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माफ़ियों से केजरीवाल की साख दांव पर, क्या होगा 'आप' का
- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
आम आदमी पार्टी का जन्म पिछले लोकसभा चुनाव से पहले 2012 में हुआ था. लगता था कि शहरी युवा वर्ग राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए उठ खड़ा हुआ है. वह भारतीय लोकतंत्र को नई परिभाषा देगा.
सारी उम्मीदें अब टूटती नज़र आ रही हैं.
संभव है कि अरविंद केजरीवाल माफी-प्रकरण के कारण फंसे धर्म-संकट से बाहर निकल आएं. पार्टी को क़ानूनी माफियां आसानी से मिल जाएंगी, पर नैतिक और राजनीतिक माफियां इतनी आसानी से नहीं मिलेंगी.
क्या वे राजनीति के उसी घोड़े पर सवार हो पाएंगे जो उन्हें यहां तक लेकर आया है? अब उनकी यात्रा की दिशा क्या होगी? वे किस मुँह से जनता के बीच जाएंगे?
ख़ूबसूरत मौका खोया
दिल्ली जैसे छोटे प्रदेश से एक आदर्श नगर-केंद्रित राजनीति का मौक़ा आम आदमी पार्टी को मिला था.
उसने धीरे-धीरे काम किया होता तो इस मॉडल को सारे देश में लागू करने की बातें होतीं, पर पार्टी ने इस मौक़े को हाथ से निकल जाने दिया.
उसके नेताओं की महत्वाकांक्षाओं का कैनवस इतना बड़ा था कि उसपर कोई तस्वीर बन ही नहीं सकती थी.
ज़ाहिर है कि केजरीवाल अब बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ बड़े आरोप नहीं लगाएंगे. लगाएँ भी तो विश्वास कोई नहीं करेगा.
उन्होंने अपना भरोसा खोया है. पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह अपनी राजनीति को किस दिशा में मोड़ेगी.
चंद मुट्ठियों में क़ैद और विचारधारा-विहीन इस पार्टी का भविष्य अंधेरे की तरफ़ बढ़ रहा है.
समर्थकों से धोखा
केजरीवाल की बात छोड़ दें, पार्टी के तमाम कार्यकर्ता ऐसे हैं जिन्होंने इस किस्म की राजनीति के कारण मार खाई है, कष्ट सहे हैं.
बहुतों पर मुक़दमे दायर हुए हैं या किसी दूसरे तरीक़े से अपमानित होना पड़ा. वे फिर भी अपने नेतृत्व को सही समझते रहे. धोखा उनके साथ हुआ.
संदेश यह जा रहा है कि अब उन्हें बीच भँवर में छोड़कर केजरीवाल अपने लिए आराम का माहौल बनाना चाहते हैं. क्यों?
बात केवल केजरीवाल की नहीं है. उनकी समूची राजनीति का सवाल है. ऐसा क्यों हो कि वे चुपके से माफी मांग कर निकले लें और बाकी लोग मार खाते रहें?
ऐसी ही एक पूर्व सहयोगी हैं अंजलि दमनिया. शायद अंजलि की बातों पर यक़ीन करके अरविंद केजरीवाल ने नितिन गडकरी के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी थी.
अंजलि दमनिया ने 2014 में गडकरी के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़ा.
राजनीति ही आरोपों की थी
अंजलि और आम आदमी पार्टी का साथ ज़्यादा चला नहीं और उन्होंने 2015 में पार्टी छोड़ दी. उनका कहना है कि 'मुझ पर 24 मुक़दमे हैं और मैं उन्हें लड़ूंगी.' ऐसे बहुत से लोग होंगे.
अरविंद केजरीवाल किसी एक मामले में माफ़ी मांग रहे होते तो मान लिया जाता कि उन्होंने ज़्यादा सोचा नहीं और भावना में बहकर आरोप लगा दिए.
वास्तविकता यह है कि उनकी राजनीति का महत्वपूर्ण दौर आरोपों पर केंद्रित था. वह उनकी राजनीति थी. वे उन आरोपों से अपने को अलग कैसे कर सकते हैं?
आरोप लगाना और माफ़ी मांग लेना क्या इतनी मामूली बात है? क्या आरोप लगाते वक्त वे अबोध थे, नादान थे? और अब समझदार हो गए हैं, आरोपों की गंभीरता को समझने लगे हैं?
उन्हें राजनीतिक सफलता तो उनकी उसी मासूमियत की मदद से मिली थी. जनता ने तो उन्हें उसी 'बहादुरी' का पुरस्कार दिया था.
क़ानूनी-प्रक्रियाओं ने मारा
केजरीवाल के सहयोगी मनीष सिसोदिया कहते हैं कि 'हम बेकार की बातों पर वक्त बर्बाद नहीं करना चाहते. हम काम करना चाहते हैं.'
अपराध की दुनिया में भटकने वालों की कहानी कुछ ऐसी ही होती है. एक वक़्त ऐसा आता है, जब वे उस दुनिया से भागना चाहते हैं, पर हालात उन्हें भागने नहीं देते.
पार्टी की एक नेता ने अपने ट्वीट में मानहानि के आपराधिक मुक़दमों को क़ानूनी तौर पर स्वीकृत दादागिरी बताया है. पार्टी के सूत्र बता रहे हैं कि क़ानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लेकर दबाव बनाया जा रहा था.
व्यावहारिक सच यह है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले ज़्यादातर व्यक्ति इस स्थिति का सामना करते हैं.
राजनीति के लिए पैसा चाहिए और आम आदमी पार्टी सत्ता के उन स्रोतों तक पहुंचने में नाकाम रही जो प्राणवायु प्रदान करते हैं.
विडंबना है कि यह पार्टी इस प्राणवायु के स्रोत बंद करने के नाम पर आई थी और ख़ुद इस 'ऑक्सीजन' की कमी की शिकार हो गई.
नासमझी और नादानी
केवल इसी प्रकरण की बात नहीं है, केजरीवाल पार्टी के भीतर लगातार चल रही उठा-पटक पर नियंत्रण पाने में भी सफल नहीं हुए हैं.
सब कुछ केवल उनके विरोधियों की साज़िश के कारण नहीं हुआ. उनकी नासमझी की भी इसमें भूमिका है.
इन मुक़दमों को एक झटके में ख़त्म करा डालने की कामना भी नासमझी है. वह भी ऐसे मौक़े पर जब उनकी पार्टी तूफ़ानों से घिरी हुई है.
शायद उनकी तरफ़ से इसकी पर्याप्त तैयारी भी नहीं थी. अचानक बिक्रम सिंह मजीठिया ने जब इसकी घोषणा की तो मामले ने बड़े 'मीडिया झंझावात' का रूप ले लिया.
किस-किस से माफ़ी मांगेंगे?
अब दिल्ली विधानसभा की 20 सीटों पर उपचुनाव हुए तो केजरीवाल के पास अपने इन अंतर्विरोधों का जवाब नहीं होगा.
उन्हें केवल प्रभावशाली विरोधी नेताओं से माफ़ी नहीं मांगनी है. अपने समर्थकों, दिल्ली की जनता और उन पुराने दोस्तों से भी मांगनी होगी जो साथ छोड़कर चले गए.
इनमें योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे पुराने सहयोगी भी शामिल हैं. यह सूची लंबी है और सबके मन में केजरीवाल की राजनीति को लेकर भारी क्लेश है.
भरोसा टूटा
केजरीवाल की माफ़ी पर भी किसे भरोसा होगा? पिछले चार साल में उन्होंने कितने साथियों को बदला, कितनी तरह की बातें बदलीं और कितनी मुद्राएं अपनाईं?
संभव है कि दिल्ली की झुग्गियों में रहने वालों को उनपर अब भी भरोसा हो. पर समझदार तबके का भरोसा तो एकदम टूटा है.
यह पार्टी देश सार्वजनिक जीवन में छाए भ्रष्टाचार से लड़ने को आई थी. भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हुआ बल्कि अब वह ख़ुद सत्ता के गलियारों में घूम रही है.
इन्हें व्यावहारिकता का पता नहीं था तो वे सत्ता की राजनीति में कूदे ही क्यों? बदलाव की राजनीति और सत्ता की राजनीति के रास्ते अलग-अलग हैं.