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राजस्थान: क्या गहलोत की गुज़ारिश ठुकरा सकते थे राज्यपाल?
राजस्थान की राजनीति का संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. सचिन पायलट की ओर से पार्टी में बगावत करने के बाद से सरकार के पास बहुमत है कि नहीं इसे लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है.
एक तरफ राज्यपाल कलराज मिश्र ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का विशेष सत्र बुलाने का प्रस्ताव कई बार खारिज किया तो दूसरी ओर बीएसपी के जिन छह विधायकों का कांग्रेस में विलय हो गया है उनके लिए बीएसपी ने व्हिप जारी किया है.
राज्यपाल ने आख़िर विधानसभा सत्र बुलाने के लिए सरकार के संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दे दी और 14 अगस्त को विधानसभा का सत्र बुलाने की अनुमति दे दी है.
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान संविधानिक अधिकारों के उपयोग को लेकर बार-बार सवाल खड़े हो रहे हैं.
इस बाबत बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली ने संविधान विशेषज्ञ फ़ैजान मुस्तफ़ा से बात की और उनसे जानना चाहा कि राजस्थान की राजनीति में संविधान और संसदीय परंपरा के अनुरूप क्या कुछ होने की संभावना है और क्या कुछ अभी चल रहा है.
सदन का सत्र बुलाने को लेकर राज्यपाल के पास किस तरह के अधिकार होते हैं?
सदन बुलाने को लेकर राज्यपाल के पास कोई विशेषाधिकार नहीं है. जो मुख्यमंत्री तारीख तय करेंगे और जो एजेंडा बताएंगे वो एडवाइज़री काउंसिल से होकर आएगा, उसे राज्यपाल को मानना पड़ता है. लेकिन जब कोई सरकार अल्पमत में आ गई, और मुख्यमंत्री राज्यपाल को लिखकर नहीं भेज रहा, तब राज्यपाल कह सकता है कि आप किसी मुकर्रर दिन तक अपना विश्वासमत हासिल कर लीजिए.
राज्यपाल के यह कहने पर भी मुख्यमंत्री फिर राज्यपाल को उस तारीख से पहले लिखेंगे कि इस दिन सदन का सत्र बुलाया जाए तो फिर सत्र बुलाया जाएगा. जो निर्वाचित मुखिया है दरअसल सदन के सत्र बुलाने का अधिकार उसका है क्योंकि वो सदन के प्रति उत्तरदायी है ना कि राज्यपाल.
इसलिए जो ये राजस्थान के राज्यपाल कर रहे थे, वो तमाम संसदीय और संविधानिक मान्यताओं और परंपराओं के ख़िलाफ़ था, इसमें कहीं से भी कोई दो राय नहीं है. वो इसमें देर कर रहे थे और कह रहे थे 21 दिनों का नोटिस दीजिए. हमने कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और कितनी ही जगहों पर देखा है कि कैसे 24 या 48 घंटों के अंदर में विश्वास मत हासिल करने के लिए कहा गया है.
ऐसा लगता है कि राजस्थान के राज्यपाल एक तरह से सचिन पायलट को मदद पहुँचा रहे थे. 21 दिनों का नोटिस देने पर उन्हें समय मिल जाएगा. सदन जैसे ही शुरू होगा और किसी बिल पर वो वोट नहीं देंगे तो फिर उन्हें सदन के लिए अयोग्य ठहरा दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में तो राज्यपाल को कहना चाहिए था कि यह विवाद पैदा हो गया और इतने विधायक आपका साथ छोड़ कर चले गए हैं इसलिए आप जल्द से जल्द विश्वासमत हासिल कीजिए.
राज्यपाल की विश्वासमत हासिल करने के लिए सरकार को बुलाने में जो हिचक थी वो साफ़ दिखाती है कि वो सचिन पायलट की मदद कर रहे थे और यह मदद आखिरकार बीजेपी की मदद होगी क्योंकि उनके पास सदन में बड़ा नंबर है. यह एक ऐसी राजनीति हो रही थी जिसमें संविधान की मर्यादा को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया था.
बीएसपी प्रमुख मायावती ने कांग्रेस में गए छह विधायकों पर व्हिप जारी किया है और कहा है कि वो कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाएँगी. इस मामले पर संविधानिक स्थिति क्या है?
पहली बात तो यह कि बीएसपी इतनी देर से यह सवाल क्यों खड़ा कर रही है? अभी राज्यसभा का चुनाव हुआ, उसमें उन्होंने व्हिप क्यों नहीं जारी किया? हर राजनीतिक पार्टी व्हिप जारी करती है. इसका मतलब यह है कि उन्होंने इस विलय को मान लिया था.
दूसरी बात यह कि मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे ने सचिन पायलट की तरफ से यह दलील दी है कि सदन का चूंकि सत्र नहीं चल रहा तो फिर व्हिप जारी नहीं हो सकता है.सदन का सत्र अभी भी तो नहीं चल रहा है तो फिर व्हिप जारी कैसे किया? उस हिसाब से यह भी ग़लत है.
तीसरी बात यह कहना भी ग़लत है कि पार्टी जब तक राष्ट्रीय स्तर पर विलय ना करे तब तक किसी राज्य में पार्टी के विधायक दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकते. इस हिसाब से तो फिर गोवा में 15 में से जो 10 कांग्रेस के विधायक बीजेपी में चले गए तो वो भी ग़लत हुआ और फिर वो सरकार भी गलत तरीके से अस्तित्व में है. इसी तरह से तेलंगाना में दो साल पहले टीआरएस में कांग्रेस के विधायकों का विलय हो गया था. वो भी ग़लत हुआ. कितने ही राज्यों में पूरा विधायक दल या फिर दो तिहाई विलय कर जाते हैं. अभी तक ऐसी बात नहीं हुई है जिसमें यह कहा जाए कि स्थानीय स्तर पर विलय को नहीं माना जाएगा जब तक कि राष्ट्रीय स्तर पर विलय ना हो.
मायावती पहले भी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मदद से तीन बार सरकार बना चुकी हैं तो उनका यह कदम सचिन पायलट और उनकी मदद से बीजेपी को मदद पहुँचाने की कोशिश है.
राजस्थान में बीजेपी के विधायक मदन दिलावर ने बसपा के छह विधायकों के कांग्रेस में जाने के ख़िलाफ़ 16 मार्च को विधानसभा अध्यक्ष के पास याचिका दी थी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया. अब उन्होंने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी है. स्पीकर का क़दम सही था?
इसका औचित्य नहीं बनता है. जो पार्टी प्रभावित हुई है उसे कोर्ट में जाकर कहना था कि स्पीकर का फै़सला सही नहीं था. स्पीकर के विलय के फै़सले को आप चुनौती दे सकते हैं. लेकिन इसे चुनौती देने के लिए बसपा का व्हिप जारी करने वाला प्रतिनिधि जाएगा कोर्ट में. लेकिन राजस्थान के मामले में जब बसपा के सारे सदस्य ही चले गए हैं दूसरे खेमे में तो चुनौती देने वाला बचा कौन है?
यह सब उलझाने के लिए किया जा रहा था ताकि ज्यादा वक़्त मिल जाए और गहलोत की तरफ से टूटकर कुछ और विधायक उस तरफ चले जाए. बीजेपी गहलोत सरकार को गिराना चाहती है, इसमें कोई परेशानी नहीं है. वो एक राजनीतिक पार्टी है और उसका पूरा हक़ है ऐसा करने का लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में ऐसा नहीं लगना चाहिए कि आपने संविधान और संसदीय परंपरा को पूरी तरह से ताक पर रख दिया है.
राज्यपाल को 24 घंटे की नोटिस पर सदन बुला कर विश्वासमत हासिल करने को कहना चाहिए था.
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