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आधार डेटा चोरी वाली ख़बर पर पत्रकार के ख़िलाफ़ एफ़आईआर
- Author, अरविंद छाबड़ा
- पदनाम, बीबीसी पंजाबी संवाददाता, चंडीगढ़ से
- प्रकाशित
दिल्ली पुलिस ने चंडीगढ़ स्थित 'द ट्रिब्यून' अख़बार के साथ जुड़े उस पत्रकार के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है जिन्होंने बायोमेट्रिक पहचान दस्तावेज़ 'आधार' से संबंधित एक लेख लिखा था.
आरोप है कि इस लेख में दावा किया गया था कि एक 'एजेंट' की मदद से मात्र 500 रुपये खर्च कर के किसी भी व्यक्ति के बारे में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को दी गई सारी जानकारी हासिल की जा सकती है.
नाम ज़ाहिर ना करने की शर्त पर दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि "क्राइम ब्रांच में दर्ज की गई एक शिकायत के आधार पर एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है."
रिपोर्ट लिखने वाली पत्रकार रचना खेरा ने बीबीसी को बताया, "मुझे एक अन्य अख़बार से इस मामले के बारे में जानकारी मिली. मुझे अभी एफ़आईआर के बारे में और जानकारी नहीं है."
वो कहती है कि इस बारे में अधिक जानकारी मिलने के बाद ही वो इस पर कोई टिप्पणी कर सकती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार यूआईडीएआई के एक अधिकारी ने भारतीय पीनल कोड की धारा 419 (ग़लत पहचान दे कर धोखा देना), 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाज़ी) और 471 (नकली दस्तावेज़ को सही बता कर इस्तेमाल करने) के तहत एफ़आईआर दर्ज करने के लिए शिकायत की थी.
एफ़आईआर में कई अन्य लोगों के भी नाम शामिल किए गए हैं जिनसे पत्रकार ने लेख के सिलसिले में संपर्क किया था.
बीती 4 जनवरी को 'द ट्रिब्यून' अख़बार न एक ख़बर छापी थी और बताया था कि किस तरह व्हाट्सऐप में गुमनाम विक्रेता थोड़े पैसे के लिए किसी आधार डेटा तक पहुंच दे रहे हैं.
इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पेटीएम के ज़रिए 500 रूपये चुकाने पर इस गिरोह को चलाने वाले एक एजेंट से आपको आधार डेटाबेस में ल़गइन करने के लिए लॉगइन आईडी और पासवर्ड मिल सकता है.
और इस तरह नाम, पता, पोस्टल कोड, फोटो, फोन नंबर और ईमेल की जानकारी आसानी से मिल सकती है.
यूआईडीएआई ने इस लेख में किए गए दावों से इंकार किया है और इसे ग़लत ख़बर बताया है. प्राधिकरण ने आधार डेटाबेस में किसी तरह के सेध लगाए जाने की ख़बरों को सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि आधार कार्ड से जुड़ा बायोमेट्रिक डेटा पूरी तरह सुरक्षित है.
सुप्रीम कोर्ट में है मामला
आधार कार्ड और निजता से संबंधित मामला फ़िलहाल देश की सर्वोच्च अदालत में है जहां याचिकाकर्ताओं ने आधार को चुनौती दी है. इनका कहना है कि आधार योजना के तहत व्यक्ति की निजी जानकारी और बायोमेट्रिक डेटा सरकार को देना होता है जो नागरिक के निजता के मौलिक अधिकार का उल्लघंन है.
इनका ये भी कहना है कि निजता के अधिकार का उल्लघंन इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत में डेटा प्रोटेक्शन व्यवस्था नहीं है और किसी व्यक्ति की निजी जानकरी को बचाने और लीक होने की होने की सूरत सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है.
अदालत की संविधान खंडपीठ ने हाल ही में आधार नंबर को मोबाइल फ़ोन से जोड़ने की समय सीमा 6 फरवरी 2018 से बढ़ा कर 31 मार्च, 2018 कर दी है.
सरकार ने नए और पुराने फ़ोन कनेक्शन को आधार नंबर से जोड़ना अनिवार्य बना दिया था.
साथ ही अदालत ने आधार क़ानून की धारा 7 के तहत सरकार की 139 योजनाओं और सब्सिडी के लिए आधार नंबर लिंक करने की समय सीमा 31 मार्च, 2018 तक कर दी है.