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समलैंगिकों की शादी पर क्या संसद ले सकती है फ़ैसला?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है.
केंद्र सरकार, धार्मिक गुरू, पूर्व जजों का एक समूह और समाज का एक तबका इसका विरोध कर रहा है.
वहीं समलैंगिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों का कहना है कि मूलभूत अधिकारों के तहत LGBTQI+ समूह को उनका हक़ दिया जाना चाहिए.
इस बीच बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श का ज़िम्मा विधायिका पर छोड़ दे.
इस मुद्दे पर बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (बीसीआई) और राज्यों की बार काउंसिल की संयुक्त बैठक हुई और ये प्रस्ताव पारित किया गया.
इस मामले पर बार काउंसिल की प्रेस विज्ञप्ति जारी होने के बाद वकीलों ने इस पर आपत्ति ज़ाहिर की है और कहा है कि उसे ऐसा प्रस्ताव पारित करने का कोई अधिकार ही नहीं है.
बीसीआई ने कहा है, ''भारत विविधताओं वाला देश है और कोई मामला जिससे समाज की मौलिक संरचना, सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं पर प्रभाव पड़ता हो, तो ऐसे में (इसका हल) विधायी प्रक्रिया से ही निकलना चाहिए.''
बीसीआई ने अपने बयान में ये भी कहा, ''इस तरह के संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी निर्णय आगे की पीढ़ियों के लिए नुक़सानदेह साबित हो सकता है. हम सुप्रीम कोर्ट से आग्रह करते हैं कि वो देश के जनसमूह की भावनाओं और जनादेश का सम्मान करें और समलैंगिक विवाह के मुद्दे को विधायिका पर विचार के लिए छोड़ दें.''
जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट क़ानून में कमियों की चर्चा कर सकता है और संभावित क़ानूनी संशोधन की सलाह दे सकता है, लेकिन बदलाव के निर्देश नहीं दे सकता. इसका फ़ैसला संसद और राज्य की विधानसभाएँ ही ले सकती हैं.
बीसीआई के इस बयान पर जहाँ वकीलों के समुदाय ने इसे बेवजह की टिप्पणी बताया है, वहीं उनका ये भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को देश में लंबे समय से लंबित पड़े मुद्दों पर फ़ैसला करने की ज़रूरत है.
क्या कहना है विभिन्न पक्षों का
सुप्रीम कोर्ट के वकील एमएल लाहोटी कहते हैं कि ये उनकी निजी राय है कि 95 फ़ीसदी भारत की जनता समलैंगिक रिश्तों के बारे में जानती ही नहीं है, ऐसे में क्या ये इतना बड़ा मुद्दा था कि पाँच जजों की संवैधानिक बेंच इस मामले को सुनती.
वे बताते हैं, ''भारत में इतने मामले लंबित हैं. ऐसे में आप ये समझिए कि पाँच जजों की बेंच का बैठना यानी ये जज दूसरे मामले नहीं सुन पा रहे हैं और केस स्थगित हो रहे हैं. ये गंभीर मामला है. ये केवल मेरा विचार नहीं है बल्कि 100 में से 98 वकील आपको यही जवाब देंगे.''
अगर सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह को मान्यता दे भी देता है, तो संसद इस पर क़ानून लाकर उसे अवैध क़रार दे सकती है.
उनके अनुसार, ''इसके लिए भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) यानी कम से कम 10 क़ानूनों में बदलाव लाने होंगे. इनमें घरेलू हिंसा क़ानून, विशेष विवाह अधिनियम, बच्चा गोद लेने का अधिकार आदि शामिल हैं.''
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समलैंगिकता अपराध नहीं
- साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था.
- पाँच सदस्यीय पीठ ने ये फ़ैसला सुनाया था.
- अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा था-आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा.
- इसके बाद समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिकाएँ पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में आईं.
- सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस मामले को तीन सदस्यीय पीठ के सामने सौंपा.
- इसके बाद इसे पाँच सदस्यीय संवैधानिक बेंच को सौंप दिया गया.
- इस मामले की सुनवाई 18 अप्रैल को शुरू हुई है.
- केंद्र सरकार ने अपने हलफ़नामे में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिका का विरोध किया है.
- जजों के एक समूह ने भी विरोध किया, तो धार्मिक सगंठनों ने समलैंगिक विवाह को 'अप्राकृतिक' बताया था.
क्या शादी की ज़रूरत है?
सुप्रीम कोर्ट के वकील अरविंद जैन बताते हैं कि हर विवाह मान्य माने जाएँगे, जब तक कोर्ट उसे अवैध क़रार नहीं देती.
वे सवाल उठाते हैं कि भारत में जब बालिग को सहमति से साथ रहने का अधिकार (लिव-इन-रिलेशनशिप) है, तो शादी करने की ज़रूरत ही क्या है?
महिलाओं पर 'औरत होने की सज़ा' जैसी कई किताबें लिख चुके अरविंद जैन बताते हैं, ''साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट में दो वयस्कों को बिना शादी के रहने को इसलिए मान्यता दी थी, क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच वाली शादी के संबंध से युवा पीढ़ी निकलना चाहती थी. तो ऐसे में समलैंगिक विवाह की क्या ज़रूरत है. वो भी तो साथ में तो रह ही सकते हैं."
वे बताते हैं, ''लिव-इन-रिलेशनशिप में दोनों को कई अधिकार दिए गए है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई कपल लंबे समय तक साथ रहते हैं, तो उन्हें पति और पत्नी मान लिया जाता है. तो दिक़्क़त यहाँ ये है कि एक तबका जहाँ विवाह से बचने के लिए लिव-इन-रिलेशनशिप चाहते हैं, वहीं सामाजिक मान सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए दूसरे तबके को विवाह चाहिए. ऐसे में इन दोनों के बीच जो संघर्ष है, वैसा ही संघर्ष सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच है.''
उनके अनुसार समाज जब तक स्वीकृति नहीं देगा, तब तक क़ानून कारगर साबित नहीं होगा.
अरविंद जैन कहते हैं कि क़ानून के बग़ैर भी बदलाव लाना मुश्किल है. तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह को लेकर कुछ दिशा-निर्देश बना सकती है और अगर संवैधानिक बेंच मान्यता देती है, तो विशेष विवाह अधिनियम में बदलाव लाने होंगे.
लेकिन अगर उस पर आम सहमति नहीं बनेगी, तब तक उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकेगा.
वे उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि ऐसे कई बिल जैसे महिला आरक्षण बिल अधर में लटके हुए हैं.
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संसद लेगी फ़ैसला
इसकी आगे की प्रक्रिया समझाते हुए लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट क़ानून नहीं बनाता, बल्कि उसकी व्याख्या करता है.
मान लीजिए सुप्रीम कोर्ट, विशेष विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देता है, तो वो वैध ही माना जाएगा, उसमें नया क़ानून बनाने की ज़रूरत नहीं है.
लेकिन अगर सरकार मानती है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सही नहीं है और कोर्ट के फ़ैसले को समाज स्वीकार नहीं करेगा, तो ऐसे में संसद के पास इतनी शक्ति होती है कि वो उसमें संशोधन करे.
ऐसे में वो संशोधन लाकर उस बिल को दोनों सदनों में पेश करेगा. इस पर वोटिंग होगी और दोनों सदनों में पारित होने के बाद वो राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए जाएगा.
इस पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद उसकी अधिसूचना जारी होगी और वो क़ानून के रूप में लागू हो जाएगा.
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने जिस क़ानून की जो व्याख्या की थी, वो वैसा नहीं रहेगा.
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