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यहां आवारा गायें जान पर आफ़त बन गई हैं: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, पूनम कौशल
- पदनाम, महावण गांव से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
राजन देवी अपने खेत के पास उदास खड़ी हैं. गेहूं की उनकी फसल के अधिकतर हिस्से को आवारा पशु चर गए हैं. उनका परिवार इस हालत में नहीं है कि खेत की तारबंदी करा सकें. उनके पास एक ही विकल्प है- अपने खेत की रखवाली करना.
गौतमबुद्ध नगर के महावण और आसपास के गांवों के किसान आवारा गायों और सांडों से इतने परेशान हो गए हैं कि बीते रविवार को पूरे गांव ने इकट्ठा होकर इन पशुओं को ज़बरदस्ती गांव के सरकारी स्कूल में बंद कर दिया.
प्रशासन को दख़ल देना पड़ा और इन पशुओं को आज़ाद कराया गया. अब ये फिर से खेतों में हैं और फ़सल चर रहे हैं.
आवारा पशुओं की समस्या पर गौतमबुद्ध नगर के ज़िलाधिकारी बृज नारायण सिंह ने बीबीसी से कहा, "इस समस्या का समाधान खोजना प्रशासन की प्राथमिकता में हैं."
"हमने कम से कम छह जगहें भी चिन्हित की है. गोशाला खोलने के लिए सरकारी ज़मीनें उपलब्ध करवाई जाएंगी. इसके अलावा हम उन लोगों पर भी कार्रवाई करेंगे जो गोवंशीय जानवरों को छोड़ रहे हैं."
लेकिन लोगों में डर सिर्फ़ इन पशुओं के फसल चरने का ही नहीं है. डर ये भी है कि इनमें से कुछ हमलावर हो गए हैं और गांव के कई लोगों पर जानलेवा हमले किए हैं.
11 साल के आशू हाल ही में बिस्तर से उठे हैं. कुछ दिन पहले वो अपने खेत से जानवर भगाने गए थे. एक सांड हमलावर हो गया और उन्हें सींगों पर उठाकर पटक दिया. आशू को कई दिन अस्पताल में रहना पड़ा.
आशू कहते हैं, "मैं जानवर भगाने गया था. सांड मेरे पीछे भागा तो मैं गिर गया. उसने मेरे पीछे सींग घुसा दिया और मुझे सींगों पर उठाकर पटक दिया. किसी से फ़ोन मांगकर घर फ़ोन किया तो मुझे अस्पताल पहुंचाया गया. अब मुझे खेत पर जाने से डर लगता है."
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सपने में भी दिखता है हमलावर सांड
धर्मवती देवी अपने पति के साथ अपना खेत देखने गईं थीं जब एक सांड ने उन पर हमला किया. उस दिन को याद करके वो आज भी सिहर जाती हैं.
धर्मवती देवी बताती हैं, "मैं और मेरे पति मोटरसाइकिल से अपने खेत की ओर जा रहे थे. मैंने कोने पर सांड को खड़े देखा तो अपने पति से कहा कि ये ग़ुस्से में लग रहा है. उन्होंने कहा कि ये तो रोज़ ही यहां खड़ा रहता है और मोटरसाइकिल चलाते रहे. पास पहुंचते ही सांड ने हमला कर दिया."
वो बताती हैं, "मोटरसाइकिल से गिरते ही वो मेरे पीछे पड़ गया. सींगों से हमला किया. मेरे पेट, कमर और कई जगह सींग घुसा दिए और उठाकर पटक दिया. मैं कई दिन अस्पताल में मौत से जूझती रही. जान बचने की ख़ुशी है."
धर्मवती की बहू बताती हैं कि अस्पताल से लौटने के बाद से उनकी सास को घर से बाहर निकलने से भी डर लगता है और उन्हें सपने में भी हमलावर सांड दिखाई देते हैं.
लेकिन गांव में कई ऐसे भाग्यशाली भी हैं जो इन आवारा पशुओं के हमले से बाल-बाल बचे हैं. खेत पर गईं आसिया के पीछे भी हाल ही में ये जानवर पड़ गए थे लेकिन वहां मौजूद लोगों ने उन्हें बचा लिया. वो बच तो गईं लेकिन डर उनके दिल में बैठ गया और उन्होंने भी अकेले खेतों की ओर जाना छोड़ दिया है.
गांव के लोग कहते हैं कि आवारा पशु, जिनमें अधिकतर बछड़े और सांड हैं, अब एक बड़ी समस्या बन गए हैं जिसका तुरंत हल निकाले जाने की ज़रूरत है.
अपनी समस्या की ओर सरकार और मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए ही गांव के लोगों ने क़रीब 80 गायों और सांडों को सरकारी स्कूल में बंद कर दिया था.
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अब लावारिस पशुओं को कोई छूता तक नहीं
लेकिन क्या इन पशुओं की संख्या अचानक बढ़ी है? पास के ही दुजाना गांव के रहने वाले 63 साल के करणपाल सिंह कहते हैं, "बीते कुछ सालों में जंगल में जानवर ज़्यादा हो गए हैं. जब गायें दूध देना बंद कर देती हैं तो लोग उन्हें खुला छोड़ देते हैं. नई सरकार ने गायों को लेकर सख़्ती की है जिसकी वजह से बाज़ार में बिक भी नहीं पा रही हैं."
वो बताते हैं, "क़रीब 80 आवारा पशु दुजाना गांव में हैं और इतने ही महावण में. ये शाम होते ही समूह बनाकर खेतों में निकलते हैं. जिस खेत में घुसते हैं उसे बर्बाद कर देते हैं."
इन पशुओं से खेतों को बचाने के लिए किसानों को खेतों की तारबंदी का ख़र्च भी उठाना पड़ रहा है. लेकिन ये कंटीले तार भी पूरी तरह कामयाब साबित नहीं हो पा रहे हैं.
किसान करणपाल सिंह कहते हैं, "जानवर तो जानवर हैं, ऊपरवाले ने पेट लगा दिया है उसे वो भरेंगे ही. पेट भरने के लिए तार पार कर खेत में घुसने की कोशिश करते हैं जिससे उन्हें चोट पहुंचती है. उन्हें चोटिल देखकर हमें भी दुख पहुंचता हैं. लेकिन हम क्या करें, फ़सल भी बचानी है."
करणपाल सिंह कहते हैं, "इन आवारा पशुओं की वजह से ठंड के इस मौसम में भी किसानों को रात-रात भर खेतों पर रहना पड़ रहा है. पूरी रात वो इन्हें भगाते रहते हैं. इधर से भगा दिए उधर पहुंच गए. उधर से भगा दिए इधर पहुंच गए. रात भर यही चलता रहता है."
वो कहते हैं, "पहले लावारिस समझकर इन पशुओं को लोग ले जाया करते थे. अब कोई इन्हें हाथ भी नहीं लगाता. वो इनसे बचते हैं. हमारे हिंदुओं में ऐसा है कि हम गाय को नहीं मारेंगे. लेकिन जब ज़्यादा नुक़सान करते हैं तो कुछ लोग इन्हें डंडे या बल्लम से मार भी देते हैं. घायल होने पर इनका इलाज भी कराते हैं."
लेकिन ये गायें जंगल में आती कहां से हैं? इस सवाल पर वो कहते हैं, "जब तक दूध देती हैं किसान इन्हें घर में रखते हैं, जो ब्याहना और दूध देना बंद कर देती हैं तो बाहर निकाल देते हैं. गाय पालने वाले ज़्यादातर किसान ऐसा ही करते हैं. क्योंकि उनके सामने भी मजबूरी होती है. चार-चार जानवरों का पेट कौन भरे. अब कोई इन्हें ले भी नहीं रहा है."
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अपने खेत पर काम करने आईं राजन देवी बर्बाद फसल को दिखाते हुए कहती हैं, "जैसे ही गेहूं कुछ ऊपर उठते हैं आवारा पशु खा जाते हैं. आप देखिए पूरा खेत बर्बाद हो रहा है. कुछ भी कर लो, उसे छोड़ते नहीं है."
"हम किसान लोग हैं, हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि तारबंदी करा सकें, जो फसल में होता है वो खेत में ही लग जाता है, ऊपर का ये ख़र्च कहां से करें."
गायों के प्रति भावुक होते हुए वो कहती हैं, "अब ये बेचारे भी जाएं तो जाएं कहां. न लोगों ने इनके लिए कुछ किया है न सरकार ने. फसल बर्बाद करते हैं तो लोग भी इन्हें इधर से इधर भगाते हैं. हम तो परेशान हैं ही, ये पशु हमसे भी ज़्यादा परेशान हैं."
फ़ायदे का सौदा नहीं रहा गाय पालना
गांव में दूध का व्यापार करने वाले सुनील कुमार कहते हैं, "गाय ग्याबन कम रहती हैं. गाय का दूध डेयरी पर भी कम दाम में बिकता है इसलिए भी लोग गाय कम रखते हैं."
गायों को खुला छोड़ने की वो एक आर्थिक वजह बताते हैं, "भैंसे दूध न दें तो बिक जाती हैं. उनके बच्चे भी बिक जाते हैं. क़साई उन्हें ख़रीद लेते हैं. लेकिन गाय को कोई ख़रीद नहीं रहा है. इस वजह से भी इनकी बेक़द्री हो रही है."
गांव के ही धर्मेंद्र गुर्जर के घर में पांच गायें बंधी हैं. वो गाय पालते तो हैं लेकिन उसका दूध नहीं बेचते हैं. वो कहते हैं, "हम अपने घर के इस्तेमाल के लिए ही गाय पालते हैं. इनसे हमारी कोई कमाई नहीं होती है. जब ये दूध देना बंद कर देंगी तब भी हम इन्हें पालेंगे."
धर्मेंद्र कहते हैं, "हमारी दो गायें चार साल से दूध नहीं दे रही हैं. हमने उन्हें तब भी रख रखा है. गायों को खुला छोड़ने से बहुत नुक़सान हो रहा है. आजकल लोग पशु छोड़ देते हैं. ये बहुत ग़लत है. इससे सिर्फ़ किसानों का ही नहीं बल्कि इन जीवों का भी नुक़सान हो रहा है. लोग इन्हें मारते-पीटते हैं. ये सब अच्छा नहीं है."
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सुनील कुमार कहते हैं कि इससे लोगों में अमानवीय प्रवृति भी बढ़ रही है. वो कहते हैं, "इस समस्या के सबसे बड़े दोषी गाय को छोड़ने वाले ही हैं. गाय जब तक दूध देती है उसका दूध पीते हैं. जब वो किसी तरह से ख़राब हो जाती है तो उसे निकाल देते हैं. जब मनुष्य के मन में इस तरह की भावना बढ़ेगी तो कल वो बूढ़ा होने पर मां-बाप को भी घर से निकाल देगा."
शाम होते ही गांव के लोग हाथों में टार्च और डंडे लेकर खेतों की ओर चल देते हैं. उन्हें ये सर्द रात खेत में ही गुज़ारनी है.
अपने खेत की रखवाली करने जा रहे रविंद्र नागर कहते हैं, "हम पशुओं से बहुत परेशान है. रात भर जंगल में रहना पड़ेगा, जो लागत लगाई है उसे बचाना है. रात को पहरा देना मुश्किल है. दिन में दूर का दिख जाता है लेकिन रात में देखने में भी दिक्कत होती है. ये डबल ड्यूटी करनी पड़ रही है."
आवारा पशु रविंद्र के खेत में पहुंचेंगे तो वो उन्हें किसी और के खेत में खदेड़ देंगे. और ये सिलसिला चलता रहेगा. क्योंकि सभी को अपनी फ़सल बचानी है और इन पशुओं के लिए फिलहाल कोई ठिकाना नहीं.
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