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गे-लेस्बियन होना बीमारी नहीं है, इसका 'इलाज' मत खोजिए
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
क्या आपके बच्चे गे/लेस्बियन हैं?
उनकी शादी से पहले हमसे जानिए. ये दावा है गुड़गांव के एक थेरेपी सेंटर का, जिसका विज्ञापन एक नामी अख़बार में 10 जून को छपा था. विज्ञापन में ये दावा भी किया गया था कि वो 'डिस्टेंस हीलिंग' से समलैंगिकता का 'इलाज' कर सकते हैं.
विज्ञापन देखकर एलजीबीटी एक्टिविस्ट हरीश अय्यर ने थेरेपी सेंटर में फ़ोन किया.
हरीश ख़ुद को समलैंगिक मानते हैं. हरीश ने अख़बार में दिए नंबर पर फ़ोन किया और अपने गे होने की वजह पूछी. उनको जबाव में बताया गया कि वो स्मार्टफ़ोन जैसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं और इसी वजह से समलैंगिक हो गए हैं.
इसके बाद हरीश ने उनसे पूछा कि उनकी मां भी फ़ोन यूज़ करती हैं. क्या वो भी लेस्बियन बन जाएंगी? जवाब मिला कि औरतों के साथ ऐसा नहीं होता.
हालांकि फ़ोन पर बात कर रहे शख़्स ने ये भी कहा कि जिन लड़कों को उनकी मां से ज़्यादा लाड़-प्यार मिलता है वो गे हो जाते हैं. थेरेपी सेंटर के हीलर ने कई बॉलीवुड सितारों और नेताओँ के नाम गिनाए और उनके गे-लेस्बियन होने का दावा किया.
हरीश के पास इस पूरे बातचीत की रिकॉर्डिंग भी मौजूद है.
बीबीसी ने भी विज्ञापन और थेरेपी सेंटर की वेबसाइट में दिए नंबरों पर फ़ोन करने की क़ोशिश की लेकिन सभी नंबर बंद थे.
क्या समलैंगिकता कोई बीमारी है?
वैसे, इस पूरे वाक़ए के बीच ज़रूरी सवाल ये है कि इस तरह के दावों में कितनी सच्चाई है? क्या समलैंगिकता वाक़ई कोई बीमारी है? क्या इसका 'इलाज' किया जा सकता है?
कुछ ही दिनों पहले 'इंडियन साइकैट्री सोसायटी' ने एक आधिकारिक बयान में कहा था कि अब समलैंगिकता को बीमारी समझना बंद होना चाहिए.
सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. अजित भिड़े ने फ़ेसबुक पर एक वीडियो जारी करके कहा कि पिछले 40-50 सालों में ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है जो ये साबित कर सके कि समलैंगिकता एक बीमारी है.
डॉ. भिड़े ने ये भी कहा कि समलैंगिक होना बस अलग है, अप्राकृतिक या असामान्य नहीं. हालांकि आईपीसी की धारा-377 भी समलैंगिक सम्बन्धों को अप्राकृतिक और दंडनीय अपराध मानती है.
भारत में धारा-377 की मौजूदगी पर काफी विवाद चल रहा है और इसे निरस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं भी दायर की जा चुकी हैं.
यानी ये बात तो साफ है कि होमोसेक्शुअल, बाइसेक्शुअल या ट्रांससेक्शुअल होना कोई बीमारी नहीं है इसलिए इसके इलाज का कोई सवाल ही नहीं उठता.
हॉर्मोन्स की गड़बड़ी से समलैंगिकता?
भारतीय समाज में एलजीबीटी समुदाय और समलैंगिकता के बारे में इसके अलावा भी कई मिथक प्रचलित हैं.
जैसे कि अक्सर लोगों को लगता है कि हॉर्मोन्स में गड़बड़ी समलैंगिकता को जन्म देती है, जबकि ऐसा नहीं है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञ और एलजीबीटी मामलों के जानकार डॉ. पल्लव पटनाकर के मुताबिक, "कई लोगों को लगता है कि अगर कोई पुरुष गे है तो उसके शरीर में एस्ट्रोजन (औरतों के शरीर में पाया जाने वाला हॉर्मोन) ज़्यादा है और अगर कोई महिला लेस्बियन है तो उसमें टेस्टोस्टेरोन (पुरुषों के शरीर में पाया जाने वाला हॉर्मोन) ज़्यादा है. सच्चाई तो ये है कि इन हॉर्मोन्स का सेक्शुअलिटी से कोई लेना-देना नहीं है."
गे पुरुष, औरतों की तरह बर्ताव करते हैं?
समलैंगिकता के बारे में कही-सुनी जाने वाली कुछ ऐसी बेतुकी बातें नीतीश ने भी बीबीसी से शेयर कीं. 19 साल के नीतीश समलैंगिक हैं.
उन्होंने कहा, "लोगों को लगता है कि हर गे पुरुष के हाव-भाव महिलाओं की तरह होते हैं और लेस्बियन महिलाएं हमेशा रफ़ ऐंड टफ़ लुक रखती हैं. वो लड़कियों जैसे कपड़े नहीं पहनतीं. ये बिल्कुल ग़लत है. आप किसी के हाव-भाव या कपड़े पहनने के तरीके से उसकी सेक्शुअलिटी कैसे तय कर सकते हैं?"
नीतीश ने हाल ही में आई फ़िल्म 'वीरे दी वेडिंग' का उदाहरण दिया. फ़िल्म के एक सीन में सोनम कपूर की मां उनसे कहती हैं, "ये क्या हमेशा पैंट पहने रहती है? लेस्बो लगती है."
गर्ल्स कॉलेज में पढ़ने से लेस्बियन हो जाती हैं लड़कियां?
इसके अलावा भी उन कई धारणाओं का ज़िक्र नीतीश ने किया जो एलजीबीटी समुदाय के बारे में प्रचलित हैं.
नीतीश कहते हैं, "मैंने कई लोगों को कहते सुना है कि गर्ल्स कॉलेज में पढ़ने वाली या गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली लड़कियां लेस्बियन हो जाती हैं. या फिर बॉयज़ क़ॉलेज में पढ़ने वाले या बॉय़ज हॉस्टल में रहने वाले लड़के गे हो जाते हैं. क्या जिन स्कूलों में लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते हैं वहां कोई गे या लेस्बियन नहीं होता?''
इससे पहले केरल के एक प्रोफ़ेसर ने कहा था कि जींस पहनने वाली लड़िकयां ट्रांसजेंडर बच्चों को जन्म देती हैं.
क्या इनमें से किसी भी बात में सच्चाई है? डॉ. पल्लव पटनाकर का स्पष्ट जवाब है- नहीं.
उन्होंने कहा, "दरअसल शादी और बच्चे पैदा करना, ये दो ऐसी चीजें हैं जो समाज में अनिवार्य बना दी गई हैं. अगर कोई इनसे पीछे हटता है तो उसे ग़लत बता दिया जाता है. समलैंगिकता को भी इसी वजह से बीमारी समझा जाता है."
पल्लव कहते हैं, "अख़बार में छपे ऐसे विज्ञापनों या किसी थेरेपी सेंटर के बहकावे में आने से बेहतर है कि आप समलैंगिकता के बारे में पढ़ें, इस पर खुलकर बातचीत करें और ये स्वीकार करें कि समलैंगिकता अप्राकृतिक या असामान्य नहीं है और न ही ये कोई बीमारी है जिसका इलाज कराने की ज़रूरत है."
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