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मीडिया ने क्यों आरटीआई को ज़रूरी नहीं समझा?
- Author, प्रशांत चाहल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
12 अक्टूबर 2005 के दिन शाहिद रज़ा बर्नी नाम के एक शख़्स ने जब भारत में पहली दफ़ा सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून के तहत सरकार से सूचना मांगी, तो कहा गया कि भारत नागरिक अधिकारों के हिसाब से एक नए युग में प्रवेश कर गया है.
अब से 12 साल पहले जब सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून लागू हुआ था तो इसे भ्रष्टाचार से लड़ने के एक सशक्त हथियार के रूप में देखा गया.
सीएचआरआई के एक अध्ययन में पाया गया है कि शुरुआती 10 साल में पौने दो करोड़ से ज़्यादा लोग भारत में आरटीआई दाखिल कर चुके हैं.
आबादी के अनुपात के मद्देनज़र अमरीका की तुलना में भारत में इस क़ानून का इस्तेमाल ज़्यादा किया जाता है.
क्या वाकई आसान है आरटीआई का इस्तेमाल?
ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि सरकारी पेचीदगियों के कारण यह क़ानून उतना जनसुलभ नहीं है, जितना इसे होना चाहिए था.
इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार और 'आरटीआई कानून और इसके इस्तेमाल' पर किताब लिख चुके श्यामलाल यादव से बीबीसी ने बात की.
श्यामलाल यादव मानते हैं कि सरकारी मुलाज़िम, वकील और पेशेवर रिसर्चर इस कानून का इस्तेमाल आम आदमी की तुलना में ज़्यादा सफलता से कर पाते हैं और इसका एक बड़ा कारण है आरटीआई दाखिल करने की पेचीदगियां.
किन बातों का ख़्याल रखना चाहिए?
- श्यामलाल यादव बताते हैं कि आरटीआई में सरकार से सवाल-जवाब मत करिए. जैसे- फलां इलाके में बिजली कब तक पहुंचेगी?
- उनसे सूचना/जानकारी मांगिए और इसके लिए सरल भाषा का इस्तेमाल करिए. जैसे- फलां इलाके में बिजली के कितने ट्रांसफार्मर लगे हैं?
- समय आधारित सूचना मांगते वक़्त अतिरिक्त सावधान रहें. किस काल खंड से संबंधित सूचना मांगी गई है, यह बताना आरटीआई में ज़रूरी होता है. जैसे- फलां इलाके में साल 2010 से 2017 के बीच बिजली के कितने ट्रांसफार्मर लगे?
- 10 रुपये की स्टांप फ़ीस के साथ आरटीआई दाखिल करें. अपना नाम, पता और संबंधित सही सूचना ही पत्र में दें.
- दाखिल करते वक़्त आरटीआई की कॉपी ज़रूर कर लें. 30 दिन में सूचना नहीं मिलने पर वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष अपील करने में इसकी ज़रूरत पड़ सकती है.
- कई बार प्रशासनिक लोग सवालों की भाषा को लेकर आपत्ति जताते हैं, कुछ अधिनियमों का हवाला देकर सूचना नहीं देने की कोशिश भी करते हैं.
- सरकार इस बात को जानती है कि आरटीआई का जवाब नहीं मिलने पर उसकी अपील करने वालों की संख्या काफी कम है. इसलिए जवाब नहीं मिलने पर अपील करना ज़रूरी है. यह आपके अधिकार में शामिल है.
- निरक्षर लोग जनसूचना अधिकारी से अपनी आरटीआई लिखने में मदद मांग सकते हैं.
सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून यकीनन कई बदलाव लेकर आया है लेकिन इस क़ानून को लेकर शुरू में जो उत्साह था, उसमें धीरे-धीरे कमी होती भी दिखाई देती है.
मीडिया ने क्यों आरटीआई को ज़रूरी नहीं समझा?
श्यामलाल यादव ने अपनी किताब में भारतीय मीडिया में आरटीआई को लेकर बने उदासीन रुख की भी चर्चा की है.
उन्होंने लिखा है कि पत्रकारों के लिए आरटीआई आया ही एक ऐसे हथियार के रूप में था, जिसे ज़्यादातर पत्रकारों ने इस्तेमाल करना ज़रूरी नहीं समझा.
इस बारे में यादव कहते हैं पत्रकार आरटीआई का इस्तेमाल जनहित में कर सकते हैं.
सरकारी तंत्र के बीच दिन भर गुज़ारने के बाद भी कई बार पत्रकारों को सही सूचना नहीं मिल पाती. लेकिन संयम की कमी के चलते पत्रकार केंद्रीय सूचना आयोग के फ़ैसलों और आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा दी गई सूचना को ही अपनी रिपोर्टों में शामिल करते हैं.
'एक कहानी के लिए 500 आरटीआई'
श्यामलाल यादव के अनुसार, एक संवेदनशील ख़बर के लिए गृह मंत्रालय से लेकर सभी ज़िलों के कलेक्ट्रेट तक वो 500 से ज़्यादा आरटीआई भी दाखिल कर चुके हैं. लेकिन ऐसी ख़बरें छपने के बाद लोगों का विश्वास जीत पाती हैं.
विदेशों में पत्रकारों द्वारा आरटीआई के इस्तेमाल पर यादव कहते हैं, "दुनिया के करीब 110 देशों में आरटीआई लागू है. इन देशों में आरटीआई के इस्तेमाल से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार संगठित ढंग से काम करते हैं. यूरोप में इन्हें 'वॉब पत्रकारों' कहा जाता है. 'वॉबिंग' एक डच शब्द है, जो पत्रकारों के लिए इस्तेमाल होता है."
आरटीआई को लेकर बढ़ेगा उत्साह?
भारत के आरटीआई क़ानून को कई बड़े देशों की तुलना में ज़्यादा सशक्त और ओपन माना जाता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर, 2015 में आरटीआई कॉन्फ्रेंस में इस कानून को और मज़बूत बनाने पर ज़ोर दिया था.
उन्होंने कहा था कि आरटीआई कानून में सूचना मांगने के साथ-साथ सवाल पूछने की भी आज़ादी होनी चाहिए.
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