आधार बनता है.
लेकिन आडवाणी समेत अनेक अभियुक्तों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी.
12 फ़रवरी 2001 को हाई कोर्ट ने सभी मामलों की संयुक्त चार्जशीट को तो सही माना लेकिन साथ में यह भी कहा कि लखनऊ विशेष अदालत को आठ नामज़द अभियुक्तों वाला दूसरा केस सुनने का अधिकार नही है, क्योंकि उसके गठन की अधिसूचना में वह केस नम्बर शामिल नहीं था.
स्पेशल कोर्ट
जस्टिस भल्ला ने आदेश में कहा कि राज्य सरकार चाहे तो अधिसूचना की तकनीकी त्रुटि दूर कर सकती है.
अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह तकनीकी त्रुटि को दरकिनार कर दोनों मामलों की संयुक्त सुनवाई का आदेश दिया है, उसके बाद कहा जा सकता है कि न्याय हित में हाईकोर्ट स्वयं यह काम कर सकता था.
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद स्पेशल कोर्ट ने दोनो मामले अलग करके न केवल रायबरेली मामले के आठ बल्कि 21 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप रद्द कर दिए.
उस समय आडवाणी दिल्ली में गृहमंत्री थे और लखनऊ में राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री. इसके बाद बीजेपी के समर्थन से मायावती और फिर कुछ समय बाद मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने.
मगर सब ने विशेष अदालत के गठन में हुई तकनीकी त्रुटि दूर करने से इनकार कर दिया. इसलिए रायबरेली और लखनऊ में अलग अलग मुक़दमे चले.
भड़काऊ भाषण
इस वजह से आडवाणी आदि पर केवल भड़काऊ भाषण देने का मुक़दमा चला, जबकि बाबरी मस्जिद विध्वंस के आपराधिक षडयंत्र के आरोप से वह बच गए.
इतना ही नहीं विडम्बना यह भी है कल्याण सिंह समेत 13 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कहीं केस नहीं चला.
सीबीआई और कुछ अन्य लोगों ने इस मामले में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन दोनों ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया.
सीबीआई का तर्क था की अगर भड़काऊ भाषण देने का मामला अलग हो तो भी लाखों कारसेवकों के ख़िलाफ़ बाबरी मस्जिद तोड़ने का जो मुख्य मुक़दमा है उसमें भी आडवाणी, कल्याण सिंह और जोशी आदि बाल ठाकरे के साथ षड्यंत्र में शामिल थे.
इसलिए उन पर रायबरेली के अलावा लखनऊ में भी मुकदमा चलना चाहिए.
मुख्य बिंदु यह है कि मुक़दमे का ट्रायल होने के बाद अभियुक्त बरी हो जाएं तो वह अलग बात है, लेकिन तकनीकी कारणों से मुक़दमा चले ही न यह अलग बात.
अंतिम अपील
हर अभियुक्त कोशिश करता है कि मुक़दमा टलता रहे, लेकिन इस मामले में देरी के लिए अदालतें ही ज़िम्मेदार रही हैं. बेहतर होगा सुप्रीम कोर्ट इस देरी की ज़िम्मेदारी भी तय करे.
सीबीआई की अपील छह सालों से सुप्रीम कोर्ट में लम्बित थी.
इतने सालों से ख़ामोश सीबीआई अचानक दो हफ़्ते पहले सक्रिय हुई और उसने अदालत से कहा कि इन बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ षड्यंत्र का मुक़दमा चलना चाहिए.
हो सकता है कि इन पच्चीस सालों में यह मुक़दमा सामान्य गति से चलता तो अब तक निबटारा हो जाता.
यह भी सम्भव है कि ट्रायल के बाद बहुत से अभियुक्त निचली अदालत या अपील में हाईकोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट से बरी हो जाते.
लेकिन इस दरम्यान अनेक अभियुक्त और गवाह इस दुनिया में ही नही रहे.
आगे भी ट्रायल और अंतिम अपील का निस्तारण होने तक कितने जीवित रहेंगे कहना मुश्किल है.
राष्ट्रपति पद
लेकिन यह तय है कि समय के जिस मोड़ पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया है अब आडवाणी और जोशी दोनो के लिए राष्ट्रपति पद के बारे में सोचना भी मुश्किल हो जाएगा.
हांलांकि ये भी तथ्य है कि इन दोनों नेताओं ने खुलकर कभी किसी सार्वजनीकि मंच से इस तरह की इच्छा व्यक्त नहीं की है और न ही पार्टी ने फ़िलहाल इस तरह की कोई पेशकश इनके सामने रखी है.
सीबीआई जिस तरह से केंद्र सरकार के अधीन काम करती है, उसे देखते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता के अंदर भी कलह बढ़ सकती है.
उमा भारती ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि उस दिन अयोध्या में कोई षड्यंत्र नहीं हुआ, सब कुछ खुल्लमखुल्ला था.
काश उमा भारती और उनके सह अभियुक्तों में कोर्ट के अंदर भी यही बात कहने का नैतिक साहस होता.
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