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छठ में 'पर्व' जैसा क्यों नहीं इस बार बिहार के गांवों में माहौल?: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, भोजपुर (बिहार) से लौटकर, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
"हम धान पटाने के लिए लाइन लगाए हैं. सूर्य भगवान की महिमा रही तो अगले साल छठ करेंगे."
भोजपुर के किसान उदय पासवान के यहां भी छठ हो रहा है. लेकिन वे इस बार खुद व्रत नहीं कर पा रहे हैं. पत्नी कर रही हैं.
नहाय-खाय के साथ रविवार से महापर्व छठ शुरू हो चुका है.
छठ की परंपरा के अनुसार नहाय-खाय के दिन से ही व्रती चार दिवसीय अनुष्ठान का आरंभ करते हैं.
व्रती इस दिन जहां संभव होता है गंगा या किसी नदी के जल से या फिर जहां इंतजाम होता है वहां कुंआ अथवा पोखरे के जल से नहाने के बाद लौकी (कद्दु)-चने की दाल की सब्जी और रोटी खाकर खुद को व्रत के लिए शुद्ध करते हैं.
फिर अगले दिन (खरना के दिन) अरवा चावल-गुड़ वाली खीर और रोटी के प्रसाद को सूर्य को चढ़ाने के बाद व्रती खुद भी ग्रहण कर छठ का निर्जला उपवास शुरू करते हैं.
सूखे की मार
उदय पिछले साल छठ का व्रत पत्नी के साथ खुद भी उपवास रखकर किए थे. लेकिन इस बार नहीं कर रहे हैं.
वे इस बात पर कहते हैं, "आज-कल में कभी भी लाइन (बिजली) आ जाएगा. अभी दो बार धान का पटवन (सिंचाई) करना है. यही दो-चार दिन है हाथ में. धान में फर (दाना) लगेगा."
भोजपुर के चातर गांव के उदय पासवान मालगुजारी पर जमीन लेकर ढ़ाई बीघा में धान की खेती किए हैं.
पंद्रह कट्ठे में मक्का भी बोया था लेकिन पानी की कमी के कारण मक्के की फसल खेत में ही सूख चुकी है.
धान की फसल पर पूरे साल का घर टिका था, सुखाड़ होने के बावजूद भी चौदह पटवन देकर धान की फसल को बचाए हैं.
कहते हैं कि "जो भी धान अभी बधार में दिख रहा है किसी में सोलह-सत्रह पटवन से कम नहीं लगा है. मेरे पास उतनी पूंजी नहीं थी कि सबकी बराबरी कर सकूं. यहां तो सैकड़ों बीघा फसल खेत में ही सूख चुकी है."
साल 1967 का अकाल
ये हाल केवल भोजपुर के किसान उदय का नहीं बल्कि बिहार के लाखों किसानों का है. क्योंकि बिहार में इस साल सूखा है.
सरकार का कृषि विभाग इस सूखे की तुलना साल 1967 के अकाल से कर चुका है.
अगर सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो कुल 38 ज़िलों में से 24 ज़िले सूखाग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं. करीब 276 प्रखंडों इस सूखे की चपेट में हैं.
15 अक्तूबर को बिहार कैबिनेट ने बिहार को सूखाग्रस्त राज्य घोषित कर दिया.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने थोड़े ही दिनों पहले एक सभा में किसानों को संबंधित करते हुए कहा था, "खेत में सूखी फसल को खेत में ही छोड़ दें, जब तक कि सर्वे नहीं हो जाता. उसी फसल के आधार पर फसल सहायता योजना की राशि मिलेगी."
किसानों का त्योहार
छठ की परंपरा और प्रथा पर बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार निराला बिदेशिया कहते हैं, "छठ के प्रसाद के तौर पर जो चढ़ता है या फिर सूर्य को जो अर्पण होता है, वह सब किसान द्वारा उगाई फसल से ही संबंधित होता है. ठेकुआ और पानीफल से लेकर जमीन के अंदर की ताजी हल्दी तक."
लेकिन इस साल सूखा पड़ गया है. नई फसल अभी तक उपजी नहीं है. जो फसल बर्बाद हो गई उसने किसानों की कमर तोड़ दी है.
सबकुछ का इंतजाम खरीद कर ही संभव है. और महंगाई के इस दौर में उदय जैसे हजारों गरीब भूमिहीन किसानों के लिए फसलों का सूख जाना छठ के उमंग के मर जाने जैसा है.
भोजपुर के मीरगंज गांव के अनिल राय ने हाल ही में अपने खेत का पटवन किया है.
वे कहते हैं, "डीजल से पटवन का रेट 200 रुपये घटा है. जबकि जहां बिजली है, वहां प्रति बीघा 400 रुपये पटवन का रेट है. अगर किसी ने 15 पटवन भी किया है तो समझ लीजिए की इधर दो बीघा भी धान उगाने में कितना खर्च है."
बारह ज़िले सूखाग्रस्त
इस साल बिहार के 12 जिलों को पूर्णत: सूखाग्रस्त घोषित किया गया है.
इनमें नालंदा, नवादा, गया, जमुई, शेखपुरा, दरभंगा, समस्तीपुर, सारण, सीवान, गोपालगंज, बांका और सहरसा शामिल हैं.
बिहार सरकार ने इस बार सूखे से निपटने के लिए 1400 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना बनाई है.
बीबीसी के साथ बातचीत में कृषि विभाग के पटना प्रमंडल के संयुक्त निदेशक उमेश कुमार मंडल कहते हैं, "ऐसा नहीं कि सभी जिलों में पूरा का पूरा सूखा हो गया है. कुछ जिलों के कुछ प्रखंडों में ही सूखे का असर है. हालांकि, कुछ ज़िले ऐसे भी हैं जो पूर्ण रूप से सूखा प्रभावित हैं."
"किसानों को इनपुट सब्सिडी देने का काम चल रहा है. सभी एप्लिकेशन ऑनलाइन डालने हैं. प्रावधानों के मुताबिक 25 दिनों के अंदर किसानों को सब्सिडी की राशि मिल जाएगी."
छठ तो छठ है…
इस सवाल के जवाब में इस सूखाड़ का असर अगली फसल पर ना पड़े इसके लिए सरकार क्या कर रही है, उमेश कुमार कहते हैं, "जब तक खेत में नमी नहीं आएगी, अगली फसल की बुआई संभव नहीं है. जिन इलाकों में एकदम बारिश नहीं हुई है, वहां नमी की कमी है. लेकिन कुछ ऐसे भी इलाके भी हैं जहां नमी अभी भी बरकरार है. कहीं-कहीं तो मसूर की बुआई भी हो गई है."
मगर छठ तो छठ है. सभी ने किसी न किसी तरह से अपने प्रसाद का इंतजाम कर लिया है.
पत्रकार से किसान बने पुर्णिया के चनका गांव के रहने वाले गिरिन्द्रनाथ झा कहते हैं, "हम आशावान हैं, महंगाई के इस दौर में भी. उत्सव के माहौल ने हम किसानों के घर-दुआर में ऊर्जा का संचार कर दिया है, सूखे की मार को हम फिलहाल भूलकर छठी मैय्या की आराधना में लग गए हैं, इस उम्मीद के साथ अगली फसल अच्छी होगी."
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