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नज़रिया: क्या दलितों के मुद्दे पर सरकार से अदालत में चूक हुई?
एससी-एसटी ऐक्ट को लेकर 20 मार्च को आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सोमवार को देशभर में प्रदर्शन हुए.
जहां विपक्षी पार्टियां इस मामले में केंद्र सरकार पर ढिलाई बरतने का आरोप लगा रही हैं, वहीं केंद्रीय क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद का कहना था कि सरकार इस केस में पक्षकार नहीं थी.
सुप्रीम कोर्ट के जिस फ़ैसले को लेकर विरोध हो रहा है, उस मामले में केंद्र सरकार का भी पक्ष मांगा गया था. सरकार की ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे.
मंगलवार को कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सही ढंग से क़ानून का बचाव नहीं किया.
कितनी सच्चाई है उनके आरोपों में और क्या सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में अतिरिक्त सक्रियता दिखाई है? इन्हीं सवालों को लेकर बीबीसी संवाददताता आदर्श राठौर ने बात की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी हैदराबाद के कुलपति फ़ैज़ान मुस्तफ़ा से. पढ़ें उनका नज़रिया:
'सरकार ने दिए कमज़ोर तर्क'
इस मामले में सरकारी की तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट में जो तर्क दिए गए थे, वे कमज़ोर थे. अगर जज फ़ैसले में भारत सरकार के तर्कों को एक पैराग्राफ़ में लिख दे तो मतलब है कि सरकार ने अच्छे तरीके से बहस नहीं की.
यह तथ्य है कि सरकार ने इस मामले में उतनी रुचि नहीं ली जितनी उसे लेनी चाहिए थी.
या तो सरकार इस मामले की राजनीतिक जटिलता को नहीं समझ पाई या शायद वह नरम ही रहना चाहती थी क्योंकि उसके अधिकतर मतदाता अपर कास्ट हैं.
अब सरकार मुश्किल स्थिति में है. 10 दिन बाद ही पता चल पाएगा कि पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार क्या तर्क देती है और कोर्ट की उनपर क्या प्रतिक्रिया रहती है.
'कमज़ोर हुआ है क़ानून'
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से डाली गई पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि उसके फ़ैसले से एससी-एसटी ऐक्ट कमज़ोर नहीं हआ है. लेकिन यह कहना कि इस इससे ऐक्ट के प्रावधान कमज़ोर नहीं हुए हैं, सही बात नहीं है.
इस क़ानून में लिखा गया है कि एफ़आईआर होते ही गिरफ़्तारी होगी. अब सुप्रीम कोर्ट एससी-एसटी एक्ट को लेकर कहता है पहले जांच होगी, संबंधित अथॉरिटी से अनुमति लेने के बाद गिरफ़्तारी होगी. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ही कई ऐसे फ़ैसले दिए हैं कि संज्ञेय अपराधों में सूचना मिलते ही एफ़आईआर लिखी जाएगी.
'अग्रिम ज़मानत पर अजीब प्रावधान'
उत्तर प्रदेश में किसी भी अपराध के लिए अग्रिम ज़मानत की व्यवस्था नहीं है, वहां सीआरपीसी में संशोधन किया गया है. अन्य कई राज्यों में भी ऐसी ही व्यवस्था है.
मगर अब सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के आधार पर दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में अग्रिम ज़मानत ली जा सकती है. यह अजीब बात है.
ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट सभी तर्क सुनकर पुनर्विचार याचिका को स्वीकारते हुए या तो सुधार करेगा या फिर इसे ऊंची बेंच के पास भेजा जाएगा.
न्यायपालिका का 'दख़ल'
सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कहा है कि संविधान के तहत शक्तियों का विभाजन होना चाहिए. विधायिका का काम क़ानून बनाना है, कार्यपालिका काम उसे लागू करना है और न्यायपालिका का काम है उसके बारे में निर्णय लेना.
ऐसे में जब कोई क़ानून एकदम स्पष्ट है तो न्यायपालिका को विधायिका वाला काम नहीं करना चाहिए. वह तभी दख़ल दे सकती है, जब किसी मुद्दे को लेकर क़ानून नहीं है.
उदाहरण के लिए खाप पंचायतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए थे. या दिल्ली की सर्दी में बेघर लोगों की मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन्स जारी करके सही किया.
लेकिन एससी-एसटी ऐक्ट एकदम स्पष्ट था और संसद ने ख़ास तौर पर एक वर्ग के लिए विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए यह बनाया था. इसमें सुप्रीम कोर्ट को गाइडलाइन्स जारी नहीं करनी चाहिए थी.
यह न्यायपालिका की सक्रियता का मामला है, जिसकी ज़रूरत नहीं थी.
कई कारणों से सिद्ध नहीं होते अपराध
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि हम ऐक्ट के ख़िलाफ नहीं हैं, बस चाहते हैं कि निर्दोष आदमी को सज़ा न हो.
लेकिन कहीं पर ऐसे आंकड़े नहीं हैं कि कितने निर्दोष लोगों को इस क़ानून के तहत सज़ा हुई है. और ऐसे मामलों में दोष सिद्धि की दर कम होने की बात की जाती है तो इसकी कई वजहें हैं.
उदाहरण के लिए सोहराबुद्दीन मामले में पैंतालीस गवाह पलट गए हैं. इस मामले में सज़ा नहीं होगी तो यह कहना सही नहीं है कि केस झूठा था.
राजनीति, धर्म और जाति आदि कई कारणों का दबाव रहता है. कई बार बड़े आपस में बैठकर दलितों पर केस वापस लेने का दबाव बना देते हैं. बाहुबलियों के ख़िलाफ भी कई बार केस नहीं हो पाता. तो दोष सिद्ध होने की दर कम होना यह नहीं दिखाता कि केस झूठे हैं.
साथ ही एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 78 फीसदी केसों में चार्जशीट दायर की गई थी. पुलिस ने चार्जशीट जांच के बाद ही तो दायर की थी. यानी ये 78 प्रतिशत मामले तो झूठे नहीं थे.
क्या सरकार ने देर की?
यह फ़ैसला 20 मार्च को आया था. राजनीतिक पार्टियां कह सकती हैं कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जाने में देर की. लेकिन मेरा मानना है कि 10-12 दिन की देर को देर नहीं कहा जा सकता. फ़ैसला पढ़ने, फिर यह तय करने में कि किस आधार पर रिव्यू करना है, देर लग सकती है.
सरकार ने सही किया कि पुनर्विचार याचिका डाली. अगर सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले पर कायम रहता है, तब संसद को क़ानून बनाना चाहिए.
अगर संसद का सत्र न चल रहा हो, तब सरकार अध्यादेश ला सकती है. सीधे अध्यादेश लाया जाए, ऐसी जल्दबाज़ी का यह मामला नहीं था.