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कश्मीर का गाँव जिसे भारत ने पाकिस्तान से छीन लिया
- Author, डेव स्टैमबोलिस
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
- प्रकाशित
तुरतुक तक पहुंचना आसान नहीं है. यह छोटा गांव उत्तर भारत के लद्दाख क्षेत्र की नुब्रा घाटी में सबसे दूर स्थित है.
इसके एक तरफ श्योक नदी बहती है और दूसरी तरफ कराकोरम पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटियां हैं.
तुरतुक तक जाने और वहां से आने का केवल एक ही रास्ता है. एक उबड़-खाबड़ सड़क लेह के पहाड़ी दर्रों से गुजरती हुई यहां तक पहुंचती है.
हिचकोले खिलाती सड़क के दोनों तरफ मनोरम दृश्यों की भरमार है. लेकिन उससे भी दिलचस्प है यहां का इतिहास. तुरतुक एक ऐसा गांव है जिसने अपना देश खो दिया है.
भारत का बाल्टी गांव
लद्दाख का बाकी हिस्सा बौद्ध है, जहां लद्दाखी तिब्बती रहते हैं, लेकिन तुरतुक एक बाल्टी गांव है.
बाल्टी तक नस्लीय समूह है जिनके पूर्वज तिब्बती थे और जो अब मुख्य रूप से पाकिस्तान के स्कर्दू इलाके में रहते हैं.
यहां के गांव वाले नूरबख्शिया मुसलमान हैं, जो इस्लाम की सूफी परंपरा का हिस्सा है. वे बाल्टी भाषा बोलते हैं, जो मूल रूप से एक तिब्बती भाषा है.
गांव के लोग सलवार कमीज पहनते हैं. इनके अलावा उनकी और भी कई चीज़ें बाल्टिस्तान में रहने वाले अपने कुनबे के लोगों से मिलती-जुलती हैं.
नियंत्रण रेखा से 6 किलोमीटर आगे पाकिस्तान की तरफ जाने पर उनकी बस्तियां हैं.
1947 की जंग के बाद तुरतुक पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया था लेकिन 1971 की लड़ाई में भारत ने इसे फिर से हासिल कर लिया.
सरहद से बंटा गांव
सरहद की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखकर भारत ने इस गांव को पाकिस्तान को नहीं लौटाया.
1971 की जंग की उस रात इस गांव के जो लोग अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलने गए थे या कहीं और काम करने गए थे, वे वापस अपने घर कभी नहीं लौट पाए. तब से यहां भारत का नियंत्रण है.
यहां के सरहदी इलाके पिछले कई दशकों से शांत हैं और 2010 में तुरतुक को सैलानियों के लिए भी खोल दिया गया है.
सैलानी यहां सैर-सपाटे के लिए आ सकते हैं और यहां के लोगों के रहन-सहन और ज़िंदगी जीने के उनके तरीके को करीब से देख सकते हैं.
बाल्टी लोग कराकोरम के पत्थरों से दीवारें बनाते हैं. उनके घर और चारदीवारियां भी पत्थरों से ही बनी हैं. यहां तक कि खेतों की सिंचाई के लिए नालियां भी पत्थरों से बनाई गई हैं.
देसी कूलिंग तकनीक
तुरतुक की ऊंचाई लद्दाख के दूसरे इलाकों से कम है. यह गांव समुद्र तट से सिर्फ़ 2,900 मीटर की ऊंचाई पर है.
यहां गर्मियों में ख़ासी गर्मी पड़ती है. गांव वालों ने पथरीले परिवेश का इस्तेमाल करके प्राकृतिक पत्थर-शीत भंडारण गृहों का निर्माण किया है, जहां वे मांस, मक्खन और गर्मी में खराब होने वाली दूसरी चीज़ें रखते हैं.
बाल्टी भाषा में इनको नांगचुंग कहते हैं, जिसका मतलब होता है शीत घर.
पत्थरों से बने इन बंकरनुमा घरों में ठंडी हवा आने-जाने के लिए सुराख बने होते हैं जिससे अंदर रखी चीज़ें बाहर के तापमान से ठंडी रहती हैं.
हरियाली ही हरियाली
तुरतुक की मुख्य फसल जौ है. इस ऊंचाई पर यही एक फसल उगती है. यहां की कम ऊंचाई की वजह से बाल्टी लोग यहां कूट्टू भी बोते हैं, जो हल्का और पोषण से भरपूर अनाज है.
मगर तुरतुक मशहूर है खुबानी और अखरोट के लिए. इनकी खेती मेहनत का काम है.
यहां के खेतों में सालों भर काम चलता है. कभी पौधे लगाए जा रहे होते हैं तो कभी उनकी कटाई हो रही होती है.
कराकोरम पर्वत श्रृंखला के भूरे पहाड़ों और नदी घाटियों की वीरान जमीन के बीच तुरतुक की हरियाली नखलिस्तान सरीखी लगती है.
विरासत से वफ़ादारी
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर चाहे जितना तनाव हो, तुरतुक में ज़िंदगी शांति से गुजरती है.
यहां के सभी गांव वालों के पास भारतीय पहचान-पत्र है. 1971 में कब्ज़े के बाद सभी को भारतीय नागरिकता दे दी गई थी.
नुब्रा घाटी के आधुनिकीकरण की नई कोशिशों, नई सड़कों के निर्माण, स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन और पर्यटन बढ़ने से लगता है कि तुरतुक के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं.
फिर भी यहां भारत की तरह महसूस नहीं होता. खुबानी के बाग, नूरबख्शिया मस्जिद, पत्थर के घर और पत्थर से ही बने सिंचाई के सोते यहां की पहचान हैं.
किसीर तुरतुक का पारंपरिक व्यंजन है. कुट्टू के आटे से बनी रोटी को याक के मांस या खुबानी और अखरोट की चटनी (जिसे मस्कट कहा जाता है) के साथ परोसा जाता है.
बले सूप और कुट्टू के बड़े नूडल्स तुरतुक को बाल्टी की सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर रखे हुए हैं.
पतझड़ के रंग
तुरतुक की ख़ूबसूरती सबसे ज़्यादा पतझड़ के दिनों में निखरती है, जब पहाड़ी पीपल (पॉप्लर) के पत्तों के रंग बदलते हैं. भूरे पहाड़ इन रंगों में ओझल हो जाते हैं.
नुब्रा घाटी के सभी लद्दाखी गांव कराकोरम के पत्थरों का उपयोग करते हैं, लेकिन उनकी बनाई संरचनाएं उतनी विस्तृत और बारीक नहीं होतीं, जितनी तुरतुक में दिखती हैं.
यहां भूकंप और भूस्खलन का ख़तरा हमेशा बना रहता है, फिर भी पत्थर की दीवारें शान से खड़ी रहती हैं.
फलता-फूलता संसार
यह ऐसी जगह है जहां के निवासियों ने न सिर्फ़ क़ुदरत कुदरत और उसकी दुश्वारियों के साथ तालमेल मिलाकर जीना सीखा है, बल्कि वे फल-फूल भी रहे हैं.
यहां के गांव वाले अपने पुराने देश को खोकर भी अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति वफादार हैं.
अब दुनिया भर के सैलानियों की मेहमाननवाज़ी करते हुए वे भविष्य की ओर झांक रहे हैं.
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