फ़ॉर्म 6 से लेकर आईटी विभाग में काम के बंटवारे तक, चुनाव आयोग के पाँच बड़े 'यू-टर्न'

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी
इमेज कैप्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (बाएं) और दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी (फ़ाइल फ़ोटो)
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भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने अपने पूर्व के फ़ैसलों पर दोबारा विचार करने की कड़ी में बुधवार को एक और बड़ा फ़ैसला करते हुए काम के बंटवारे के संबंध में आदेश जारी किया.

नए आदेश में महानिदेशक (आईटी) की निगरानी व्यवस्था को फिर से बहाल कर दिया गया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, निगरानी की यह व्यवस्था 28 जुलाई के एक आदेश से हटा दी गई थी.

आयोग के ताज़ा आदेश में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त पवन कुमार शर्मा को 'आईटी/आईसीटी' का प्रभार सौंपा गया और महानिदेशक (आईटी) के संबंध में कहा गया कि वो 'फ़ाइलें वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त के माध्यम से आगे बढ़ाएंगी.'

हाल के दिनों में चुनाव आयोग ने अपने पूर्व के कई फ़ैसलों को वापस लिया है.

ताज़ा फ़ैसले पर टीएमसी (ममता बनर्जी) की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने शुक्रवार को एक्स पर लिखा, "ईसीआई को हर दिन अपने फैसले वापस लेने पड़ रहे हैं और सफाई देनी पड़ रही है, उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट भी सवालों से बच नहीं सकता."

"पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग पर रोक क्यों नहीं लगाई? विद्वान न्यायाधीश ने ऐसा क्यों कहा कि "जो लोग इस बार वोट नहीं दे सकते, वे अगली बार वोट दे सकते हैं"? संवैधानिक अदालत होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मतदान के संवैधानिक अधिकार को इतने हल्के ढंग से क्यों लिया?"

दरअसल 23 सितंबर को 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें दावा किया गया था कि पिछले साल अक्तूबर से इस साल अगस्त के बीच कम से कम 14 मौक़ों पर दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने ईसीआईनेट और एसआईआर से जुड़े चुनाव आयोग के कई फ़ैसलों पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज कराई थी.

इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और उनके इस्तीफ़े की मांग करने लगे.

इस रिपोर्ट के आने के बाद चुनाव आयोग की बैठक हुई. इसके बाद आए बयान में कहा गया कि सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे. साथ ही आयोग ने कुछ सुधारात्मक कदम भी उठाए.

लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दलों ने कई बार दिल्ली और दूसरे के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन किया, जिसमें विपक्षी दलों का 12 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च और एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में 'महारैली' प्रमुख पड़ाव रहे.

इस दरम्यान चुनाव आयोग ने एक के बाद एक आदेश जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की और कई ऐसे फ़ैसले लिए जिन्हें विपक्ष यू टर्न बता रहा है.

इन फ़ैसलों पर एक नज़र डालते हैं.

छह राज्यों में एसएसआर का एलान

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (बाएं) और दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (बीच में) और बाकी दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू (सबसे बाएं) विवेक जोशी (सबसे दाएं) के बीच विवाद की ख़बर आई थी (फ़ाइल फ़ोटो)

बीते गुरुवार को चुनाव आयोग ने छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष अभियान के तहत स्पेशल समरी रिवीज़न (एसएसआर) चलाए जाने की घोषणा की.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, आदेश में कहा गया कि अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव, मिजोरम, ओडिशा और सिक्किम में एसएसआर होगा.

इसके अलावा जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया जारी है या पूरी हो चुकी है, उनमें आंध्र प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मेघालय, नगालैंड, दिल्ली, त्रिपुरा और तेलंगाना शामिल हैं. इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसएसआर का कार्यक्रम बाद में घोषित किया जाएगा.

हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में अभी तक एसआईआर शुरू नहीं हुआ है. इन तीन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मौसम की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सही समय पर कार्यक्रम घोषित किया जाएगा.

आईटी विभाग में काम के बंटवारे को लेकर विवाद

राहुल गांधी
इमेज कैप्शन, पिछले महीने छह अक्तूबर को राहुल गांधी ने अन्य नेताओं के साथ चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च किया

इससे पहले बुधवार को आयोग ने इसीआईनेट को देखने वाले अधिकारियों के काम के बंटवारे को लेकर आदेश जारी किए थे.

दरअसल, ईसीआईनेट के केंद्रीकरण को लेकर विपक्ष ने तब सवाल उठाए थे जब इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया था कि इससे संबंधित कामकाज को लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए थे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग आंतरिक नोट्स में कहा था कि ज़मीनी स्तर पर तैनात अधिकारियों ने उन्हें बताया है कि उन्हें ईआरओनेट का उचित एक्सेस नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से "मतदाता सूचियों का केंद्रीकरण" हो रहा है.

चुनाव आयोग का आईटी विभाग ईसीआईनेट और ईआरओनेट का संचालन करता है. ईसीआई एक डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म है, जो चुनाव प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी और उनसे जुड़ाव को आसान बनाता है. वहीं, ईआरओ की मदद से आयोग के अधिकारी चुनावी व्यवस्था का प्रबंधन करते हैं.

विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईआरओनेट के ज़रिए चुनाव आयोग केंद्रीय रूप से नाम जोड़ने और हटाने का काम मनमाने तरीक़े से कर रहा है.

फ़ॉर्म 6 में बदलाव वापस लिया

चुनाव आयोग का दफ़्तर
इमेज कैप्शन, फ़ॉर्म 6 में चुनाव आयोग ने पहले किए गए बदलाव को वापस ले लिया (चुनाव आयोग के दफ़्तर की तस्वीर)
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समाप्त

सबसे अधिक विवाद फ़ॉर्म 6 में एसआईआर को लेकर एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ने को लेकर था.

आयोग ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया है कि एसआईआर की प्रक्रिया जहां जारी है, वहां आयोग ने अपने इसीआईनेट पोर्टल पर फ़ॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में एसआईआर से जुड़ी घोषणा को हटा दिया है.

इसका मतलब है कि नए मतदाताओं को ऑनलाइन पंजीकरण आवेदन में अब ये नहीं बताना होगा कि क्या उनका नाम 2000 के शुरुआती वर्षों में हुए पिछले एसआईआर के दौरान मतदाता सूची में था? या क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस मतदाता सूची में था? या क्या उनका और उनके माता-पिता का नाम उस सूची में नहीं था?

इसका जवाब दिए बिना आवेदक फॉर्म भरने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकते थे.

आयोग के इस कदम पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने कहा, "यह सबसे गंभीर ग़लतियों में से एक थी. आम जनता ने निर्वाचन आयोग के तहत हुई इन सभी घटनाओं को पूरी तरह नहीं समझा है. ये घटनाएं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में हुईं और इनमें स्पष्ट रूप से नौकरशाही और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर अनियमितताएं शामिल थीं."

"दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने भी इस मामले में आपत्ति जताई थी. इनमें से एक मामला फ़ॉर्म 6 का है, जिसमें अचानक एकतरफा बदलाव करते हुए एक नई घोषणा जोड़ दी गई. जबकि देश के नियमों और कानूनों में इस तरह की घोषणा की अनुमति नहीं है. इस निर्वाचन आयोग के कार्यकाल में हजारों नामों के साथ फॉर्म 7 को एक साथ भरने की अनुमति दी गई. पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी ऐसा हुआ. इसके परिणामस्वरूप, केवल संदेह के आधार पर बड़ी संख्या में लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया."

फ़ॉर्म 7 भरने की लिमिट तय

चुनाव आयोग
इमेज कैप्शन, बीते दिनों कई शिकायतें आईं जिनमें कहा गया कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने के लिए फ़ॉर्म 7 इस्तेमाल किए गए

विपक्ष ने लगातार आरोप लगाया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए थोक में फ़ॉर्म 7 का इस्तेमाल किया गया.

फॉर्म 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने के लिए अनुरोध करने या किसी व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है.

10 अक्तूबर को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को जारी निर्देशों में चुनाव आयोग ने कहा कि फ़ॉर्म 7 को बड़ी संख्या में एक साथ जमा किए जाने के ऐसे मामले उसके संज्ञान में लाए गए हैं.

इसके साथ ही आयोग ने नए निर्देश में कहा कि एसआईआर के दौरान दावे और आपत्तियां दर्ज करने की अवधि में कोई भी व्यक्ति ऑनलाइन या ऑफ़लाइन, फ़ॉर्म 7 अधिकतम 10 ही जमा कर सकता है.

जबकि, सामान्य प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची के लगातार अपडेट के दौरान एक व्यक्ति को हर महीने सिर्फ 10, फ़ॉर्म 7 जमा करने की अनुमति होगी.

रीडेबल वोटर लिस्ट

शॉर्ट वीडियो देखिए
वीडियो कैप्शन, '500 मीटर लंबे कपड़े पर डिलीटेड वोटर्स के नाम'

पिछले महीने 15 अक्तूबर को ईसीआई ने एक आदेश जारी कर कहा कि एसएसआर की प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियां राजनीतिक दलों को सर्च किए जा सकने वाले फॉर्मेट में उपलब्ध कराई जाएंगी.

राजनीतिक दलों को मतदाता सूची में जोड़े गए नए नामों, हटाए गए नामों और किए गए सुधारों की अलग-अलग सूचियां भी दी जाएंगी. इसके अलावा, दावों और आपत्तियों की साप्ताहिक सूची भी उपलब्ध कराई जाएगी.

कांग्रेस पार्टी लगातार मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूचियों (मशीन रीडेबल इलेक्टोरल रोल्स) की मांग करती रही है.

राहुल गांधी ने संसद में यह मांग उठाई. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा. कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडलों ने भी कई बार आयोग से मुलाकात की. लेकिन इस मांग को आयोग ने लगातार ख़ारिज किया.

जब चुनाव आयोग ने रीडेबल फ़ॉर्मेट उपलब्ध कराए जाने का आदेश जारी किया तो कांग्रेस ने इसका श्रेय राहुल गांधी को दिया.

कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा था कि 8 साल तक सर्चेबल वोटर रोल का विरोध करने के बाद, चुनाव आयोग ने आखिरकार एसएसआर डेटा पर यू-टर्न ले लिया है.

कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने एक्स पर आदेश की कॉपी साझा करते हुए लिखा, "कांग्रेस पार्टी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले साल से ही मशीन से पढ़े जा सकने वाले की मांग कर रहे हैं. इसके बावजूद कई सवाल अब भी बने हुए हैं. 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं और पश्चिम बंगाल में वास्तविक मतदाताओं को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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