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मिथुन चक्रवर्ती: कितनी कामयाब रहेगी राजनीति में दूसरी पारी?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
अपने लंबे फिल्मी करियर में राजनेता की भूमिका तो वे दर्जनों बार निभा चुके हैं और इसके लिए प्रशंसकों की सराहना भी बटोरी है.
कभी लेफ्ट के करीबी रहे गरीबों के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती के बरास्ता टीएमसी अब बीजेपी तक के सफर की तुलना उनकी किसी पुरानी हिट फिल्म के नए अवतार में रिलीज होने से की जा सकती है.
ये बात दीगर है कि रील लाइफ में उन्होंने अपनी फिल्मों में भले राजनेता की भूमका में अपनी छाप छोड़ी हो, रीयल लाइफ़ ने राजनीति उनको कभी रास नहीं आई.
ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि बीते करीब पांच वर्षों से सक्रिय राजनीति से दूरी बना चुके मिथुन ने दोबारा राजनीति में आने और खेमा बदलने का फैसला क्यों किया.
राज्य में अब भी उनके प्रशंसकों की खासी तादाद है.
प्रणब मुखर्जी के समर्थन में प्रचार
लेकिन टीएमसी की राज्यसभा की सदस्यता बीच में ही छोड़ने वाले मिथुन क्या प्रशंसकों की भीड़ को बीजेपी के वोट बैंक में तब्दील कर पाएंगे, राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी पूछा जा रहा है.
लेफ्ट के करीबी रहते कांग्रेस उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के समर्थन में प्रचार, उसके बाद टीएमसी के कोटे से राज्यसभा जाने और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में बीजेपी का दामन थाम कर मिथुन ने इस कहावत को एक बार फिर चरितार्थ कर दिया है कि राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता है.
राज्य में लेफ्ट फ्रंट की सरकार के दौर में मिथुन की गिनती सीपीएम और खासकर तब परिवहन मंत्री रहे सुभाष चक्रवर्ती के सबसे करीबी लोगों में होती थी.
उनको अक्सर कई कार्यक्रमों में एक साथ देखा गया था. वर्ष 1986 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार के दौरान ही उन्होंने कोलकाता में होप-86 नामक एक शानदार कार्यक्रम भी आयोजित किया था.
मिथुन कई बार खुद को वामपंथी बता चुके हैं. बाद में उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर लोकसभा क्षेत्र में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के पक्ष में प्रचार किया था.
चिटफंड घोटाले में नाम
तब उन्होंने प्रणब मुखर्जी के साथ कई चुनावी रैलियों में शिरकत कर लोगों से उनके पक्ष में वोट डालने की अपील की थी.
वर्ष 2011 में लेफ्ट का शासन खत्म होने के बाद वे धीर-धीरे तृणमूल कांग्रेस के करीब आए.
दो-तीन साल के दौरान बनी आपसी समझ और रिश्ते मजबूत होने के बाद टीएमसी प्रमुख औऱ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनको राज्यसभा में उम्मीदवार बनाया और वे जीत कर ऊपरी सदन पहुंचे थे.
लेकिन उसके कुछ समय बाद ही शारदा चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद मिथुन परेशान हो गए. वैसे, अपने कार्यकाल के दौरान भी संसद में उनकी उपस्थिति बहुत कम ही रही.
क़रीब तीन साल तक राज्यसभा का सदस्य रहने के दौरान वे महज तीन बार ही संसद में गए थे.
राजनीति से संन्यास
चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद वर्ष 2016 के आखिर में मिथुन ने राज्यसभा के सांसद पद से इस्तीफा दे कर राजनीति से संन्यास ले लिया था.
उस समय मिथुन ने अपने खराब स्वास्थ्य को राजनीति से नाता तोड़ने की वजह बताया था.
लेकिन दरअसल, उनके राजनीति छोड़ने की शुरुआत उसी समय हो गई थी जब उनका नाम शारदा चिटफंड घोटाले में आया था.
मिथुन चक्रवर्ती शारदा कंपनी में ब्रैंड एंबैसडर थे. इस मामले में ईडी ने उसे पूछताछ भी की थी.
उसके कुछ दिनों बाद ही मिथुन ने ब्रैंड एंबैसडर के तौर पर कंपनी से 1.20 करोड़ रुपये की रकम ये कह लौटा दी थी वे किसी की रकम नहीं हड़पना चाहते.
उसके बाद ही मिथुन ने राजनीति से संन्यास ले लिया था और सार्वजनिक तौर पर भी कम नजर आने लगे थे. बाद में वे इलाज के लिए संभवतः विदेश चले गए थे.
'ताशकंद फाइल्स'
वर्ष 2019 में मिथुन को फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'ताशकंद फाइल्स' में देखा गया था.
अब उसी फिल्मकार की अगली फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' में भी मिथुन अहम भूमिका में नजर आएंगे. इस फिल्म को वर्ष 2020 में ही रिलीज होना था.
लेकिन कोरोना की वजह से इसे टाल दिया गया था.
मिथुन के राजनीति में लौटने के कयास तो उसी समय से लगने लगे थे जब मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने घर जाकर उनसे मुलाकात की थी.
लेकिन तब मिथुन ने इसे आध्यात्मिक और सद्भावना मुलाकात करार देते हुए राजनीति में लौटने की अटकलों को निराधार बताया था.
लेकिन अब अचानक उन्होंने उसी पार्टी का हाथ थामा है जो विधानसभा चुनावों में उनकी पूर्व पार्टी यानी टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरी है.
कैलाश विजयवर्गीय से मुलाकात
बीते करीब दो दशकों से मुंबई और ऊटी ही मिथुन का ठिकाना रहे हैं.
शनिवार देर रात को बनारस होकर मुंबई से यहां पहुंचने वाले मिथुन से बीजेपी के बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने रात को ही उनसे मुलाकात की थी.
उसी समय यह लगभग तय हो गया था कि मिथुन मोदी की मौजूदगी में भगवा पार्टी का हाथ थामेंगे.
लेकिन मिथुन ने एयरपोर्ट से पत्रकारों से कहा था, "राजनीति में कुछ भी संभव है. कल तक इंतजार करें. मैं प्रधानमंत्री से मुलाकात करना चाहता हूं."
इन चुनावों में बाहर से लोग आकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं. लेकिन आपका तो घर ही बंगाल में है. इस पर मिथुन का कहना था कि बंगाल में उनका घर नहीं है.
यहां वे या तो होटल में ठहरते हैं या आयोजकों के इंतजाम से.
बीजेपी का चुनाव अभियान
सिनेमा में तो अपनी दूसरी पारी में मिथुन पहले से ज्यादा कामयाब रहे हैं. लेकिन क्या मंझधार में संन्यास लेने वाले मिथुन की राजनीति में वापसी भी उतनी ही कामयाब रहेगी?
अपनी जवानी के दिनों में बंगाल के एंग्री यंग मैन की छवि रखने वाले मिथुन क्या अपनी फिल्म एमएलए 'फाटाकेष्टो' की तरह राजनीति में भी दमदार भूमिका निभाने में सक्षम साबित होंगे?
ऐसे कई सवालों के जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेंगे.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि टीएमसी से तमाम मंत्रियों और नेताओं को पार्टी में शामिल करने के बावजूद बीजेपी के अब तक कोई ठोस चेहरा नहीं है.
राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "इस बार बीजेपी जीत के लिए चुनाव अभियान में कोई कसर नहीं छोड़ रही है.
मिथुन से पहले भी कई फिल्मी सितारों को पार्टी में शामिल किया गया है. अब मिथुन को पार्टी में लेना भी उसी रणनीति का हिस्सा है."
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