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नज़रिया: नीतीश की मुस्कान से लालू उतने परेशान नहीं, जितने लालू की मुस्कान से नीतीश
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सियासत एक बार फिर अबूझ पहेली बन कर चर्चा में उभर आई है.
राष्ट्रपति चुनाव के मौजूदा संदर्भ में देश का सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों असमंजस में है कि वह नीतीश कुमार को दरअसल अपना समर्थक माने या विरोधी.
नोटबंदी के समय भी यही हुआ था. उसके बाद कई ऐसे मौक़े आए, जब भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ रुझान वाले इनके बयान ख़ूब चर्चित हुए.
लेकिन मीडिया में बात ज़्यादा उछलने से पहले ही इन्होंने बीजेपी को झटका देने वाली बातें कह के अपना विपक्षी तेवर क़ायम रखा.
कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिल कर बिहार में सरकार चला रहे नीतीश कुमार इन दोनों दलों के कुछ अहम फ़ैसलों को धता बताने से भी नहीं चूक रहे.
विपक्षी प्रत्याशी
लोग पूछने लगे हैं कि इनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) इस समय राष्ट्रीय राजनीति में इधर है, उधर है, या किधर है? इनकी सियासत के अंतर्विरोध अक्सर चौंकाते रहते हैं.
राष्ट्रपति पद के बीजेपी के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के प्रति अतिशय प्रेम दिखा कर इन्होंने कांग्रेस, वामदल, आरजेडी और अन्य विपक्षियों को भरे बाज़ार चिढ़ाया है.
पहले तो इन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मिल कर आग्रह किया कि वह राष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त विपक्षी प्रत्याशी पर सहमति के लिए पहल करें.
लेकिन ऐसा मौक़ा आने देने से पहले ही नीतीश कुमार ने जेडीयू को बीजेपी के ख़ेमे में डाल दिया.
नीतीश की परेशानी
राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें ग़ैर बीजेपी मोर्चे की क़यादत का सबसे उपयुक्त और सक्षम पात्र बता रहे लोग अब क्या कहेंगे ?
आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव जब विपक्षी मोर्चेबंदी के सिलसिले में सोनिया गाँधी से मिले तो यह मुलाक़ात नीतीश ख़ेमे को पच नहीं पायी.
कहते हैं, नीतीश की मुस्कान से लालू उतने परेशान नहीं होते, जितने लालू की मुस्कान से नीतीश परेशान होते रहे हैं.
बेनामी सम्पत्ति वाले मामलों के जिस जाल में लालू परिवार फंसा दिख रहा है, उसे महाजाल बना देने में जदयू-बीजेपी के अपने-अपने फ़ायदे हैं.
अब माना जा रहा है कि राज्य सरकार पर लालू प्रसाद का दबदबा कम करने और कुछ आरजेडी नेताओं के आक्रामक रवैये पर क़ाबू पाने में नीतीश कामयाब हुए हैं.
रामनाथ कोविंद
यही कारण है कि लालू यादव के सियासी रुख़ और रवैये से बिलकुल अलग या विपरीत राय रखते हुए नीतीश निर्णय ले लेते हैं.
उधर लालू अंदर-ही-अंदर घुट कर या ग़म खा कर रह जाते हैं. वह नीतीश कुमार से तकरार के बजाय विवाद पर परदा डालने की कोशिश में लगे रहते हैं.
राष्ट्रपति चुनाव प्रकरण में नीतीश से बड़ा झटका खाकर भी लालू उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोल पाए.
वैसे, बिहार के राज्यपाल पद पर रहे रामनाथ कोविंद के प्रति नीतीश कुमार का रुख़ या रिश्ता शुरू से ही मधुर रहा है.
लेकिन जब बात राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी नीत केंद्र सरकार के सामने एक मज़बूत विपक्ष की आती है, तब नीतीश कुमार की भूमिका सवालों के घेरे में आ ही जाती है.
सत्ताकामी सियासत
यह किसी सरकार को मुद्दा आधारित समर्थन वाला मामला तो है नहीं.
नीतीश अगर इस बाबत बुलाई गई प्रतिपक्षी बैठक में शरीक हो कर अपनी राय रखते तो उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर जो सवाल उठा है, वह नहीं उठता.
लोग यह नहीं कहते कि नीतीश कुमार दो नावों पर पैर रख कर पार उतरना चाहते हैं. हालांकि नीतीश ख़ेमा इस प्रसंग में भी अपने दोनों हाथों में लड्डू देख रहा है.
यानी सत्ताकामी सियासत में 'जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी कीजे.'
जो भी हो, यह सवाल तो उठेगा ही कि आप के कुछ फ़ैसलों से अब बीजेपी की बांछें क्यों खिल जाती हैं और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को क्यों पक्षाघात-सा हो जाता है ?
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