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कश्मीर: रियाज़ नाइकू के बारे में वो बातें जो मालूम हैं
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
भारत प्रशासित कश्मीर में 6 मई को सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में हिज़बुल मुजाहिदीन के शीर्ष चरमपंथी रियाज़ नाइकू की मौत हो गई.
नाइकू ने क़रीब आठ साल पहले चरमपंथी संगठन ज्वाइन किया था. नाइकू के ऊपर 12 लाख रुपये का ईनाम रखा गया था.
चरमपंथ का रास्ता
रियाज़ नाइकू का परिवार श्रीनगर से दक्षिण में 35 किलोमीटर दूर अवंतीपोरा का रहने वाला है.
रियाज़ नाइकू के करीबियों का कहना है कि बचपन में नाइकू को पेंटिंग करने का शौक था. नाइकू ने साइंस साइड से ग्रेजुएशन किया था.
2008 में अमरनाथ तीर्थयात्रा बोर्ड को राज्य की ज़मीन दिए जाने के विरोध में पूरे कश्मीर की सड़कों पर भारी प्रदर्शन हुए थे. इसके दो साल बाद नाइकू को क़ानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.
6 जून 2012 वह अचानक बेगपोरा के अपने घर से गायब हो गए.
नाइकू के गायब होने पर लोगों का मानना था कि नाइकू चरमपंथी संगठनों से जुड़ने के लिए घर से भागे.
हिज़बुल मुजाहिदीन की गोलबंदी
हिज़बुल मुजाहिदीन घाटी में सक्रिय सबसे बड़ा चरमपंथी संगठन है.
हिज़बुल मुजाहिदीन का नेतृत्व पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में बैठे 70 साल के मोहम्मद युसूफ़ उर्फ़ सैयद सलाहुद्दीन के हाथ में है. यह संगठन पाकिस्तान समर्थक इस्लामी राष्ट्रवादी गुट जमात-ए-इस्लामी से अपने कैडरों की भर्ती करता है.
हिज़बुल मुजाहिदीन ने 1999 से 2000 के बीच कश्मीर में सुरक्षाबलों पर कई घातक हमले किए थे.
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हिज़बुल मुजाहिदीन का रणनीतिकार
कश्मीर में प्रदर्शन के दौरान रियाज़ नाइकू को गिरफ़्तार किया गया था, उस वक्त हिज़बुल को वहां के चरमपंथी आंदोलन में हाशिये की ताकत माना जाता था.
चरमपंथियों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन की अगुआई करने वाले एक शीर्ष अधिकारी ने कहा, "एक तरह से वह हिज़बुल का रणनीतिकार था. उसने कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपने गुट को दोबारा संगठित किया और इसमें कई नौजवानों को भर्ती किया. कश्मीर में जब बुरहान वानी चरमपंथ के पोस्टर ब्वॉय के तौर पर पर उभरा तो उस वक्त नाइकू भी फील्ड में था. लेकिन उसने कमान वानी के हाथ थमा रखी थी और खुद पर्दे के पीछे से रणनीति तय करता रहा था."
2016 में बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद रियाज़ ने सब्ज़ार को कमान थमाई. लेकिन जल्दी ही सब्ज़ार भी सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया.
बुरहान की मैय्यत में रियाज़ को जंगी पोशाक पहने, एके-47 लहराते देखा गया था. यह वीडियो खूब वायरल हुआ था.
सुरक्षा एजेंसियों को लग रहा था कि अब नाइकू ही संगठन की कमान संभालेगा लेकिन उसने आईटी ग्रेजुएट ज़ाकिर मूसा को आगे बढ़ा दिया.
मगर जल्दी ही ज़ाकिर इससे ज़्यादा उग्र चरमपंथी संगठन अल कायदा से जुड़े गुट अंसार गज़वातुल हिंद (AGH) में चला गया. ज़ाकिर के अपने छह समर्थकों के साथ एजीएच में जाने के बाद 2017 में नाइकू ने हिज़्बुल की कमान संभाल ली.
अलग छवि
शुरुआती सालों में पर्दे के पीछे रहने वाले नाइकू ने हाल के सालों में कुछ ऑडियो मैसेज जरूर जारी किए थे. इन संदेशों में कश्मीर पुलिस को सेना के 'ऑपरेशन ऑलआउट' से दूर रहने को कहा गया था.
पुलिस ने अपने एक बयान में नाइकू पर कई पुलिसकर्मियों की हत्या करने का आरोप लगाया था. उस पर पिछले साल कश्मीर के बाहर के कुछ ट्रक ड्राइवरों की भी हत्या का आरोप लगा था.
लेकिन उसके गांव के कई लोगों का कहना है कि वह हत्यारा नहीं था.
श्रीनगर में रहने वाले एक विश्लेषक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ज़ाकिर मूसा से वैचारिक मतभेद के बावजूद उसने उसके संगठन से कोई टकराव नहीं मोल लिया.
नेतृत्व का संकट
कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि सबसे लंबे समय से चरमपंथी आंदोलन में सक्रिय हिज़्बुल के पास अब नेतृत्व की कोई निश्चित कड़ी नहीं दिखती. नाइकू समेत पिछले कुछ वर्षों में इसके शीर्ष 16 कमांडर मारे जा चुके हैं.
उग्रवाद के ख़िलाफ़ जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन से जुड़े एक अफसर ने कहा, "कश्मीर में लश्कर-ए-तैय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद नए सिरे से खुद को गोलबंद करने में लगे हैं. वो द रेजिस्टेंस फ्रंट (RTF) जैसे नाम से खुद को फिर संगठित कर रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में शीर्ष पर रहे कई चरमपंथी नेताओं की मुठभेड़ में मौत हो चुकी है. लिहाजा अब नई भर्तियों की बाढ़ आने वाली है. बुरहान वानी की मौत के बाद भी ऐसा ही हुआ था. वानी को सुपुर्दे खाक किए जाने के बाद चरमपंथी गुटों में बड़ी तादाद में नौजवान शामिल हुए थे."
वहीं दूसरी ओर गुरुवार को हिज़्बुल के सुप्रीम लीडर सैयद सलाहुद्दीन का एक वीडियो जारी हुआ है जिसमें नाइकू को मोहम्मद बिन कासिम का दर्जा देते हुए देखा गया. आठवीं सदी के मुस्लिम लड़ाके मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर फतह हासिल की थी.
क्या ख़त्म हो पाएगा चरमपंथ?
जुलाई, 2016 में जब बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत हुई थी तो पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चेतावनी दी थी, "मेरी बात को गांठ बांध लीजिये. सोशल मीडिया के ज़रिये उसने जो किया है, उससे भी ज़्यादा वह अपनी कब्र से काम करेगा. अब चरमपंथी गुटों में और ज्यादा लोग भर्ती होंगे."
उनके ट्वीट का मतलब यह था कि कब्र में पड़ा चरमपंथी नेता, जेल में ज़िंदा चरमपंथी नेता से अधिक ख़तरनाक होता है.
लेकिन नाइकू की मौत को लेकर उमर ने लोगों को चेतावनी दी. उन्होंने ट्वीट कर कहा, "रियाज़ नाइकू की नियति उसी दिन तय हो गई थी, जिस दिन उसने बंदूक उठा कर हिंसा और चरमपंथ का रास्ता अपना लिया था. उसकी मौत को हिंसा भड़काने और प्रदर्शन का बहाना नहीं बनने देना चाहिए. ऐसा करने पर काफी लोग खतरे में पड़ जाएंगे."
आला पुलिस अफ़सरों का मानना है कश्मीर का 30 साल पुराना हथियारबंद चरमपंथ अभी खत्म नहीं हुआ है.
वो कहते हैं, “ हमारे सामने एक ऐसा पड़ोसी है जो हमारे यहां चरमपंथी आंदोलनों को बढ़ावा देने की किसी साज़िश से चूकना नहीं चाहता.”
एक आला पुलिस अफसर ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि नाइकू का मारा जाना एक बड़ी सफलता है. इसने चरमपंथी नेताओं का हौसला तोड़ा है. लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर के अंदर चरमपंथियों को शह देना नहीं छोड़ा है. भारत की यह दो मोर्चों की लड़ाई है. अभी भी यहां 100 से ज्यादा चरमपंथी सक्रिय हैं.”
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