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पहली बार भ्रूण की सर्जरी कर हटाई गई आनुवांशिक बीमारी
- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
- प्रकाशित
चीनी शोधकर्ताओं ने बीबीसी को बताया कि आनुवंशिक बीमारी दूर करने के लिए दुनिया में पहली बार मानव भ्रूण की केमिकल सर्जरी की गई है.
सन यट-सेन यूनिवर्सिटी की टीम ने इंसान के जेनेटिक कोड के तीन अरब ''अक्षरों'' में से एक खामी को सुधारने के लिए 'बेस एडिटिंग' तकनीक का उपयोग किया.
बीटा थैलेसीमिया नाम की बीमारी को दूर करने के लिए लैब निर्मित मानव भ्रूण तैयार किया गया था. हालांकि इसे इंसानी शरीर में प्रत्यारोपित नहीं किया गया.
टीम का कहना है कि एक दिन ऐसा आएगा जब ऐसे कई आनुवंशिक रोगों को इस तकनीक से दूर किया जा सकेगा. बेस एडिटिंग से मनुष्य के डीएनए की मौलिक बनावट को ठीक किया जा सकेगा.
डीएनए के चार मौलिक बिल्डिंग ब्लॉक्स होते हैं, अडेनिन (ए), साइटोसिन (सी), ग्वानिन (जी) और थाइमिन (टी). इसे ए, सी, जी और टी अक्षरों से जानते हैं.
मानव शरीर की बनावट और संचालन इन चार आधारों की युक्तियों से नियंत्रित होती है.
डीएनए की मौलिक संरचना में बदलाव
खून की जानलेवा बीमारी बीटा-थैलेसीमिया आनुवंशिक (डीएनए) कोड में एक आधार में बदलाव के कारण होती है, जिसे पॉइंट म्यूटेशन कहते हैं.
चीनी टीम ने इसमें बदलाव किया है. उन्होंने डीएनए को स्कैन किया, फिर 'जी' को 'ए' में बदल दिया और गड़बड़ी को ठीक किया.
टीम में शामिल जूनजियू ह्यूआंग ने बीबीसी को बताया, "किसी ने पहले बार यह कर दिखाया है कि आनुवंशिक रोगों को दूर करने के लिए मानव भ्रूण की मौलिक बनावट को बेस एडिटर तकनीक से बदलना संभव है."
उन्होंने कहा कि इस अध्ययन ने बीटा थैलेसीमिया के मरीज़ों के इलाज और इस बीमारी के साथ पैदा होने वाले बच्चों के लिए संभावनाएं खुलेंगी.
उन्होंने बताया कि इससे अन्य आनुवंशिक बीमारियों के इलाज की भी संभावनाएं खुलेंगी.
यह प्रयोग इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के टिशू (मांस तंतु) और क्लोनिंग की मदद से बनाए गए मानव भ्रूण पर किया गया था.
बेस एडिटिंग डीएनए के जीन को बदलने की तकनीक 'क्रिस्पर' का उन्नत रूप है.
क्रिस्पर तकनीक में डीएनए में काट छांट की जाती है ताकि आनुवंशिक खराबियों को शरीर से पूरी तरह बाहर किया जा सके.
क्रिस्पर से कैसे अलग
बेस एडिटिंग में डीएनए की मौलिक बनावट पर काम किया जाता है ताकि इसे बदला जा सके.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इस तकनीक का प्रदर्शन करने वाले प्रोफेसर डेविट लियू इसे केमिकल सर्जरी का नाम देते हैं.
वो कहते हैं कि यह तकनीक ज्यादा कारगर है और क्रिस्पर के मुकाबले इसमें साइड इफेक्ट कम होंगे.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "इस बीमारी से जुड़ी हुई दो-तिहाई जीन के प्रकार को पॉइंट म्यूटेंट कहते हैं."
"इसलिए बेस एडिटिंग से सीधे डीएनए की खामियों को दूर किया जा सकता है."
इससे पहले शोधकर्ताओं का समूह सुर्खियों में तब आया था जब इसने ग्वांगझाओ के सन यट-सेन यूनिवर्सिटी में क्रिस्पर तकनीक का उपयोग मानव भ्रूण पर किया था.
लंदन के फ्रांसिस क्रिस इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर रॉबिन लोवेल बैज इस नई तकनीक को बेहतरीन मानते हैं.
लेकिन वो प्रश्न करते हैं कि शोध मानव भ्रूण की जगह पशुओं पर किया जाना चाहिए. यह एक बहस का विषय है कि क्या बीमारी को दूर करने के लिए क्या स्वीकार किया जा सकता है और क्या नहीं.
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