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नज़रिया: ''शरद यादव के लिए कांग्रेस की खूबियां गिनाना मुश्किल होगा''
- Author, राशिद किदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
- प्रकाशित
महागठबंधन से नाता तोड़ने के बाद अब जेडीयू ने आधिकारिक तौर पर एनडीए के साथ जुड़ने का फ़ैसला कर लिया है. मगर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शरद यादव अब भी अलग रास्ते पर चल रहे हैं. जेडीयू, नीतीश कुमार और शरद यादव का भविष्य किस तरफ़ बढ़ता दिख रहा है?
नीतीश कुमार नाराज़ चल रहे शरद यादव को अपनी तरफ़ करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं. शायद उन्होंने शरद यादव को एमपी और एमएलए की संख्या के आधार पर किनारे करने का मन बना लिया है. वह यह संदेश देना चाहते हैं कि यह एक व्यक्ति की बग़ावत है, न कि पार्टी के धड़े की या फिर बहुत सारे लोगों की.
हो सकता है कि सामाजिक और ज़मीनी स्तर पर शरद यादव को समर्थन हासिल हो. मगर जब कोई पार्टी दो फाड़ हो जाती है तो इलेक्शन कमीशन देखता है कि चुने हुए प्रतिनिधि किसकी तरफ़ हैं और कितनी संख्या में हैं. नीतीश कुमार इस मामले में आगे हैं. वह शरद को जनता के बीच कोई मुकाम बना पाने का कोई मौका नहीं दे रहे.
बिहार में लालू यादव बड़े नेता हैं और इस वक़्त शरद यादव के साथ हैं. इसलिए नीतीश कुमार ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते कि शरद यादव आगे बढ़ें और सामाजिक न्याय की बात करें. ऐसे में चुनाव में ही शरद यादव अपना दमख़म दिखा पाएंगे. मगर जब तक कोई चुनाव नहीं होते, बाज़ी नीतीश के हाथ में ही रहेगी.
नीतीश कुमार ने लिया है बड़ा जोखिम
बिहार की राजनीति में देखें तो जिस वक़्त महागठबंधन बना था, लोगों में आशाएं थीं. ऐसा लगता कि अगर ऐसा मूवमेंट दूसरे राज्यों में भी बढ़ता है तो वहां पर बीजेपी का राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प बन सकता है. मगर जिस तरह से उत्तर प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मिलकर बुरी तरह हारे, शायद उसी वक्त नीतीश कुमार ने मन बना लिया था.
उन्हें लगा कि जिस तरह से मिडिल क्लास में नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं, माहौल बना हुआ है, वैसे में वह प्रधानमंत्री तो बन नहीं सकते हैं, इसलिए मुख्यमंत्री होने की अपनी स्थिति मजबूत कर ली जाए.
इसे उनका राजनीतिक अवसरवाद कहा जा सकता है लेकिन एक बात और भी है. आरजेडी को ज़्यादा सीटें मिली थीं और सरकार में लालू का दख़ल ज़्यादा था. पर्सनैलिटी का भी क्लैश था. नीतीश को शायद कहीं न कहीं लग रहा था कि वह मुख्यमंत्री होकर भी मुख्यमंत्री नहीं हैं. इसीलिए उन्होंने रिस्क लेते हुए 2019 या 2024 में उनके प्रधानमंत्री बनने की जो उम्मीद हो सकती थी, उसे छोड़ दिया.
शरद के लिए मुश्किल होगा जनता को समझा पाना
शरद यादव की बात करें तो उन्होंने राजीव गांधी के ख़िलाफ़ 1981 में चुनाव लड़ा था. उस वक़्त, जब संजय गांधी की मृत्यु के बाद उपचुनाव हुआ था. वह अपने कांग्रेस और नेहरू परिवार विरोधी रुख़ के लिए भी जाने जाते हैं. ऐसे में उनके लिए भी जनता को यह समझाना आसान नहीं होगा कि कांग्रेस या नेहरू परिवार में अचानक क्या ख़ूबियां आ गईं कि वह उनका समर्थन कर रहे हैं.
नीतीश कुमार ने सोच-समझकर रिस्क लिया है. उन्होंने बिहार में आकलन किया कि अल्पसंख्यकों और लालू यादव का नाता और मज़बूत होता चला जाएगा. नीतीश को लगा कि वह विकास की जिस बात या विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, उससे पिछड़ते हुए हाशिए पर आ जाएंगे.
उन्होंने यह भी देखा कि अल्पसंख्यकों का वोट उत्तर प्रदेश में बीजेपी का कुछ नहीं बिगाड़ सका. तो उन्होंने पूरा हिसाब लगाते हुए यह जोखिम उठाया है. शायद उन्होंने आकलन किया है कि शरद यादव या लालू यादव को मिलाकर जितने भी लोग खिलाफ़ आ जाएं, बीजेपी की वजह से उन्हें बढ़त रहेगी.
(बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से बातचीत पर आधारित)
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