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ब्लॉग: 'उसका बलात्कार 'निर्भया' के बाद हुआ, बार-बार हुआ'
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
एक बार फिर दिसंबर आने को है. पांच साल होने को हैं.
जब चलती बस पर 'निर्भया' के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था और फिर यौन हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून कड़े किए गए थे.
निर्भया के पांच साल होने को है तो फ़रहा का एक.
एक साल होने को है. जब एक दोपहर कॉलेज से साइकिल पर लौटते हुए फ़रहा के मुताबिक़ उसका सामूहिक बलात्कार हुआ था.
आरोप है कि वो लड़के उसी छोटे शहर के उसके पड़ोस में रहते हैं. वो एसिड लेकर आए थे ताकि जब उसे खींच कर खेत में ले जाएं तो वो डर के मारे शोर ना मचाए.
फ़रहा बताती है कि पहले लड़कों ने एक-एक कर अपनी बारी ली और फिर गन्ने का इस्तेमाल किया.
जब दर्द हद से गुज़र गया तो उसके मुंह से चीख़ निकल ही गई. तब उन्होंने वो एसिड उसके मुंह पर फेंक दिया.
वो बच तो गई पर 'निर्भया' नहीं कहलाना चाहती. वो भय से भरपूर है.
क़ानून जो ज़मीन पर नहीं उतरा
उसे न्याय चाहिए पर अब तक का सफ़र ऐसा रहा है मानो बार-बार उसका बलात्कार हो रहा हो.
निर्भया के सामूहिक बलात्कार के बाद छिड़ी बहस और संसद के यौन हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों को कड़ा करने की कवायद के बाद लगा था कि अब तो बदलाव होकर रहेगा.
अब यौन हिंसा की शिकायत आने पर पुलिस अधिकारियों को एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य है और ऐसा ना करने पर दो साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है.
पर पुलिस ने ना तो फ़रहा की शिकायत दर्ज की, ना ही उन्हें इसके लिए जेल हुई.
वो तो उनके पास गई थी. अधजला चेहरा और उन गंदे कपड़ों के साथ जो उस व़क्त पहने थी. हर बात बारीक़ी से बार-बार बताई थी.
वो लड़के कथित ऊंची जाति के थे और आरोप है कि उनके परिवारों और पुलिस ने फ़रहा पर ही उंगलियां उठाईं और बात को रफ़ा-दफ़ा करने का दबाव बनाया.
उसने कहा उसे बेवजह शर्मिंदा किया जा रहा था और उसके लिए ये फिर से उस हिंसा से गुज़रने जैसा था.
फ़रहा का अनुभव इकलौता नहीं है. ग़ैर सरकारी संस्था, 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने यौन हिंसा का शिकार हुईं 21 औरतों के अनुभव पर एक रिपोर्ट जारी कर उन सब अड़चनों की जानकारी दी है जो उनके न्याय के रास्ते में आती हैं.
मेडिकल टेस्ट एक और पीड़ा
रिपोर्ट कहती है, 'औरतों को अक़्सर पुलिस थानों में शर्मिंदा किया जाता है और अगर वो आर्थिक या सामाजिक तौर पर कमज़ोर तबके से हों तो पुलिस एफ़आईआर दर्ज करने में आनाकानी भी करती है'.
फ़रहा ने हार नहीं मानी और स्थानीय अदालत गई जिसने पुलिस को एफ़आईआर दर्ज करने की हिदायत दी.
पर उसपर अमल करने में भी पुलिस को पांच महीने लग गए.
एसिड से हमले का मतलब था कि फ़रहा पुलिस के पास जाने से पहले ही अस्पताल गई और एक डॉक्टर ने हिंसा के सबूत रिकॉर्ड करने के लिए उसकी जांच की.
उसके मुताबिक लड़कों और गन्ने के बाद वो डॉक्टर की उंगलियां थीं जो उसके शरीर के निजी हिस्से में गईं.
तब वो नहीं समझ पाई थी कि इसी 'टू-फिंगर टेस्ट' के बिनाह पर डॉक्टर ने कहा था कि, 'उसकी वजाइनल ओपनिंग इतनी खुली है, वो ज़रूर सेक्स की आदी होगी'.
वो बोली कि एसिड ने चेहरा झुलसा था पर डॉक्टर की उस बात ने आत्मा जला दी. वो बस रोती रही.
'टू-फिंगर' टेस्ट को 'बेहद अपमानजनक' बताया गया है क्योंकि इसमें औरत के वजाइना में दो उंगलियां डालकर जांच की जाती है.
साल 2014 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने दिशा-निर्देश जारी कर इस टेस्ट को ख़त्म कर दिया था.
साथ ही यौन हिंसा से पीड़ित औरतों की मेडिकल जांच कैसे होनी चाहिए, उनकी रज़ामंदी कैसे ली जानी चाहिए और इसके लिए उनके परिवार के सदस्य की मौजूदगी वगैरह के बारे में सही तरीके तय किए थे.
बलात्कार के बाद भी हिंसा का जारी रहना
पर 'स्वास्थ्य' राज्य सरकारों के अधीन है इसलिए वो 2014 के दिशा-निर्देश मानने के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य नहीं हैं.
'ह्यूमन राइट्स वॉच' के मुताबिक अबतक सिर्फ़ नौ राज्यों ने इन दिशा-निर्देशों को स्वीकार किया है.
उनकी रिपोर्ट कहती है, 'जिन राज्यों ने दिशा-निर्देशों को स्वीकार किया है वहां भी डॉक्टर इनका पालन नहीं करते और कई राज्य सरकारों ने अपने दिशा-निर्देश बना रखे हैं जिनमें से कुछ टू-फ़िंगर टेस्ट जैसे पुराने जांच क़ायदों का पालन कर रहे हैं'.
पहले अस्पताल और फिर पुलिस थाना, पर बात यहां भी ख़त्म नहीं हुई.
जबतक अदालत पुलिस को कोई निर्देश देती, क़ानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती, फ़रहा के परिवार ने उसके कॉलेज जाने पर रोक लगा दी.
वो डरे हुए थे. फ़रहा घुटन महसूस करने लगी, खाना-पीना छोड़ दिया और लगने लगा कि वो पागल हो जाएगी.
फंड बना पर खर्च नहीं हुआ
2014 के दिशा-निर्देश ये भी बताते हैं कि औरत को मानसिक तौर पर कैसी मदद दी जानी चाहिए, उन्हें उनके मन की बात खुलकर कहने के लिए कहा जाना चाहिए और इस पूरी प्रक्रिया में परिवार और दोस्तों को भी जोड़ना चाहिए.
पर फ़रहा के मुताबिक उसकी ज़िंदगी इससे बिल्कुल उलट थी.
पुलिस को रिपोर्ट होनेवाली बलात्कार की शिकायतों का आंकड़ा साल 2012 में 24,923 से 39 प्रतिशत बढ़कर साल 2015 में 34,651 हो गया. ये तादाद अब भी बढ़ ही रही है.
2013 में केंद्र सरकार ने औरतों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा की रोकथाम, उनकी सुरक्षा और पुनर्वास के लिए 'निर्भया फ़ंड' बनाया. अगले चार साल में इसमें 3,000 करोड़ रुपए भी डाले.
'ह्यूमन राइट्स वॉच' के मुताबिक इस फ़ंड की ज़्यादातर राशि इस्तेमाल ही नहीं हुई है.
इस फंड के तहत 'वान स्टॉप सेंटर' योजना लाई गई.
दर्द का अंत नहीं
ये ऐसे सेंटर हैं जिनमें एक ही छत के नीचे पुलिस की मदद, क़ानूनी मदद, स्वास्थ्य और काउंसिलिंग की सुविधाएं औरतों को उपलब्ध होंगी.
महिला और बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक देश में अबतक ऐसे 151 सेंटर बनाए गए हैं.
पर फ़िलहाल इनमें से एक भी वहां नहीं है जहां फ़रहा रहती है.
उसकी शिकायत पर एफ़आईआर दर्ज होने के बाद भी उसका आरोप है कि उसे किसी तरह की क़ानूनी मदद नहीं दी गई.
केंद्र सरकार ने औरतों और बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों की सुनवाई के लिए 524 'फ़ास्ट ट्रैक' अदालतें बनाई हैं पर ये कितनी कारगर हैं इसपर अभी कोई सर्वे नहीं किया गया.
फरहा का केस 'फ़ास्ट ट्रैक' क्या, अभी आम अदालत तक भी नहीं पहुंचा. अभी तारीख़ मिलने का इंतज़ार है.
उसने हार नहीं मानी है पर 'निर्भया' भी नहीं महसूस कर रही. अस्पताल और पुलिस के बाद उसे भय है कि अब अदालत में एक बार फिर उसे तार-तार होना होगा.
('फ़रहा' बदला हुआ नाम है.)
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