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कोरोना वायरस काल में राहुल गांधी की बातों की कितनी अहमियत है? - नज़रिया
- Author, अपर्णा द्विवेदी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
राहुल गांधी आजकल मोदी सरकार पर एक नए अंदाज़ में हमले कर रहे हैं.
चाहे मामला केंद्र सरकार के कर्मचारियों के भत्ते का हो, या फिर वित्त मंत्री से बैंक चोरों की मुद्दे पर सवाल हो या फिर कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को लेकर सवाल उठाते राहुल गांधी मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं.
हालांकि कांग्रेस फ़िलहाल बहुत मज़बूत स्थिति में नहीं है. देश भर में कांग्रेस आठ राज्यों में सत्ता पक्ष में बैठी है जिनमें तीन राज्य - राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब में कांग्रेस की अपनी सरकार है जबकि पांच राज्यों में वो गठबंधन का हिस्सा है.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने हाल फ़िलहाल में सत्ता पाकर खोई है. कई लोगों का मानना है कि राहुल गांधी की अमेठी लोकसभा चुनाव में हार का असर उनकी राजनैतिक स्थिति पर पड़ेगा. लेकिन कोरोना काल में राहुल गांधी ने अपनी प्रासंगिकता को नए सिरे से स्थापित किया.
कोरोना संकट की चेतावनी
राहुल गांधी भारत में पहले नेता बने जिन्होंने कोरोना को लेकर चेतावनी देनी शुरू कर दी. वो भी उस समय जब मोदी सरकार अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत की तैयारी में लगी थी.
कोरोना संकट की आहट पर राहुल गांधी ने 12 फ़रवरी 2020 को पहली बार ट्वीट कर बोला था कि कोरोना की गंभीरता को सरकार समझ नहीं रही है. और मोदी सरकार ने क़रीब एक महीने बाद इस पर तत्परता से काम करना शुरू किया.
मोदी सरकार पर आरोप ये भी है कि उन्होंने मध्य प्रदेश की सरकार को गिराने के काम की वजह से लॉकडाउन को देरी से लागू किया.
राहुल गांधी ने कोरोना संकट में लोगों की हित और अर्थव्यवस्था प्रभावित होने की बात कही. साथ ही केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वो बैंक से लोन लेकर भागने वालों को बचाने में लगी है.
हाल ही में राहुल ने एक बार फिर 28 अप्रैल को अपने एक पुराने वीडियो को साझा करते हुए एक ट्वीट पोस्ट किया जिसमें उन्होंने संसद में सरकार से देश के शीर्ष 50 बैंक लोन डिफ़ॉल्टर की सूची मांगी थी और वित्त मंत्री ने जवाब देने से इनकार कर दिया था.
राहुल गांधी ने आरबीआई का हवाला देते हुए, फ़रार व्यापारियों में नीरव मोदी और मेहुल चोकसी का नाम लिया और उन्हें बैंक चोर और बीजेपी का दोस्त बताया.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जब आरबीआई ने मेहुल चौकसी और नीरव मोदी को बैंक डिफ़ॉल्टर की सूची में डाला तो सरकार संसद में सच को क्यों छुपा रही थी. राहुल गांधी को ट्विटर पर आंकड़ों का समर्थन भी मिला.
राहुल गांधी के इस ट्वीट ने मोदी सरकार को परेशान किया. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोप को ख़ारिज करने के लिए 13 ट्वीट किए. इनमें भले ही राहुल गांधी पर आरोप लगाए गए लेकिन इतना तो तय है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर बैकफ़ुट पर खेलती नज़र आई.
हाल में चल रहे कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान भी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी और नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कई मुद्दों पर सवाल उठाते और सुझाव देते नज़र आए.
मंहगाई भत्ता रोकने का मुद्दा
कोरोना संकट को देखते हुए हाल ही में केन्द्र सरकार के केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशन भोगियों का महंगाई भत्ता रोकने का फ़ैसला किया. इस फ़ैसले को राहुल गांधी ने 'असंवेदनशील और अमानवीय' बताया.
उन्होंने ट्वीट कर सुझाव दिया और आरोप भी लगाए. उन्होंने लिखा, ''लाखों करोड़ की बुलेट ट्रेन परियोजना और सेंट्रल विस्टा सौंदर्यीकरण परियोजना को टालने की बजाय कोरोना से जूझकर जनता की सेवा कर रहे केंद्रीय कर्मचारियों, पेंशन भोगियों और देश के जवानों का महंगाई भत्ता (DA) काटना सरकार का असंवेदनशील तथा अमानवीय निर्णय है.''
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बाकयदा आंकड़े भी दिए जिसके अनुसार महंगाई भत्ते में कटौती से 37,530 करोड़ बचाएगी जबकि सरकार कोरोना वायरस महामारी के बावजूद 20,000 करोड़ रुपये की लागत वाली सेंट्रल विस्टा परियोजना और 1,10,000 करोड़ रुपये की लागत वाली बुलेट ट्रेन परियोजना पर रोक नहीं लगाई.
साथ ही फिज़ूल के सरकारी ख़र्चों में कटौती की घोषणा भी नहीं की, जिससे 2,50,000 करोड़ रुपये सालाना बच सकते हैं.
हालांकि सरकार ने राहुल गांधी के आरोप और सुझाव दोनों पर चुप्पी साध रखी है.
अर्थव्यवस्था के संकट पर सवाल
राहुल गांधी काफी समय से मीडिया पर भी सवाल उठाते थे कि मीडिया सही सवाल नहीं पूछती. भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट पर मीडिया की बेरुखी से परेशान राहुल गांधी ने रिजर्व बैक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से वीडियो के ज़रिए बातचीत की और उनसे सुझाव मांगा.
इस बातचीत की सबसे बड़ी खासियत थी कि राहुल गांधी ने सरकार पर कोई आरोप नहीं लगाया बल्कि आम लोगों के हितों पर चर्चा की. चूंकि ये चर्चा जाने-माने भारतीय अर्थशास्त्री रघुराम राजन से की तो उनकी बातों में वज़न भी दिखा.
साफ शब्दों में उन्होंने पूछा कि गरीबों की मदद करने में कितना पैसा लगेगा? राजन ने कहा, 65,000 करोड़ रुपये लगेंगे और ये हो सकता है.
ख़ास बात ये है कि राहुल गांधी अपनी तरफ से केन्द्र सरकार से इतनी बड़ी राशि की मांग करते तो शायद उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय रूप से पहचाने जाने वाले रघुराम राजन के आंकड़ों की बात करते तो उनकी बात का वज़न बढ़ जाता है.
राहुल गांधी अब मोदी ब्रांड से सीख भी रहे हैं. अपनी बात लोगों तक कैसे पहुंचाना है उसके लिए तकनीक और स्टाइल दोनों बदल रहे हैं. कोरोना काल में राहुल गांधी अपने आप को लोगों की आवाज उठाने वाले व्यक्ति के रूप में पेश कर रहे हैं जो देश और लोगों की हितों की बात कर रहा है.
लोगों से दिल और जेब से जुड़े सवाल पर राहुल गांधी के सवाल जवाब राजनैतिक रूप से क्या लाभ देंगे ये तो समय बताएगा लेकिन राहुल गांधी अपनी अहमियत साबित करने की एक और कोशिश करते जरूर दिख रहे हैं.
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