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नज़रिया: तो अमित शाह के निशाने पर थे नीतीश कुमार?
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 3 मिनट
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के अध्यक्ष अमित शाह का 'पटना मेगा शो' इस मायने में हिट माना जा रहा है कि उसने अपने अघोषित मुख्य निशाने को अंदर से हिट किया है.
यह किसी से छिपा नहीं है कि अघोषित मुख्य निशाने पर थे कौन और सत्ता-गठबंधन में 'बड़े भाई' वाला हालिया वर्चस्व का विवाद शुरू कहाँ से हुआ.
बिहार में बीजेपी के साथ जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) की सत्ता-साझेदारी है.
इस दल के नेता-प्रवक्ता ही नहीं, ख़ुद इसके अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कुछ मुद्दों पर बीजेपी से अपनी अलग राय या रुख़ का ख़ुलकर इज़हार शुरू कर दिया था.
ऐसे में नीतीश कुमार के फिर भाजपा छोड़ने की चर्चा ज़ोर पकड़ने लगी और स्वाभाविक रूप से दोनों दलों में खटास के मद्देनज़र गठबंधन को संकट में देखा जाने लगा.
इस संकट के पीछे मुख्य वजह बनकर उभरा है वह विवाद, जो आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू के बीच सीटों के बँटवारे से जुड़ा है.
जेडीयू बना तमाशबीन
बिहार में जेडीयू ख़ुद को और अपने नेता नीतीश कुमार को बीजेपी से ऊपर आँकते हुए यहाँ अधिक चुनावी सीटों का हक़दार मानता है. ये बात बीजेपी नेतृत्व को क़बूल नहीं है.
इसलिए जेडीयू की तरफ़ से दबाव बढ़ाने जैसी बयानबाज़ी पर उसने ख़ामोश रहकर जवाबी तोड़ ढूंढा है.
इसी परोक्ष तोड़ पर रणनीतिक अमल के लिए प्रत्यक्ष रूप से गुरुवार को पटना में अमित शाह के एक दिवसीय कार्यक्रम का बड़ा आयोजन हुआ.
मौक़े पर उमड़ पड़े पार्टीजनों द्वारा शाह के शाही अभिनंदन का ऐसा तामझाम और केंद्रीय सत्ता का इतना रोबदाब दिखा कि जेडीयू बस तमाशबीन-सा बना रहा.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अमित शाह ने आत्मीयता प्रदर्शन में ऐसा लपेटा कि वो नाश्ते से लेकर रात के खाने तक आतिथ्य का निर्वाह करने में ही सिमट गए.
पहले से वज़नदार हुई भाजपा
लोकसभा चुनाव के सिलसिले में सीटों के बँटवारे से जुड़ी गाँठें खोलने का ये कथित अवसर कुछ इस तरह बीत गया कि इशारों से ही काम चलाना पड़ा.
'मोटा भाई' की बुलंदी देखकर 'बड़ा भाई' होने के दावेदार हल्के पड़े या नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा.
लेकिन ये संदेश ज़रूर चला गया है कि बिहार में बीजेपी अपने गठबंधन में पहले से ज़्यादा वज़नदार हुई है.
जब अमित शाह ने अपने भाषण में बिहार को केंद्र से मिली भरपूर आर्थिक मदद/राशि आबंटन का ब्यौरा पेश किया, तो इसे नीतीश कुमार को ही लक्ष्य करके छोड़ा गया तीर माना गया.
जब अमित शाह ने कहा कि यहाँ गठबंधन में सब ठीक-ठाक है और नीतीश कुमार बीजेपी को छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे, तब इशारा यही था कि अब और कहाँ गुज़र है इनकी!
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने 'नो एंट्री' दिखा दी है और कांग्रेस ने भी अधखुला दरवाज़ा दिखा कर बंद कर लिया.
जहाँ तक चेहरा या छवि की बात है, तो वह हालिया उप-चुनावों में बीजेपी की तरह नीतीश को भी आईना दिखाने वाली साबित हुई है.
गठबंधन का तार
लेकिन अगर समग्रता से ग़ौर करें, तो कई तरह के झटके झेल रही बीजेपी को जेडीयू या नीतीश के सहयोग की उतनी ही ज़रूरत है, जितनी कि नीतीश को बीजेपी की है.
बिहार में आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन ने ऐसे हालात पैदा कर दिये हैं कि बीजेपी और जेडीयू का साथ रहना इन दोनों की मजबूरी है.
हालाँकि इसका ये मतलब नहीं है कि चुनाव के समय सीटों के बँटवारे पर एनडीए घटकों में किचकिच नहीं मचेगी.
इसी किचकिच को कम करने और लोकसभा चुनाव में अपने वर्चस्व को बचाने का सुनियोजित बड़ा प्रयास अमित शाह के इस बिहार दौरे में भी दिखा.
ज़ाहिर है कि गठबंधन वाली सत्ता-राजनीति में घटक दलों के बीच खटास कोई नई बात या बड़ी बात नहीं होती.
लेकिन बिहार में बात इसलिए बढ़ी क्योंकि यहाँ गठबंधन में खटास ऐसी हो गई कि वह सरकार में दरार बढ़ाने का इशारा देने लगी थी.
मेरे ख़्याल से अमित शाह और नीतीश कुमार- दोनों इस बार एक-दूसरे को, संकेतों में ही सही, यह समझा सके होंगे कि गठबंधन के तार को इतना मत कसें कि वह टूट जाए.
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