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कोरोना वायरस आख़िरी महामारी साबित होगा या नहीं...?
- Author, रैशेल नुवेर
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
- प्रकाशित
लेवी सुक्रे रोमेरो को जनवरी में जब चीन में नोवेल कोरोना वायरस फैलने का पता चला तब उनको लगा था कि यह बहुत दूर है.
रोमेरो कोस्टा रिका के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक ब्रिब्रि से ताल्लुक रखते हैं. वह दक्षिणी कोस्टा रिका के सुदूर पहाड़ी क्षेत्र तलमांका में रहते हैं जो नदियों, घने जंगलों और बारिश के लिए मशहूर है.
तलमांका देश के लोकप्रिय पर्यटन केंद्रों से बहुत दूर है, फिर भी रोमेरो को लगा कि वायरस को उन तक पहुंचने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी.
रोमेरो को एक और चीज़ महसूस हुई. उनका मानना है कि यह वायरस इंसान के लालच और धरती से बुरे व्यवहार की वजह से फैला.
वह कहते हैं, "हम वन्य जीवों के आवास को उजाड़ रहे हैं, पेड़ काट रहे हैं, पूरी दुनिया में एक जैसी संस्कृति थोप रहे हैं."
"हम धरती को शहरों से भर रहे हैं और बहुत ज़्यादा केमिकल इस्तेमाल कर रहे हैं. यह बुरी चीज़ों का कॉकटेल है."
जानवर से आया वायरस
सार्स और मर्स की तरह कोविड-19 वायरस भी जानवरों से आया है. इसकी उत्पति के कुछ सबूत चमगादड़ों की ओर इशारा करते हैं.
चीन में वुहान के वेट मार्केट में इंसानों में संक्रमण शुरू होने से पहले यह वायरस संभवतः पैंगोलिन में पहुंचा था.
हालांकि कोविड-19 वायरस की सही-सही उत्पत्ति अभी मालूम नहीं है लेकिन कई शोध बताते हैं कि जंगलों की कटाई और वन्यजीवों के व्यापार ने जानवरों से फैलने वाली बीमारियों के महामारी बनने का ख़तरा बढ़ा दिया है.
रोमेरो के मुताबिक ये दोनों गतिविधियां प्रकृति का विनाश कर रही हैं. "हमारा सांस्कृतिक ज्ञान कहता है कि जब सिबो (ईश्वर) ने धरती को बनाया तो उन्होंने कुछ बुरी आत्माओं को क़ैद कर दिया. अब जबकि हम प्रकृति का सम्मान नहीं करते, ये आत्माएं बाहर आ गई हैं."
रोमेरो मेसो अमरीकन अलायंस ऑफ़ पीपल एंड फॉरेस्ट से जुड़े हैं. यह संस्था मध्य अमरीका और मेक्सिको के आदिवासी समुदायों के ज़मीन पर अधिकार के लिए काम करती है. यह घने जंगलों में रहने वाले 50 हज़ार लोगों का प्रतिनिधित्व करती है.
उनको पता है कि धरती पर स्थायी और सम्मानजनक तरीके से रहने के दूसरे भी तरीके हैं, जिसे ब्रिब्रि और अन्य आदिवासी समुदाय अपनाते हैं.
रोमेरो और आदिवासी समुदायों के दूसरे नेता वन्य जीव आवासों की हिफाजत करने, पेड़ लगाने, मवेशियों को टिकाऊ तरीके से पालने और प्रकृति का सम्मान करने की बात कहते रहे हैं. अब वे फिर अपनी बात दोहरा रहे हैं.
मार्च में न्यूयॉर्क के शट डाउन से कुछ ही रोज पहले रोमेरो और ब्राजील और इंडोनेशिया के आदिवासी नेताओं ने ज़ोर देकर कहा था कि पारंपरिक ज्ञान, परंपराएं और ज़मीन की हिफाजत धरती को बचाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
ये उपाय न सिर्फ़ पर्यावरण परिवर्तनों और जैव विविधता को होने वाले नुकसान को रोकेंगे बल्कि ये भविष्य में महामारियों का ख़तरा भी कम करेंगे.
रोमेरो कहते हैं, "हम आश्वस्त हैं कि यह महामारी प्राकृतिक संसाधनों के ग़लत इस्तेमाल और इन संसाधनों के साथ ग़लत तरीके से रहने का परिणाम हैं. मुझे नहीं लगता कि यह इस तरह की आख़िरी महामारी होगी."
जंगल कटाई और वायरस
कई रिसर्च कोरोना वायरस और पर्यावरण विनाश के बीच संबंध का समर्थन करते हैं. जानवरों में कई वायरस प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं. जंगल की कटाई के कारण उनके इंसान के संपर्क में आने का ख़तरा बढ़ता है.
2017 में नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में छपे रिसर्च पेपर के मुताबिक जानवरों से फैलने वाली बीमारियों का जोखिम उष्णकटिबंधीय वनों में सबसे ज़्यादा है, जहां पेड़ कटाई, खनन, डैम निर्माण और सड़क बनाने के काम हो रहे हैं.
इस तरह की गतिविधियों से बीमारियां फैलने का ख़तरा रहता है क्योंकि इनसे पारिस्थितिकी तंत्र में छेड़छाड़ होती है और इंसान और मवेशियों के साथ वन्यजीवों का संपर्क बढ़ता है.
स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी की जीव वैज्ञानिक एरिन मोर्डेकाई इसे स्टोकेस्टिक प्रॉसेस कहती हैं. "यह ख़ास व्यक्तियों और रोगजनक विषाणुओं वाले ख़ास जानवरों के संपर्क में आने से संचालित होता है."
वनों की कटाई से मौजूदा बीमारियां भी फैल सकती हैं. मोर्डेकाई और उनके साथी एंड्रयू मैकडॉनल्ड ने अक्टूबर में निष्कर्ष निकाला था कि ब्राजील में पेड़ काटने से मलेरिया संक्रमण बढ़ा.
प्रति वर्ग किलोमीटर वन कटाई से मलेरिया के औसतन 6.5 नये मामले हुए. पेड़ काटने से जंगल और बस्तियों का संपर्क क्षेत्र बढ़ता है. यहीं मलेरिया फैलाने वाले मच्छर पनपते हैं.
देश के दूसरे हिस्सों से सीमावर्ती बस्तियों में आने वाले लोगों में मलेरिया की कोई प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती इसलिए वे ज़ल्दी बीमार होने लगते हैं.
वैसे तो हर बीमारी अलग होती है, लेकिन मोर्डेकाई का मानना है कि आम तौर पर वनों की कटाई से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाता है.
"जो प्रजातियां आम तौर पर इंसानों से दूर रहती हैं वे भी संपर्क में आने लगती हैं. इससे रोगजनक विषाणुओं को फैलने का मौका मिल जाता है."
वैध हो या अवैध, सभी तरह के वन्य जीव व्यवसायों से जंगली प्रजातियां अक्सर एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं जिससे वायरस संक्रमण होता है.
ऐसे व्यापार अक्सर शहरी केंद्रों में होते हैं जहां कई लोग जानवरों के संपर्क में आते हैं. इससे नई बीमारियां आसानी से फैलती हैं.
वन्यजीव व्यापार भी पेड़ों की कटाई से जुड़ा है. जंगल में अंदर तक सड़क बन जाने से शिकारी घने जंगलों तक पहुंचने लगते हैं और वन्यजीवों का व्यापार बढ़ता है.
चिकित्सा विशेषज्ञ और पर्यावरणवादी इसे लेकर अक्सर चेतावनी देते रहते हैं लेकिन उनकी सुनवाई नहीं होती.
मिसाल के लिए, 2003 में सार्स फैलने के बाद चीन ने वन्यजीव व्यापार पर पाबंदी लगा दी थी लेकिन एक साल के अंदर यह फिर शुरू हो गया और तब से बढ़ ही रहा है.
आदिवासियों की भूमिका
भूमि रक्षकों के रूप में कई आदिवासी समूह इन जोखिमों को कम करते हैं. मोर्डेकाई कहती हैं, "आदिवासी इलाकों को संरक्षित करने से भू-परिदृश्यों में होने वाले बदलावों को रोका जा सकता है."
बड़ी तादाद में आदिवासी समुदाय उष्णकटिबंधीय जंगलों में रहते हैं. वे नई बीमारियों के लिए सबसे ज़्यादा जोखिम वाले इलाके हैं. धरती पर 90 फीसदी वन कटाई यहीं हो रही है.
इसी साल का एक रिसर्च बताता है कि बचे हुए जंगलों का कम से कम 36 फीसदी हिस्सा- जिसका आधा उष्णकटिबंधीय जंगल हैं- आदिवासियों की ज़मीन पर हैं.
स्वदेशी आदिवासी लोग कई तरह के हैं. कुछ शहरों में रहते हैं. कुछ जंगलों में रहते हैं. कुछ लोग फायदे के लिए संसाधनों का दोहन करते हैं, अन्य लोग प्रकृति पर बस निर्वाह करते हैं.
ससेक्स यूनिवर्सिटी की रिसर्च फेलो मैरी मेंटन का कहना है कि सामान्य तौर पर आदिवासी समूह अपनी ज़मीन पर जंगल और पर्यावरण को बचाने में अधिक प्रभावी हैं.
ब्राजील के कुछ हिस्सों में उपग्रह से ली गई तस्वीरों से भी आदिवासियों का वन संरक्षण पता चलता है.
मेंटन कहती हैं, "आदिवासी क्षेत्रों की सीमा रेखा आसानी से दिख जाती है. वे प्रभावी तरीके से वनों की कटाई रोक रहे हैं."
2012 के एक अध्ययन में 40 संरक्षित क्षेत्रों और 33 समुदाय-प्रबंधित क्षेत्रों की तुलना की गई थी. इससे पता चला कि समुदाय-प्रबंधित इलाकों में कम पेड़ कटे.
इसकी आंशिक वजह यह है कि आदिवासियों की आबादी बहुत बड़े क्षेत्र में फैली होती है. लेकिन उत्तर-पूर्वी ब्राजील के जंगलों में आदिवासियों की सघन आबादी है, वहां भी वे पर्यावरण बचाने के तरीके अपनाते हैं.
मेंटन कहती हैं, "बात सिर्फ़ यह नहीं है कि उनके पास बहुत जंगल है, बल्कि वे जंगल के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और उसके साथ कैसा संवाद करते हैं."
कई समूह पीढ़ियों से जंगली क्षेत्रों में रह रहे हैं और पूरे भू-भाग को समुदाय का हिस्सा मानते हैं. कुछ समूह यह भी मानते हैं कि उनके पुरखे जंगल का हिस्सा हैं.
पर्यावरण संरक्षण
प्रकृति की रक्षा करना सिर्फ़ पारिस्थितिकी और जैव-विविधता के बारे में नहीं है. यह जीवन, इतिहास और संस्कृति संरक्षण के बारे में भी है. आदिवासी समुदाय यह काम कई तरह से करते हैं.
ब्रिब्रि लोग अपनी ज़मीन को पारिवारिक और सामुदायिक ज़मीन में बांटते हैं. दोनों के अलग नियम होते हैं जो स्थायित्व को बढ़ावा देने के लिए बनाए जाते हैं.
उदाहरण के लिए, समुदाय के सदस्य स्थानीय सुइता पाम पौधे में 5 पत्ते छोड़कर जितनी मर्जी उतने पत्ते तोड़ सकते हैं. पांच पत्ते होने पर उससे और पत्ते निकल आते हैं.
कई आदिवासी लोग जंगल को अमीर बनने का साधन नहीं मानते. रोमेरो को लगता है कि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद दुनिया की कई बुराइयों की जड़ है.
वह कहते हैं, "हमें संसाधनों को नष्ट करके दौलत जमा करने वाले विकास के मॉडल पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है."
मुनाफे पर चलने वाली कंपनियां, सरकारें और लोग अक्सर आदिवासियों को आर्थिक तरक्की की राह में रोड़ा समझते हैं.
दुनिया भर में ज़मीन पर उनके अधिकार सीमित किए जा रहे हैं. उन पर कृषि, खनन और अन्य उद्योगों का कब्जा हो रहा है.
आदिवासियों की सुरक्षा
मेंटन ने पाया कि 2002 से 2019 के बीच 50 देशों में 1500 से ज़्यादा पर्यावरण संरक्षकों को मार डाला गया. इस सूची में किसी भी दूसरे समुदाय से ज़्यादा आदिवासी समुदायों के लोग थे.
2015 और 2016 में मारे गए पर्यावरण संरक्षकों में से 40 फीसदी आदिवासी थे.
ब्राजील के गैर-सरकारी संगठन पेस्टोरल लैंड कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में ब्राजील के ग्रामीण इलाकों में जिन परिवारों को भूमि संघर्ष का सामना करना पड़ा उनमें से एक तिहाई आदिवासी थे.
मेंटन का कहना है कि आदिवासयों को नस्लवाद और दोयम दर्जे का नागरिक समझने के कारण अतिरिक्त ख़तरे होते हैं.
अक्सर इस समस्या को ऊपर से बढ़ावा दिया जाता है. ब्राजील के राष्ट्रपति ज़ायर बोलसोनारो ने हाल ही में कहा था कि "इंडियन्स तरक्की करके धीरे-धीरे हमारी तरह इंसान बन रहे हैं."
आदिवासी दोनों ख़तरों का सामना कर रहे हैं- ज़मीन के लिए शारीरिक संघर्ष का और जीने के अधिकार पर सांस्कृतिक ख़तरे का.
जंगल बचेंगे तो महामारी कम
रोमेरो का कहना है कि आदिवासी अधिकारों पर हमले का असर धरती की सेहत पर भी पड़ता है.
"जब हमारे पास जंगल और ज़मीन के अधिकार होते हैं तो वे हमारे परिवारों के लिए जीवित रहने के साधन हैं. इसका यह भी मतलब होता है कि महामारी से बचने की हमारी संभावना बेहतर है."
दुनिया के ज़्यादातर लोगों की तरह ब्रिब्रि समुदाय के लोग भी लॉकडाउन में हैं. रोमेरो कहते हैं, "हमारी ज़िंदगी की लय को छोटा कर दिया गया है. बुजुर्गों के पास जाना प्रतिबंधित है."
"राष्ट्रीय बाज़ार में उत्पादों की बिक्री 90 फीसदी घट गई है. आदिवासी इलाके के पहाड़ों और नदियों में पर्यटन लगभग ठप हो गया है. यह अभी जारी रह सकता है. इसके बहुत बड़े नतीजे होंगे."
एक बार जब दुनिया कोविड-19 से बाहर निकल जाएगी तब रोमेरा को लगता है कि उम्मीद की एक किरण होगी.
उनको उम्मीद है कि लोग आदिवासी समुदाय के पास उपलब्ध जानकारियों की कद्र करेंगे और क़ुदरत के साथ अपने रिश्ते का फिर से मूल्यांकन करेंगे.
रोमेरो कहते हैं, "अभी हमें लंबा सफ़र तय करना है लेकिन कोरोना वायरस ख़त्म हो जाने के बाद सरकारों को हमें और अधिक सुनना चाहिए."
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