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इस खेती के दौरान पत्नी से अलग सोते हैं किसान
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, गुड़ाबांदा से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
क्या गृहस्थ और ब्रह्मचर्य जीवन का कोई मेल है? इस सवाल का सहज सा जवाब होगा नहीं. मगर झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के गुड़ाबांदा प्रखंड के सैकड़ों किसान पीढ़ियों से ऐसी दोनों तरह की ज़िंदगी के साथ तालमेल बिठा कर जीवन-बसर करते आ रहे हैं.
इस नक्सल प्रभावित इलाके के तसर (रेशम) कीट का पालन करने वाले शादीशुदा किसान साल में दो बार करीब दो-दो महीने के लिए ब्रह्मचर्यों जैसी ज़िंदगी गुज़ारते हैं. इस दौरान ये मुख्य रूप से अर्जुन और आसन के पेड़ों पर पल रहे तसर के कीड़ों को चींटियों, तसर के कीटों को खाने वाले दूसरे कीड़ों और पक्षियों से बचाते हैं.
गुड़ाबांदा प्रखंड के अर्जुनबेड़ा गांव के करीब पचास साल के सुरेश महतो के मौसमी ब्रह्मचर्य के दिन अब खत्म होने को हैं.
वो बताते हैं, ''तसर की खेती के समय हम लोग बीवी के साथ नहीं सोते हैं. वो हमें छुएगी नहीं, वो भी अलग रहेगी और हम लोग भी अलग रहेंगे. तब उसके हाथ का बना खाना भी नहीं खाते हैं.''
इसके पीछे की वजह सुरेश ये बताते हैं, ''हम लोग जो खेती करती हैं उसमें अगर उसके (पत्नी के) साथ सो जाएंगे तो इधर खेती में बीमारी लग जाएगी. यही नियम है इसका.''
'नियम' और भी हैं
ब्रह्मचर्य के अलावा भी ये किसान कुछ और 'नियमों' का पालन करते हैं.
जैसा कि अर्जुनबेड़ा गांव के ही नित्यानंद महतो बताते हैं, ''कीड़ों की रखवाली करने स्नान करके जाते हैं. रखवाली के दौरान किसी को शौच लगा तो वह शौच के बाद फिर से नहाता है. कीड़े बीमार पड़ जाएं तो पूजा-पाठ करते हैं और फल (कोनून) तैयार होने के बाद बकरे की बलि देते हैं.''
तसर की खेती के दौरान संयमित जीवन वाले ऐसे 'नियम' कब से चले आ रहा हैं? इसके जवाब में सुरेश बताते हैं, ''ऐसे हमारे दादाजी किया करते थे और उनके दादा जी ने भी किया है. हम भी कर रहे हैं और पेड़ हैं तो फिर हमारे बाल-बच्चे भी करेंगे.''
इस इलाके में तसर की खेती करने वाले लगभग सभी किसान चाहे वो किसी भी समुदाय से हों इन 'नियमों' का पालन करते हैं. आदिवासी समुदाय से आने वाले मिहिर सबर अर्जुनबेड़ा से करीब तीन किलोमीटर दूर गांव धतकीडीह में रहते हैं. वह ऐसे किसानों में से हैं जिनके पेड़ गांव से दूर जंगलों में ज़्यादा हैं.
वो तसर पालन से जुड़े कुछ और 'नियमों' के बारे में बताते हैं, "तसर की खेती के समय हम लोग अंडा और मांस-मछली नहीं खाते हैं. जंगल में जाकर झोपड़ी बनाकर रहते हैं और अपने हाथों से रसोई करते हैं. इसका हमें बढ़िया फल मिलता है.''
टूट रहे हैं 'नियम'
लेकिन यह मान्यता अब धीरे-धीरे टूट भी रही है. धतकीडीह गांव में बने तसर उत्पादन सह प्रशिक्षण केंद्र में हमारी मुलाकात माकड़ी गांव के दीपांजलि महतो से हुई. उनका परिवार भी तसर की खेती करता है.
वो कहती हैं, "पहले पुरुष अपने से ही तसर की खेती करते थे और महिलाओं को पास नहीं जाने देते थे लेकिन अब हम भी इस खेती में हाथ बंटाते हैं. शुरू में एक-दो साल पुरुषों को समझने में लगा लेकिन अब दो-तीन साल से ऐसा हो रहा है. अब पुरुषों को भी लग रहा है कि महिलाओं से भी तसर की खेती हो सकेगी.''
अब झारखंड के पहाड़ों से घिरे इस इलाके में तसर की खेती का अगला मौसम करीब छह महीने बाद मॉनसून में शुरू होगा.
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