आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को पार्टी से निकालकर क्या संदेश दिया है?
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
'पीएम वाले ख़्वाब' को समेटकर सीएम वाली हक़ीक़त में सिमट चुके नीतीश कुमार से क्या उसूलों पर डटे रहने की उम्मीद रखनी चाहिए?
एक टर्म और मुख्यमंत्री रह पाने के लिए बेरोकटोक समर्थन का आश्वासन अमित शाह से मिलते ही ना-नुकुर वाले नीतीश कुमार 'हाँ हुज़ूर की मुद्रा' में क्यों आ गए?
ऐसे सवाल पूछने वाले बताएँ कि सत्ता से चिपके रहने के सिवा अब और क्या दिखाती या सिखाती है भारतीय राजनीति ?
निश्चित को छोड़ अनिश्चित की ओर भला क्यों जाएँगे नीतीश कुमार? इसीलिए तो अब उनके किसी उसूल और वायदे को लेकर उनसे सवाल-जवाब करना, उन्हें नाक़ाबिले-बर्दाश्त हो गया है.
देश की केंद्रीय सत्ता पर क़ाबिज़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) यह ज़मीनी सच्चाई समझ चुकी है कि बिहार में वह अकेले सरकार बना लेने जैसी स्थिति में अभी भी नहीं हैं.
इसी तरह जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को भी पता है कि फ़िलहाल बीजेपी के सहारे ही उसका सत्ता-नेतृत्व बिहार में बना रह सकता है, क्योंकि अब राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ उसके गठबंधन की कोई गुंजाइश बची नहीं है.
इसलिए कुछ वैचारिक खींचतान के बावजूद बीजेपी और जेडीयू का एक साथ बने रहना इन दोनों के परस्पर सियासी हितों से जुड़ी एक मजबूरी भी है.
पहले भी हुआ है ऐसा
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि नीतीश कुमार की सियासी छवि को उनके ही तरकश के तीर ने गहराई तक खरोंचा है.
पहले भी लोगों ने कई कट्टर नीतीश प्रेमियों को उनका घोर निंदक बनते देखा है.
अगर यह सच है कि नीतीश कुमार के शिकार हुए लोगों में उनके क़रीबियों की तादाद ज़्यादा है, तो सच ये भी है कि उनका वफ़ादार बने रहने वाले समझदार भी कम नहीं हैं.
वैसे ज़ाहिर है कि अति-उत्साह में बाँहें फैला कर, गले लगा कर, चमत्कारी बताकर नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर और पवन वर्मा को अपनी पार्टी में जो ओहदा बख़्शा, वह पहले से समर्पित वफ़ादारों को पच नहीं रहा था.
हो सकता है नीतीश ने ऐसा इसलिए भी किया हो कि वे अपने कुछ मनबढ़ू क़रीबियों को 'ज़्यादा उड़िये मत' वाला मैसेज देना चाहते हों.
सियासत की फ़ितरत देखिए, कि जब पवन और प्रशांत सिर्फ़ इवेंट मैनेजर और छवि-प्रचारक जैसा काम करते रहने के बजाय महत्वाकांक्षी नेता जैसी हसरत पाल बैठे, तो नीतीश को रणनीतिकार नहीं बेकार लगने लगे.
पार्टी से निकाल बाहर किये गए इन दोनों को अब अगर जेडीयू प्रवक्ता 'कोरोना वायरस' कहते हैं, तो वे दिन याद आ जाते हैं, जब प्रशांत के फ़रमान पर जेडीयू के कई बड़े-बड़े भी सिर झुकने लगे थे.
झुकने की कला
इतना ही नहीं, जब बीजेपी को डराना होता था, तब यही नीतीश-दूत कोलकाता, चेन्नई, मुंबई समेत अन्य जगहों का दौरा करके बीजेपी विरोधी मोर्चे में अपने 'आका' के लिए संभावनाएँ तलाशने का खेल खेलता था.
लेकिन आगामी बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अधिक चुनावी सीटों से लेकर मुख्यमंत्री के चेहरे तक से जुड़े मसलों पर बीजेपी झुकी तो नागरिकता वग़ैरह मुद्दों पर नीतीश भी झुके.
ऐसे में अब क्या ज़रूरत थी उन सवालों की जिन्हें प्रशांत और पवन मना करने के बावजूद बार-बार उठाते जा रहे थे?
मतलब साफ़ है कि इन दोनों की पहले जैसी ज़रूरत रही नहीं और इन्हें भी अपना इस्तेमाल गँवारा नहीं हुआ.
नीतीश कुमार को जिसने भी खिसिया कर बोलते हुए देखा-सुना है, उन्हें अंदाज़ा होगा कि निजी चर्चा को सार्वजनिक कर देने और 'झूठ बोलने' या 'स्तर गिराने' जैसे कटु आरोपों पर वे किस क़दर बौखलाए होंगे.
हालाँकि पवन वर्मा और प्रशांत किशोर की तरफ़ से और कई चौंकाने वाले ख़ुलासे का ख़तरा अभी टला नहीं है. पर इससे फ़र्क़ क्या पड़ेगा?
अपनी बड़ी-से-बड़ी चूक या विफलताओं पर उठने वाले गंभीर सवालों को भी घुमा देने वाले माहिर नेताओं की कमी थोड़े ही है.
अब कौन ऐसा नेता है जो सत्ता की रसीली थाली सामने से सरका कर सिर्फ़ सेक्यूलर अचार चाट कर रह लेगा?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)