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कोरोना वायरस महामारी के बीच भारत में मज़दूरों के अधिकारों पर चोट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
मज़दूर संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि औद्योगिक क्रांति से पहले जिन हालात में मज़दूरों को काम करने पर मजबूर होना पड़ता था, देश के कुछ प्रमुख राज्यों में मज़दूरों के लिए कुछ वैसे ही हालात हो जाएंगे.
वे ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि देश के कई राज्यों ने कोरोना से लड़ने के नाम पर श्रम क़ानून के कई प्रावधानों को तीन सालों के लिए ताक पर रख दिया है, यानी उद्योगपतियों और मालिकों को छूट दे दी गई है वे मज़दूरों की बेहतरी के लिए बनाए गए क़ानूनों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं.
इसमें सबसे अहम फ़ैसला उत्तर प्रदेश की सरकार ने बुधवार को अपने मंत्रिमंडल की बैठक में लिया, जिसमें तय किया गया कि ऐसा 'प्रदेश में निवेश को बढ़ावा देने के लिए' किया जा रहा है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जारी किए गए बयान में कहा गया कि अब राज्य में श्रमिकों से जुड़े सिर्फ़ तीन क़ानून ही लागू होंगे, बाक़ी सारे क़ानून तीन साल के लिए प्रभावी नहीं रहेंगे.
ये क़ानून हैं--भवन और निर्माण श्रमिक क़ानून, बंधुआ मज़दूरी विरोधी क़ानून और श्रमिक भुगतान क़ानून की पांचवीं अनुसूची.
बारह घंटों की पाली
बदली हुई परिस्थितियों में अब मज़दूरों को 12 घंटे की पाली में काम करना पड़ेगा.
हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में भी मज़दूरों को आठ के बजाय 12 घंटों की पाली में काम करना पड़ेगा.
उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आरके तिवारी ने मंत्रिमंडल के फ़ैसले के बारे में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि अब प्रदेश के बहुत सारे प्रवासी मज़दूर वापस अपने घरों को लौट रहे हैं. इसका मतलब है कि सबको रोज़गार की ज़रूरत पेश आएगी.
उसी तरह मध्य प्रदेश सरकार ने तो श्रमिक अनुबंध क़ानून को 1000 दिनों के लिए निरस्त करने का फ़ैसला किया है.
इसके अलावा 'औद्योगिक विवाद क़ानून' और 'इंडस्ट्रियल रिलेशंस एक्ट' को भी निरस्त कर दिया है.
मालिक की ज़िम्मेदारी
मध्य प्रदेश ने जो फ़ैसला लिया है वो मौजूदा औद्योगिक इकाइयों और नई खुलने वाली इकाइयों के लिए भी है.
मज़दूरों के काम की जगह को ठीक हालत में रखना मालिक की ज़िम्मेदारी है.
उन्हें कुछ बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना भी उनका क़ानूनी दायित्व रहा है लेकिन अब ऐसा नहीं रह जाएगा.
राज्य सरकारों ने उद्योगपतियों को उन ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर दिया है जो अब तक क़ानूनन उन्हें माननी पड़ती थीं.
कुछ प्रावधानों पर नज़र डालें जब अगले तीन साल तक के लिए निरस्त कर दिए गए हैं.
- काम की जगह या फैक्ट्री में गंदगी पर कार्रवाई से राहत
- वेंटिलेशन या हवादार इलाक़े में काम करने की जगह नहीं होने पर कोई कार्रवाई नहीं
- किसी मजदूर की अगर काम की वजह से तबीयत ख़राब होती है तो फैक्ट्री के मैनेजर को संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करना होगा
- शौचालयों की व्यवस्था नहीं होने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होगी
- इकाइयां अपनी सुविधा के हिसाब से मज़दूरों को रख सकती हैं और निकाल सकती हैं वो भी अपनी ही शर्तों पर
- बदहाली में काम करने का न तो श्रमिक अदालत संज्ञान लेगी और ना ही दूसरी अदालत में इसको चुनौती दी जा सकती है.
भोपाल गैस त्रासदी के बाद
इसके अलावा श्रमिकों के लिए रहने और आराम करने की व्यवस्था या महिला श्रमिकों के लिए बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच भी बनाना नई कंपनियों के लिए अनिवार्य नहीं होगा.
और न ही इन इकाइयों का कोई सरकारी सर्वेक्षण ही किया जाएगा.
मध्य प्रदेश ने वर्ष 1982 में भोपाल गैस त्रासदी के बाद एक श्रमिक कल्याण कोष की स्थापना की थी जिसके तहत हर साल कंपनियों को प्रत्येक मज़दूर के हिसाब से 80 रुपये जमा करने अनिवार्य थे.
अब इस व्यवस्था को भी समाप्त करने का फैसला लिया गया है.
नए नियमों के प्रस्ताव को लेकर श्रमिक संगठन उद्वेलित हैं. उनका कहना है कि इससे एक बार फिर औद्योगिक क्रांति से पहले जैसे हालात पैदा हो जाएंगे.
उनका आरोप है कि श्रमिकों को बंधुआ मजदूरी की तरफ धकेला जा रहा है.
बंधुआ मजदूर जैसा बर्ताव
भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सचिव राजीव अरोड़ा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जल्द ही सभी ट्रेड यूनियन इन फ़ैसलों को अदालत में चुनौती देंगी.
अरोड़ा कहते हैं कि लंबे संघर्ष के बाद मज़दूर अपनी स्थिति को बेहतर करने की कोशिश में लगे थे.
लेकिन सरकारों ने महामारी का सहारा लेते हुए 'श्रम क़ानून' को मालिकों के पास गिरवी रख दिया है.
वहीं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने ट्वीट कर कहा, "ये तो बंधुआ मजदूर जैसा बर्ताव करने से भी ख़राब है. क्या भारत का संविधान अस्तित्व में हैं? क्या देश में कोई क़ानून मौजूद है? भारतीय जनता पार्टी की सरकार हमें आदिम काल में धकेल रही है. इसका जमकर विरोध होगा."
उन्होंने एक ट्वीट में मध्य प्रदेश का ज़िक्र करते हुए कहा था कि भोपाल गैस त्रासदी के बाद जो श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए जो क़ानून बनाए गए थे वो सबके कल्याण के लिए थे.
श्रम क़ानून में बदलाव
येचुरी कहते हैं कि महामारी नाम पर करोड़ों मजदूरों की 'ज़िंदगियों को जोखिम में डालकर मुनाफ़ाखोरी को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है.
हालांकि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के फ़ैसलों पर केंद्र सरकार ने अभी तक मुहर नहीं लगाई है.
केंद्र सरकार के अनुमोदन के बाद ही सभी राज्यों ने जो श्रम क़ानून में बदलाव लाने के प्रस्ताव रखे हैं, वो लागू हो जाएंगे.
मगर इससे पहले इन्हें चुनौती देने के लिए श्रमिक संगठन अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी में हैं.
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