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गोपनीयता का अधिकार महत्वपूर्ण क्यों है?
संविधान में कहीं नहीं लिखा था कि गोपनीयता का अधिकार है लेकिन भारत के संविधान में आर्टिकल 21 में लिखा है कि हर व्यक्ति को जीने का और आज़ादी अधिकार है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति तब तक आज़ादी तो पूर्ण तरीके से नहीं जी सकता जब तक निजता का अधिकार नहीं है.
उदाहरण के तौर पर, जब पहली बार फ़ैसला आया था तो बात ये कही गई थी कि क्या पुलिस बिना वारंट के रात में किसी के घर में घुस सकती है, क्या कोई भी सरकारी अधिकारी किसी भी समय किसी के कागज़ात को या संपत्ति को हाथ लगा सकता है? ये दोनों ही मुद्दे निजता के अधिकार अंतर्गत आते हैं.
अगर सरकार के पास निजता को हासिल करने का अधिकार होगा तो कागज़ात सरकार के पास जा सकते हैं?
सरकार ने पहले सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि निजता का अधिकार तो है लेकिन वो संपूर्ण अधिकार नहीं है.
भारत के संविधान में कोई भी अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं होता है, हर अधिकार के साथ कुछ शर्तें होती हैं.
उदाहरण के तौर पर बोलने की आज़ादी है लेकिन अगर कोई ऐसा भाषण दे जिससे लोग हिंसा पर उतारू हो जाते हैं तो सार्वजनिक हित में उस बात को रोका जा सकता है. जैसे जीने का अधिकार, फांसी की सज़ा दी जाती है तो जीने का अधिकार संपूर्ण नहीं रह जाता.
ऐसे में सरकार जो संपूर्ण अधिकार की बात कर रही थी वो ग़लत है.
मौलिक अधिकार क्यों अहम?
पहला : अगर निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है तो सरकार बड़ी आसानी से इसमें हस्तक्षेप कर सकती है.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आपकी गोपनीयता के अधिकार में हस्तक्षेप करने से पहले सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि ये हस्तक्षेप किसी कानून के तहत ही कर सकती है.
उदाहरण के तौर पर सरकार को अगर आपसे कोई जानकारी चाहिए उससे पहले सरकार को बताना होगा किसी कानून के तहत जानकारी ली जा रही है.
दूसरा : जो जानकारी ली जा रही है उसका वैधानिक उद्देश्य क्या है, ये भी सरकार को बताना होगा.
तीसरा : जो जानकारी ली जा रही है क्या वो वैधानिक उद्देश्य के अनुपात में है? यानी जो जानकारी ली जा रही है अगर उसके एक हिस्से का काम का है बाकी की जानकारी का सरकार क्या करेगी.
चौथा : सरकार को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच के सामने दिखाना होगा कि आधार योजना को लेकर क्या सुरक्षा योजना लाई गई जिससे लोगों की सूचना का ग़लत इस्तेमाल नहीं होगा. आने वाले दिनों में आधार योजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बेंच सुनवाई करने जा रही है.
क्यों सरकार की मंशा पर संशय?
केंद्र सरकार कह चुकी है कि डेटा की सुरक्षा को लेकर कानून बनना चाहिए और सरकार इसे लेकर पीछे नहीं हटी है.
ये तो वही बात है कि सरकार जानकारी ले ले और बाद में बताए कि जानकारी का क्या किया जाएगा और इसकी सुरक्षा कैसे होगी. लेकिन अब सरकार बाध्य है कि लोगों को जानकारी लेने के बाद नहीं, पहले बताए.
क्यों बदला है सरकार का रुख ?
1954 का एमपी शर्मा मामले में आठ जजों की खंडपीठ और 1962 का खड़ग सिंह मामले में छह जजों की खंडपीठ ने गोपनीयता के अधिकार पर अपना फ़ैसला दिया.
उस समय इस बात पर चर्चा नहीं हुई कि ये मौलिक अधिकार है. उसके बाद कई दो या तीन जजों की पीठ ने कई मामलों में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया.
आधार योजना को लेकर जब सवाल उठने लगे तो याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये गोपनीयता के अधिकार का हनन है.
केंद्र सरकार ने इससे बचने के लिए कहा कि गोपनीयता मौलिक अधिकार नहीं है, वहीं से ये गोपनीयता के अधिकार पर बहस चल पड़ी. तब सरकार ने कहा कि यह सामान्य अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं.
(सुप्रीम कोर्ट की वकील अवनी बंसल से बीबीसी हिंदी रेडियो के संपादक राजेश जोशी की बातचीत पर आधारित.)
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